नई दिल्ली। नासा के प्लैनेटरी डिफेंस चीफ के दावे ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। हाल ही में एरिजोना में हुई एक कॉन्फ्रेंस में डॉक्टर केली फास्ट ने बताया कि पृथ्वी के पास हजारों ऐसे एस्टेरॉयड मंडरा रहे हैं, जिन्हें रोकने का फिलहाल हमारे पास कोई तरीका नहीं है। ये एस्टेरॉयड इतने खतरनाक हैं कि इन्हें ‘सिटी-किलर’ का नाम दिया गया है। इसका मतलब है कि अगर इनमें से एक भी किसी शहर पर गिरता है, तो वह शहर नक्शे से पूरी तरह मिट सकता है। रिसर्च के मुताबिक, अंतरिक्ष में लगभग 25,000 ऐसे एस्टेरॉयड हैं जिनका साइज 140 मीटर या उससे ज्यादा है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से केवल 40 परसेंट की ही पहचान हो पाई है।
बाकी बचे 15,000 एस्टेरॉयड कहां हैं और किस तरफ बढ़ रहे हैं, इसकी जानकारी फिलहाल किसी के पास नहीं है। डॉक्टर केली फास्ट ने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा डर उन एस्टेरॉयड से लगता है जिनके बारे में हमें पता ही नहीं है। छोटे पत्थर वायुमंडल में जल जाते हैं और बहुत बड़े पत्थरों पर हमारी नजर है। लेकिन ये मीडियम साइज के पत्थर हमारे डिफेंस सिस्टम की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। अगर इनमें से कोई भी बिना चेतावनी के पृथ्वी की तरफ आता है, तो हमारे पास बचने का समय बहुत कम होगा।
सिटी-किलर एस्टेरॉयड आखिर इतने खतरनाक क्यों हैं?
वैज्ञानिकों ने 140 मीटर या उससे बड़े पत्थरों को सिटी-किलर की कैटेगरी में रखा है, ये आकार में इतने छोटे होते हैं कि पुराने टेलिस्कोप इन्हें आसानी से नहीं देख पाते. लेकिन ये इतने बड़े जरूर होते हैं कि किसी भी मेट्रो शहर को मलबे के ढेर में बदल सकें। इनके टकराने से भयंकर आग लग सकती है और भारी तबाही मच सकती है। कई एस्टेरॉयड बहुत डार्क होते हैं, जिसकी वजह से वे अंतरिक्ष के अंधेरे में घुल मिल जाते हैं। कुछ तो पृथ्वी के जैसी ही कक्षा में घूमते हैं, जिन्हें आखिरी वक्त तक पहचानना नामुमकिन जैसा होता है।
क्या इतिहास खुद को दोहराने वाला है?
इतिहास गवाह है कि छोटे दिखने वाले पत्थरों ने भी धरती पर भयंकर नुकसान पहुंचाया है। साल 1908 में साइबेरिया के तुंगुस्का में एक धमाका हुआ था। रिसर्च बताती है कि वह पत्थर 100 मीटर से भी छोटा था, लेकिन उसने 2,000 वर्ग किलोमीटर के जंगल को सपाट कर दिया था। सोचिए, अगर वैसा ही कोई पत्थर आज के दौर में किसी घनी आबादी वाले शहर पर गिरता है, तो कितने लाखों लोगों की जान जाएगी। यही वह डर है जो वैज्ञानिकों को रात भर सोने नहीं देता है।
क्या हमारे पास इन एस्टेरॉयड को रोकने का कोई रास्ता है?
सच तो यह है कि अभी हमारे पास कोई ऐसी तैयार टेक्नोलॉजी नहीं है जो अचानक आने वाले खतरे को रोक सके। नासा ने 2022 में ‘डार्ट’ (DART) मिशन के जरिए एक छोटे एस्टेरॉयड का रास्ता बदलने में सफलता पाई थी। लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह तरीका तभी काम करता है जब हमें खतरे का पता कई साल पहले चल जाए। फिलहाल हमारे पास कोई ऐसा स्पेसक्राफ्ट स्टैंडबाय पर नहीं है जिसे तुरंत लॉन्च किया जा सके। बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण हम अभी भी इस मामले में बहुत पीछे हैं।
कैसे सुधरेगा हमारा प्लैनेटरी डिफेंस सिस्टम?
उम्मीद की एक किरण अभी भी बाकी है. नासा जल्द ही ‘नियो सर्वेयर’ (NEO Surveyor) नाम का एक इंफ्रारेड स्पेस टेलिस्कोप लॉन्च करने वाला है। यह टेलिस्कोप उन अंधेरे पत्थरों को उनकी गर्मी के जरिए ढूंढ निकालेगा जिन्हें आम टेलिस्कोप नहीं देख पाते। अगर यह मिशन कामयाब रहा, तो अगले 10 सालों में हम 90 परसेंट खतरनाक एस्टेरॉयड की पहचान कर लेंगे। इसके अलावा वेरा रूबिन ऑब्जर्वेटरी जैसे ग्राउंड सिस्टम भी रात-दिन आसमान की निगरानी कर रहे हैं ताकि हमें समय रहते चेतावनी मिल सके।
मानवता के लिए इस चेतावनी के क्या मायने हैं?
नासा की यह रिपोर्ट हमें आगाह करती है कि हम कुदरत के सामने कितने बेबस हैं। हालांकि किसी बड़े एस्टेरॉयड के टकराने की संभावना फिलहाल कम है, लेकिन अनदेखे खतरों का रिस्क हमेशा बना रहता है। हमें प्लैनेटरी डिफेंस में ज्यादा निवेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है।वैज्ञानिकों का मानना है कि सबसे पहला कदम इन पत्थरों को ढूंढना और उन्हें ट्रैक करना है। अगर हमें सही समय पर जानकारी मिल जाए, तो हम टेक्नोलॉजी की मदद से मौत के इन गोलों का रास्ता मोड़ सकते हैं और अपनी पृथ्वी को बचा सकते हैं।