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क्या बंगाल में लगेगा राष्ट्रपति शासन ? ED–TMC टकराव ने बढ़ाया सियासी संकट, धारा 356 की चर्चा तेज़

कोलकाता में एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) की I-PAC पर छापेमारी के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में उबाल आ गया है। कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में इंडियन पोलिटिकल एक्शन कमिटी और इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के ठिकानों पर. . .

कोलकाता में एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) की I-PAC पर छापेमारी के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में उबाल आ गया है। कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में इंडियन पोलिटिकल एक्शन कमिटी और इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के ठिकानों पर 12 घंटे चली रेड के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद मौके पर पहुंचीं। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता हाई कोर्ट में ED की कार्रवाई को चुनौती दी। विपक्ष ने अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की मांग तेज कर दी है, हालांकि कानूनी रास्ता आसान नहीं माना जा रहा।
गुरुवार को कोलकाता में एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट की कार्रवाई ने बंगाल की राजनीति को हिलाकर रख दिया। कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में ED ने इंडियन पोलिटिकल एक्शन कमिटी (I-PAC) और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के ठिकानों पर मैराथन तलाशी अभियान चलाया। यह छापेमारी करीब 12 घंटे तक चली, जिसने जांच को तकनीकी दायरे से निकालकर सीधे सियासी टकराव में ला खड़ा किया। एजेंसी का दावा है कि यह कार्रवाई साक्ष्यों के आधार पर थी, न कि राजनीतिक कारणों से। विज्ञापन छापेमारी के दौरान माहौल तब और गर्म हो गया, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद पहले लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के आवास और फिर साल्टलेक सेक्टर-5 के I-PAC कार्यालय पहुंचीं. यहां से उनके हाथ में एक फाइल और लैपटॉप निकलने के दृश्य ने विवाद को नई दिशा दी। मुख्यमंत्री ने कई घंटे मौके पर रहकर ED की कार्रवाई पर सवाल उठाए। इस घटनाक्रम ने एजेंसी और राज्य प्रशासन के बीच टकराव को सार्वजनिक कर दिया।

हाईकोर्ट में दी चुनौती

अब कोलकाता से लेकर दिल्ली तक टीएमसी का विरोध प्रदर्शन चल रहा है। दिल्ली में आठ सांसदों ने तख्ती लेकर इस छापेमारी का विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी को चुनौती दी है। याचिका में टीएमसी ने कहा है कि वह बंगाल में SIR के खिलाफ लगातार विरोध कर रही है, इसी वजह से ईडी ने बदले की कार्रवाई करते हुए पार्टी के राजनीतिक रणनीति कार्यालय आई-पैक और उसके सह-संस्थापक के आवास पर तलाशी और जब्ती की है। हाईकोर्ट से टीएमसी ने ईडी की कार्रवाई को गैरकानूनी घोषित करने और जब्त दस्तावेजों पर रोक लगाने की मांग की है।

ED का पलटवार

ED ने ममता के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जांच के दौरान उनके काम में बाधा डाली गई और कुछ दस्तावेज व डिजिटल सबूत जबरन हटाए गए। एजेंसी ने इस पूरे घटनाक्रम को कलकत्ता हाई कोर्ट के समक्ष उठाया है. ED का कहना है कि PMLA के तहत चल रही जांच में राज्य मशीनरी का हस्तक्षेप कानून के खिलाफ है। अब अदालत की सुनवाई तय करेगी कि किसका दावा टिकता है।

राष्ट्रपति शासन की मांग तेज

पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में संवैधानिक संकट पैदा कर दिया है और उनकी मांग अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन पर आधारित है। इतिहास देखें तो बंगाल में 1968, 1970 और 1971 में राष्ट्रपति शासन लग चुका है, लेकिन 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद ऐसा नहीं हुआ। 2021 की चुनावी हिंसा के बाद भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रपति शासन की मांग की थी, जिसे केंद्र ने स्वीकार नहीं किया।

क्या वाकई अनुच्छेद 356 लागू हो सकता है?

संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत केंद्र सरकार राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रपति शासन लगा सकती है, लेकिन एस.आर. बोम्मई केस (1994) में सुप्रीम कोर्ट ने इस शक्ति पर कड़े प्रतिबंध लगाए। फैसले के अनुसार, राष्ट्रपति शासन तभी लगाया जा सकता है जब राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह टूट जाए; साथ ही केंद्र को संसद में बहुमत से इसे मंजूरी दिलानी होती है। इसलिए राजनीतिक आरोप भर से 356 लागू होना आसान नहीं है।

क्या है IPC की धारा 186 ?

वर्तमान विवाद में आरोप है कि राज्य सरकार की ओर से जांच में हस्तक्षेप हुआ, जिसे IPC की धारा 186 (सरकारी कार्य में बाधा) के दायरे में देखा जा सकता है। दूसरी ओर प्रवर्तन निदेशालय के पास PMLA की धारा 67 के तहत व्यापक अधिकार हैं; यदि एजेंसी यह साबित कर दे कि सबूत हटाए गए या जांच बाधित की गई, तो सख्त कार्रवाई संभव है। हालांकि, राज्य पुलिस द्वारा ईडी अधिकारियों पर FIR दर्ज किए जाने से संघीय तनाव बढ़ा है, जो राजनीतिक बनाम कानूनी टकराव को और जटिल बना देता है।

संभावना है, पर राह कठिन

राजनीतिक बयानबाज़ी के बावजूद, मौजूदा कानूनी ढांचे और बोम्मई फैसले की कसौटी पर राष्ट्रपति शासन तक पहुंचना आसान नहीं है। जब तक राज्यपाल की ठोस रिपोर्ट, संवैधानिक विफलता के स्पष्ट प्रमाण और संसद की मंजूरी एक साथ न हों, तब तक 356 लागू होने की संभावना सीमित ही रहेगी।

कोयला तस्करी केस की जड़ें कहां हैं

यह पूरा मामला नवंबर 2020 में दर्ज CBI की FIR और उसके बाद ED की ECIR से जुड़ा है. जांच के केंद्र में कोयला तस्करी का नेटवर्क है, जिसमें मुख्य आरोपी अनूप माझी और उसके सहयोगियों पर ईस्टर्न कलफ़ील्ड्स लिमिटेड के पट्टा क्षेत्रों से अवैध खनन का आरोप है। ED के अनुसार, तस्करी से कमाए गए पैसे को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए आगे बढ़ाया गया। यहीं से जांच का तार I-PAC तक पहुंचा।

हवाला नेटवर्क और फंडिंग की कड़ी

ED की पड़ताल में एक बड़े हवाला नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसके जरिए कोयला तस्करी से मिली रकम इधर-उधर की गई। एजेंसी का दावा है कि इसी नेटवर्क के माध्यम से I-PAC तक भारी मात्रा में फंड ट्रांसफर हुआ। इसी कड़ी में दिल्ली और कोलकाता में कई ठिकानों पर छापेमारी की गई। ED का कहना है कि ये लेनदेन जांच के दायरे में हैं और दस्तावेजी साक्ष्यों से जुड़े हुए हैं।

कोलकाता पुलिस की भूमिका पर सवाल

छापेमारी के दौरान कोलकाता पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी और ED अधिकारियों के पहचान पत्रों की जांच पर भी सवाल उठे। ED का आरोप है कि राज्य पुलिस और कुछ सहयोगियों ने जांच सामग्री हटाने में मदद की। इस दौरान पुलिस आयुक्त मनोज वर्मा की मौजूदगी भी चर्चा में रही। यह पहलू जांच बनाम प्रशासनिक अधिकारों की बहस को और जटिल बनाता है।

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