डेस्क। मौनी अमावस्या केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने का अवसर है। इस दिन मौन व्रत रखने की परंपरा हमें सिखाती है कि हर समस्या का समाधान शब्दों में नहीं, शांति और समझ में छिपा होता है। जब हम बोलना कम करते हैं, तो सुनना, समझना और महसूस करना सीखते हैं। यही मौन की असली ताकत है।
मौन कोई कमजोरी नहीं, आत्मबल है
आज की तेज रफ्तार ज़िंदगी में हम हर बात का जवाब तुरंत देना चाहते हैं। लेकिन मौन हमें यह सिखाता है कि हर प्रतिक्रिया जरूरी नहीं होती। कई बार चुप रहना ही सबसे बड़ा उत्तर बन जाता है। मौन क्रोध को ठंडा करता है, विचारों को स्पष्ट करता है और मन को स्थिरता देता है। मौनी अमावस्या पर कुछ समय का मौन व्रत हमें मानसिक शुद्धि और आत्मनियंत्रण का अभ्यास कराता है।
जब शब्द थक जाएं, तब मौन बोलता है
मौन आत्मसंवाद का माध्यम है। जब बाहर की आवाजें थमती हैं, तब भीतर की आवाज सुनाई देती है। यही कारण है कि ऋषि-मुनियों ने मौन को साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। मौनी अमावस्या पर मौन रखकर हम अपने निर्णयों, रिश्तों और जीवन की दिशा पर गहराई से विचार कर सकते हैं। ज्यादा नहीं तो दिन में बस 15 मिनट के लिए मौन रखें। शब्द, विचार – सब त्याग दें। जो शून्य उभरेगा, वो आपके जीवन को एक अलग ही दिशा देगा।
मौन पर महान व्यक्तियों के विचार
- मौन आत्मा की गहराइयों को समझने का सबसे सशक्त माध्यम है। – महात्मा गांधी
- कुछ क्षण का मौन, घंटों के उपदेश से अधिक प्रभावी होता है। – स्वामी विवेकानंद
- मौन महान शक्ति का स्रोत है। – Lao Tzu
- शांत वातावरण में ही गहन विचार जन्म लेते हैं। – अल्बर्ट आइंस्टीन
मौनी अमावस्या से जीवन की सीख
मौनी अमावस्या हमें यह संदेश देती है कि बोलने से पहले सोचना और चुप रहकर समझना भी जीवन की एक कला है। अगर हम रोजमर्रा की ज़िंदगी में भी कुछ पल मौन को दे दें, तो तनाव कम होगा, रिश्ते बेहतर होंगे और निर्णय अधिक संतुलित बनेंगे। इसलिए मौन अपनाइए, क्योंकि शांति में ही समाधान जन्म लेता है।