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ममता बनर्जी ने ठानी रार : संसद में चुनाव आयुक्त के खिलाफ आ सकता है महाभियोग? जाने सीईओ को हटाने की पूरी प्रक्र‍िया

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने के संकेत दिए हैं। ममता ने साफ किया है कि अगर कांग्रेस या राहुल गांधी इस तरह का प्रस्ताव लाते. . .

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने के संकेत दिए हैं। ममता ने साफ किया है कि अगर कांग्रेस या राहुल गांधी इस तरह का प्रस्ताव लाते हैं, तो तृणमूल कांग्रेस इस पर अपनी पार्टी के भीतर चर्चा करेगी और समर्थन दे सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट जाने के सवाल पर उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले हैं।राजनीतिक गलियारों में इस बयान के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि क्या विपक्ष वाकई CEC को हटाने के लिए संसद का दरवाजा खटखटाएगा? आख‍िर इसकी प्रक्रिया है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया वही है, जो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाने की है। यह प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी होती है. इसे महाभियोग जैसी प्रक्रिया कहा जाता है.इसके ल‍िए मिसव‍िहैव‍ियर या अक्षमता का आरोप साबित होना जरूरी शर्त है।

स्‍टेप बॉय स्‍टेप पूरी प्रकिया जाने

स्टेप-1: प्रस्‍ताव पेश करना
सबसे पहले संसद के किसी भी सदन में हटाने का प्रस्ताव लाया जाता है।
अगर लोकसभा में प्रस्ताव लाना है, तो कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
अगर राज्यसभा में प्रस्ताव लाना है, तो कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।

स्टेप-2: स्पीकर का फैसला
प्रस्‍ताव लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा चेयरमैन को सौंपा जाता है. यहां स्पीकर या चेयरमैन के पास यह अधिकार होता है कि वे इस प्रस्ताव को स्वीकार करें या खारिज कर दें. अगर वे इसे खारिज कर देते हैं, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है।

स्टेप-3: जांच समिति
अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए एक 3 सदस्यीय समिति बनाई जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, एक कानूनव‍िद शामिल होते हैं।

स्टेप-4: रिपोर्ट और वोटिंग
अगर जांच समिति CEC को दोषी पाती है, तो रिपोर्ट सदन में रखी जाती है। इसके बाद वोटिंग होती है. CEC को हटाने के लिए दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में विशेष बहुमत की जरूरत होती है , यानी सदन की कुल सदस्यता का बहुमत से अधिक सांसद पक्ष में होने चाह‍िए. और उस दिन सदन में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत होना चाह‍िए।

स्टेप-5: राष्ट्रपति की मंजूरी
अगर दोनों सदन एक ही सत्र में इस प्रस्ताव को पारित कर देते हैं, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. अंत में, राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश जारी करते हैं।

क्या कभी किसी CEC को हटाया गया है?

जवाब है- नहीं. भारत के इतिहास में आज तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा उनके पद से नहीं हटाया गया है। 1990 के दशक में टी.एन. शेषन के कड़े फैसलों को लेकर राजनीतिक दलों में भारी नाराजगी थी। उस वक्त उनके खिलाफ महाभियोग लाने की चर्चाएं बहुत गरम हुई थीं, लेकिन कभी प्रस्ताव पेश नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. रामास्वामी (1993) के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद में लाया गया था और जांच समिति ने उन्हें दोषी भी पाया था। लेकिन लोकसभा में वोटिंग के दौरान कांग्रेस ने वोट नहीं किया, जिससे प्रस्ताव गिर गया और वे हटने से बच गए।

विपक्ष के लिए क्या है चुनौती?

ममता बनर्जी और विपक्ष अगर CEC के खिलाफ प्रस्ताव लाते भी हैं, तो सबसे बड़ी चुनौती ‘नंबर गेम’ की है. प्रस्ताव को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है, जो वर्तमान में एनडीए सरकार के प्रचंड बहुमत को देखते हुए विपक्ष के पास नहीं है। ऐसे में यह कदम कानूनी से ज्यादा ‘राजनीतिक दबाव’ बनाने वाला साबित हो सकता है।

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