नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) वाली महिला अधिकारी अब परमानेंट कमीशन की पूरी हकदार हैं। क्या यह फैसला सेना और नौसेना में लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा? कोर्ट ने 250 महिलाओं पर लागू की गई मनमानी सीमा और मूल्यांकन के भेदभावपूर्ण तरीके को रद्द किया।
महिला अधिकारियों के खिलाफ भेदभाव कैसे हुआ?
क्या महिला SSC अधिकारियों का मूल्यांकन सही ढंग से किया गया था? सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में लापरवाही और भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया गया। यह ACR सिस्टम महिलाओं को हमेशा परमानेंट कमीशन के लिए अयोग्य मानने की धारणा पर आधारित था। पुरुष अधिकारियों के मुकाबले महिलाओं को अनुचित नुकसान उठाना पड़ा।
नेवी और सेना में सुधार के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नेवी का डायनामिक वैकेंसी मॉडल सही नहीं है और इसमें पारदर्शिता की कमी थी। अब सभी मूल्यांकन प्रणालियों और ACR सिस्टम की पूरी समीक्षा होगी। क्या यह महिलाओं के करियर में आने वाले अन्याय को पूरी तरह खत्म कर देगा? कोर्ट ने सुनिश्चित किया कि अब महिलाओं को उनके पुरुष समकक्षों के बराबर अवसर मिलें।
परमानेंट कमीशन की योग्यता और विशेष नियम
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि 2009 के बाद भर्ती हुई महिलाएं और विशेष उपाय के तहत योग्य पाई गई महिला अधिकारी, मेडिकल फिटनेस की शर्त पूरी होने पर कमीशन के हकदार हैं। साथ ही, रिटायरमेंट लाभ के लिए उन्हें 20 साल की सेवा पूरी कर चुकी अधिकारी माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिर्फ महिलाओं को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सेना और नौसेना में समग्र मूल्यांकन प्रक्रियाओं और पारदर्शिता को मजबूती देने का भी निर्देश दिया।