लखनऊ। उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में उपभोक्ता अदालत ने रेलवे पर 9 लाख 10 हजार का भारी भरकम जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना सात साल पहले छात्रा समृद्धि की शिकायत पर लगाया गया है। उसने शिकायत की थी कि उसने ट्रेन में टिकट बुक किया था और वह ट्रेन ढाई घंटे से अधिक लेट थी, जिस कारण उसका नीट का पेपर छूट गया। उसकी सालों की मेहनत बेकार हो गयी। जिस पर उसने कोर्ट की शरण ली। जुर्माना लगाने के बाद कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि यदि हर्जाना राशि देने में भी रेलवे विभाग देरी करता है, तो उसे भुगतान राशि का 12 फीसदी ब्याज तौर पर अलग से उपभोक्ता को देना होगा। इस कार्रवाई से रेल प्रशासन में हड़कम्प मच गया है।
एक नजर में पूरा मामला
कोतवाली थाना क्षेत्र के पिकौरा बक्स मोहल्ले की रहने वाली छात्रा समृद्धि नीट की तैयारी कर रही थी। नीट का भी फार्म भरा, जिसमें उसका परीक्षा केंद्र लखनऊ के जयनारायण पीजी कॉलेज एलाट हुआ। परीक्षा देने के लिए छात्रा ने बस्ती से इंटरसिटी सुपरफास्ट ट्रेन का टिकट लिया, जिसमें लखनऊ पहुंचने का समय 11 बजे निर्धारित था, लेकिन लेटलतीफी की चलते ट्रेन निर्धारित समय से ढाई घंटे लेट पहुंची,जबकि छात्रा को परीक्षा केंद्र पर 12:30 बजे ही पहुंचना था, जिससे उसका पेपर छूट गया।
रेलवे देगा 9.10 लाख रुपए
आहत छात्रा ने मामले को उपभोक्ता आयोग में उठाया,तो रेलवे को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश अमरजीत वर्मा और सदस्य अजय प्रकाश सिंह ने रेलवे पर जुर्माना लगाते हुए उन पर 9 लाख 10 हजार का जुर्माना ठोका और साथ ही साथ कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि यदि हजार्ना राशि देने में भी रेलवे विभाग देरी करता है, तो उसे भुगतान राशि का 12 प्रतिशत ब्याज तौर पर अलग से उपभोक्ता को देना होगा।
किसने नहीं दिया सवालों का जवाब
समृद्धि के वकील प्रभाकर मिश्रा ने बताया कि सात मई 2018 को नीट की परीक्षा देने लखनऊ गई थी, लेकिन ट्रेन की लेटलतीफी के चलते वह परीक्षा देने से वंचित हो गई और उसका पूरा साल बर्बाद हो गया। जिस पर मेरे द्वारा जिला उपभोक्ता आयोग में एक वाद दायर किया था। मामले में मेरे द्वारा रेलवे मंत्रालय, महाप्रबंधक रेलवे और स्टेशन अधीक्षक को नोटिस भेजा, लेकिन कोई उत्तर न मिलने पर 11 सितंबर 2018 को अदालत में मुकदमा दायर किया।
डेढ़ माह की मिली मोहलत
सात साल तक केस आयोग में चला। आयोग ने दोनों पक्षों को सुना और रेलवे ने ट्रेन के विलंब को स्वीकार किया, लेकिन विलंब का कारण स्पष्ट नहीं किया। जिस पर कोर्ट ने जुमार्ना लगाते हुए रेलवे को 45 दिन के भीतर 9 लाख 10 हजार का भुगतान करने का निर्देश दिया है, और यदि तय समय पर यह राशि उपभोक्ता को नहीं दी जाती है तो सम्पूर्ण राशि पर 12 प्रतिशत अलग से उपभोक्ता को ब्याज के तौर पर देना होगा।