इस्लामाबाद। पाकिस्तान की सेना ने रविवार तड़के अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में एयरस्ट्राइक की। अल-जजीरा के मुताबिक पाकिस्तानी सेना ने दावा किया कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और इस्लामिक स्टेट से जुड़े सात कैंपों और ठिकानों को निशाना बनाया गया।
पाकिस्तान सरकार ने इसे हालिया आत्मघाती हमलों के बाद जवाबी अटैक बताया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि यह इंटेलिजेंस बेस्ड ऑपरेशन था। पाकिस्तान ने कहा, ‘हमारे पास पुख्ता सबूत हैं कि हमले अफगानिस्तान की जमीन से चल रहे नेटवर्क ने कराए।’
अफगानिस्तानी मीडिया टोलो न्यूज के मुताबिक हमले में नांगरहार के एक घर को निशाना बनाया, जिससे एक ही परिवार के 23 लोग मलबे के नीचे दब गए। अब तक सिर्फ चार लोगों को निकाला जा सका है। हमले के समय परिवार सो रहा था, इसलिए उन्हें भागने का मौका ही नहीं मिला।
अमेरिकी मानवाधिकार संगठन इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन (IHRF) के मुताबिक इसमें 19 लोगों की मौत हो गई। इसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। हालांकि, आंकड़ों की आधिकारिक जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
अफगानिस्तान बोला- सही समय पर कड़ा जवाब देंगे
अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने सही समय पर पाकिस्तान को जवाब देने की चेतावनी दी है। मंत्रालय ने इन हमलों को अफगानिस्तान की गोपनीयता नीति का उल्लंघन बताया। अफगान सूत्रों के अनुसार पक्तिका में एक धार्मिक स्कूल पर ड्रोन हमला हुआ और नांगरहार प्रांत में भी कार्रवाई की गई। पाकिस्तान ने कहा है कि उन्होंने आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया, लेकिन अफगान स्रोतों के अनुसार नागरिकों को नुकसान हुआ। पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान सरकार से मांग करता रहा है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी भी आतंकी संगठन को न करने दे। इस्लामाबाद का आरोप है कि TTP अफगानिस्तान से संचालित हो रहा है, जबकि तालिबान इन आरोपों से इनकार करता रहा है।
पाकिस्तान की मांग- अंतरराष्ट्रीय समुदाय तालिबान पर दबाव डाले
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह 2020 में दोहा में अमेरिका के साथ हुए समझौते के तहत तालिबान पर दबाव डाले, ताकि अफगान जमीन का इस्तेमाल दूसरे देशों के खिलाफ न हो। 2020 का दोहा समझौता जिसे अफगानिस्तान में शांति प्रयास भी कहा जाता है। यह अमेरिका और तालिबान के बीच 29 फरवरी 2020 को कतर की राजधानी दोहा में हस्ताक्षरित हुआ था। यह समझौता अफगानिस्तान में 2001 से चल रहे युद्ध को समाप्त करने और अमेरिकी बलों की वापसी का रास्ता बनाने के लिए किया गया था। तालिबान ने प्रतिबद्धता जताई कि वह अफगानिस्तान की जमीन को अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले किसी भी समूह या व्यक्ति को इस्तेमाल नहीं करने देगा।
इसमें विशेष रूप से अल-कायदा और अन्य अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों से संबंध तोड़ने और उन्हें अफगानिस्तान में भर्ती, प्रशिक्षण, फंडिंग या हमले की अनुमति न देने का वादा शामिल था। समझौते के बाद अमेरिका ने 2021 में अपनी सेना वापस बुला ली, जिसके बाद तालिबान ने तेजी से काबुल पर कब्जा कर लिया