मुंबई। जरा कल्पना कीजिए एक पंचायत जहां कोई अपनी जाति पर बात नहीं कर रहा हो, जहां जाति के नाम पर कोई भेदभाव ना हो। जाति के नाम पर ना तो उन्माद हो और ना ही जाति के नाम पर बर्चस्व की लड़ाई। अब कहेंगे भैया जब देश में एक तरफ जाति की राजनीति हो रही हो। हर तरफ बस जाति-जाति का शोर हो तो ऐसा कहां संभव है, बाकी रही सही कसर तो UGC के नए नियम ने पूरा कर दिया। पूरा देश UGC के नए नियम पर झगड़ हो रहा है। इस झगड़े के बीच हम बताने जा रहे हैं ऐसा गांव जिसने खुद को जाति मुक्त घोषित कर दिया है। यकीन नहीं हो रहा है ना तो कर लीजिए। महाराष्ट्र के इस छोटे से गांव का नाम है सौंदला। गांव की आबादी करीब ढाई हजार है लेकिन सोच कई गुणा ऊंचा और आगे। यहां बच्चों की क्लास मंदिर के बाहर गोल घेरा बनाकर चलती है. हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, मराठा, ब्राह्मण और दलित सब साथ बैठते हैं, साथ पढ़ते हैं और यहां तक कि साथ खाना खाते हैं। ग्राम सभा ने प्रस्ताव पास कर खुद को ‘जातिमुक्त’ घोषित कर दिया है। प्रस्ताव में साफ कहा गया है कि गांव में किसी के साथ जाति, धर्म या नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। लेकिन सवाल है कि जब जातिगत उन्माद पूरे देश में अपने चरम पर है। तो ऐसे में इस पंचायत ने ऐसा कैसे कर लिया। आखिर ऐसा कौन सा कारण है कि पंचायत ने ऐसा फैसला लिया और खुद को जातिमुक्त करने की घोषणा की। आइए टटोलते हैं इन तमाम सवालों के जवाब को इस खबर में।
5 फरवरी को ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित हुआ
रिपोर्ट के अनुसार यह फैसला अचानक नहीं आया। सरपंच शरद आरगड़े की अगुवाई में 5 फरवरी को ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव में लिखा गया ‘मेरा धर्म मानवता.’ गांव के मंदिर, श्मशान, पानी लेने और पीने की जगह, स्कूल, सरकारी जगहों और सार्वजनिक कार्यक्रम सभी के लिए समान रूप से खुले रहेंगे। फरवरी को ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित हुआ यहां तक कि सोशल मीडिया पर अगर कोई जातीय तनाव फैलाने की कोशिश करेगा तो उस पर भी कार्रवाई होगी। गांव का संदेश साफ है, नफरत हमारे दरवाजे तक नहीं आनी चाहिए।
क्या है गांव की सामाजिक संरचना
कुल आबादी लगभग 2,500।
65% मराठा समुदाय।
20% अनुसूचित जाति परिवार.
कुछ SC परिवार ईसाई धर्म का पालन करते हैं।
तीन मुस्लिम परिवार भी गांव में निवास करते हैं।
जातीय खाई और सामाजिक तनाव चिंताजनक
गांव के सरपंच का कहना है कि यहां पिछले दस सालों में कोई अत्याचार का मामला दर्ज नहीं हुआ. फिर भी यह प्रस्ताव एहतियात के तौर पर लाया गया। उनका कहना है कि आसपास के इलाकों में बढ़ती जातीय खाई और सामाजिक तनाव चिंताजनक है. वे कहते हैं, ‘हम नहीं चाहते कि यह जहर हमारे गांव तक पहुंचे’।
स्थानीय जिला परिषद स्कूल के शिक्षक अशोक पंडित बताते हैं कि बच्चे स्वाभाविक रूप से भेदभाव नहीं करते. परीक्षा से पहले सभी बच्चे, चाहे किसी भी धर्म के हों, पास के मंदिर के सामने सिर झुकाते हैं। उनके मुताबिक असली चुनौती तब आती है जब बच्चे गांव से बाहर पढ़ाई या नौकरी के लिए जाते हैं। वहां उन्हें अलग-अलग विचारों का सामना करना पड़ता है. गांव चाहता है कि बराबरी की भावना जड़ से मजबूत की जाए।
पहले भी लिए गए सामाजिक फैसले
यह गांव पहले भी प्रगतिशील फैसलों के लिए चर्चा में रहा है. सितंबर 2024 में ग्राम सभा ने विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए 11,000 रुपए की आर्थिक सहायता का प्रस्ताव पास किया था। नवंबर 2024 में महिलाओं को अपमानित करने वाले अपशब्दों पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया. इन फैसलों से साफ है कि गांव सामाजिक सुधार को प्राथमिकता दे रहा है।
क्या गांव में पहले जातीय विवाद होते थे?
सरपंच के अनुसार पिछले एक दशक में कोई बड़ा जातीय विवाद या अत्याचार का मामला सामने नहीं आया। यह प्रस्ताव किसी घटना की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित तनाव को रोकने के लिए एहतियाती कदम है।
प्रस्ताव का व्यावहारिक असर क्या होगा?
अब किसी भी सार्वजनिक स्थान पर किसी को प्रवेश से रोका नहीं जा सकेगा। यदि सोशल मीडिया या व्यक्तिगत व्यवहार में जातीय भेदभाव फैलाने की कोशिश हुई तो ग्राम पंचायत कार्रवाई कर सकती है. इससे सामाजिक एकता मजबूत होने की उम्मीद है।
क्या अन्य गांव भी ऐसा कदम उठा सकते हैं?
कानूनी रूप से ग्राम सभा को सामाजिक संकल्प लेने का अधिकार है। यदि समुदाय की सहमति हो तो अन्य गांव भी ऐसा प्रस्ताव पारित कर सकते हैं. हालांकि इसका असर स्थानीय नेतृत्व और लोगों की भागीदारी पर निर्भर करेगा।
बच्चों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
स्कूल स्तर पर बराबरी की शिक्षा बच्चों के मन में स्थायी प्रभाव छोड़ सकती है। यदि वे बचपन से भेदभाव रहित माहौल में पलते हैं तो आगे चलकर सामाजिक विभाजन से कम प्रभावित होंगे।