ढाका। बांग्लादेश चुनाव पूरा हो गया है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को 209 सीटों पर जीत हासिल हुई है। तारिक रहमान पीएम बन सकते हैं। जमात-ए-इस्लामी को 68 और छात्रों वाली पार्टी NCP को सिर्फ 6 सीटों पर वोट मिला. चुनाव के बाद अब जो आंकड़े आए हैं, वह हैरान करने वाले हैं. खासकर हिंदुओं की जीत को लेकर। दरअसल ग्लादेश की कुल आबादी करीब 16.5 करोड़ है. 2022 की जनगणना के मुताबिक इनमें 1 करोड़ 31 लाख से ज्यादा हिंदू हैं, यानी देश की करीब 8 प्रतिशत आबादी हिंदू समुदाय से आती है। यह कोई छोटी संख्या नहीं है। लेकिन 2026 के ताजा संसदीय चुनाव में हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद कम रह गया है। 300 सीटों वाली संसद में इस बार सिर्फ 3 हिंदू सांसद चुने गए हैं. यह आंकड़ा तब आया है जब हाल के दिनों में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा देखी गई है।
बांग्लादेश में 18 महीनों के राजनीतिक संघर्ष और घमासान के बाद हुए 13वें संसदीय चुनाव के नतीजे सामने आ गए हैं। इस चुनाव में मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने जोरदार जीत दर्ज की है। पार्टी ने 299 में से 211 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की राह बनाई है और इसके नेतृत्व में तारिक रहमान हैं। यह जीत बीएनपी के लिए दो दशक में सबसे बड़ी वापसी का प्रतीक मानी जा रही है। हालांकि, इन नतीजों के बीच सबसे ध्यान खींचने वाली बात है अल्पसंख्यकों का सीमित प्रतिनिधित्व रहा।
बांग्लादेश चुनाव में कितने हिंदू जीते?
पहले हिंदुओं की बड़ी संख्या अवामी लीग (AL) से होती थी. AL क्योंकि बैन है, इसलिए तीनों हिंदू उम्मीदवार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से जीते हैं।
1.गायेश्वर चंद्र रॉय- ढाका-3 सीट से
- निताई रॉय चौधरी – मगरी-2 सीट से
3.एडवोकेट दिपेन देवान – रंगामाटी सीट से
4.इसके अलावा साचिंग प्रू नाम के एक और अल्पसंख्यक उम्मीदवार ने बंदरबन से जीत दर्ज की, लेकिन कुल संख्या फिर भी बहुत कम है।
अल्पसंख्यक भागीदारी के लिए चिंता का विषय
इस पूरे चुनाव में केवल चार अल्पसंख्यक तीन हिंदू और एक आदिवासी उम्मीदवार ही जीतकर संसद में अपनी जगह बनाने में सफल रहे। यह आंकड़ा बांग्लादेश में अल्पसंख्यक भागीदारी के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि हिंदू आबादी देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8% है। पिछले 20 वर्षों में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व आम तौर पर 14 से 20 सीटों तक रहता था, लेकिन इस बार यह संख्या बेहद कम रहा।
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79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार में केवल चार जीते
चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें बीएनपी के चार विजयी हुए। इसके अलावा, जमात-ए-इस्लामी का हिंदू उम्मीदवार हार गया। यह परिणाम न केवल अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भागीदारी पर सवाल खड़े करते हैं, बल्कि देश की बदलती राजनीतिक तस्वीर को भी उजागर करते हैं। इतना ही नहीं विशेषज्ञों का तो यह भी मानना है कि इस जीत और हार का संकेत यह देता है कि बांग्लादेश की राजनीति में अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा और प्रतिनिधित्व अभी भी चुनौतीपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
अब जानते हैं कि कौन-कौन से उम्मीदवारों ने मारी बाजी
बात अगर विजेता उम्मीदवारों की करें तो इसमें सबसे पहला नाम बीएनपी के वरिष्ठ नेता गायेश्वर चंद्र रॉय है। रॉय ने ढाका-3 सीट से जीत हासिल की। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को लगभग 99 हजार वोटों से हराया। यह जीत खास इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल में हिंदू समुदाय के खिलाफ कुछ घटनाएं हुई थीं।
मुगरा-2 से निताई रॉय चौधरी जीतीं
वहीं दूसरे हिंदू विजेता उम्मीदवार की बात करें तो मगुरा-2 सीट से बीएनपी की उपाध्यक्ष निताई रॉय चौधरी ने भी आसानी से जीत दर्ज की। उन्हें लगभग 1,47,896 वोट मिले। जो जमात-ए-इस्लामी के मुस्तर्शीद बिल्लाह से अधिक थे, जिन्हें 1,17,018 वोट मिले थे। वे पार्टी में अल्पसंख्यक समुदाय का प्रभावशाली चेहरा मानी जाती हैं।
इस सीट से दिपेन दीवान जीते
वहीं तीसरे उम्मीदवार के रूप में बीएनपी के एडवोकेट दीपेन दीवान ने जीत दर्ज की है। उन्होंने रंगामती सीट से करीब 31 हजार वोट लेकर जीत हासिल की। उन्हें कुल 31,222 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी, निर्दलीय उम्मीदवार पाहेल चकमा, को 21,544 वोट ही मिले। इसके साथ ही, सचिन प्रू चौथे बीएनपी उम्मीदवार हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए संसद में जगह बनाई। प्रू ने बंदरबन निर्वाचन क्षेत्र से कुल 1,41,455 वोट हासिल किए।
अब समझिए अन्य दलों का प्रदर्शन
गौरतलब है कि बांग्लादेश चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने कुल 68 सीटें जीतें, लेकिन उसके टिकट पर चुनाव लड़ने वाले एकमात्र हिंदू उम्मीदवार हार गए। कुल मिलाकर 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार चुनाव में शामिल थे, जिनमें 10 महिलाएं भी थीं। 60 पंजीकृत राजनीतिक दलों में से 22 ने अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को मैदान में उतारा।
पहले क्या स्थिति थी?
- पोर्ट्स के मुताबिक शेख हसीना के लंबे कार्यकाल के दौरान संसद में हिंदू सांसदों की संख्या इससे कहीं ज्यादा रही थी.
- 009-2014 की संसद में 16 हिंदू सांसद थे
- 014-2019 में यह संख्या बढ़कर 17 (और आरक्षित सीटों के साथ 20 तक) पहुंची
- 2019-2024 में करीब 14 अल्पसंख्यक सांसद थे
सवाल क्यों उठ रहे हैं?
देश की लगभग 8 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद संसद में 1 प्रतिशत से भी कम प्रतिनिधित्व होना चिंता का विषय माना जा रहा है राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय कई इलाकों में निर्णायक भूमिका निभाता है, लेकिन टिकट वितरण और चुनावी गणित में उनकी हिस्सेदारी सीमित रह जाती है। इसके अलावा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा भी चर्चा में रहा।