नई दिल्ली। लीबिया के पूर्व शासक कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के बेटे सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। 53 साल के सैफ अल-इस्लाम की मौत की पुष्टि उनके राजनीतिक दल के प्रमुख की तरफ से की गई है। हालाकि सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी की हत्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
गोलियों से भून डाला
एक रिपोर्ट के मुताबिक, सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी के वकील ने बताया कि चार लोगों के एक कमांडो दस्ते ने लीबिया के जिंतान शहर में उनके घर पर हमला बोला और उन्हें गोलियों से भून डाला। हमलावर कौन थे और किसके कहने पर ये हत्या की गई, इसका पता नहीं चल सका है। ये एक सुनियोजित हत्या थी। वहीं एक स्थानीय टीवी ने सैफ अल-इस्लाम की बहन के हवाले से अपनी रिपोर्ट में बताया है कि उनकी हत्या लीबिया-अल्जीरिया सीमा के पास हुई है।लीबिया के पूर्व तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के उत्तराधिकारी माने जाने वाले सैफ अल-इस्लाम एक दशक तक कैद और गुमनामी में रहे थे। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की कोशिश की थी। वे किसी आधिकारिक पद पर नहीं थे। उन्हें अपने पिता के शासन के दौरान सबसे ताकतवर शख्स माना जाता था। फिलहाल इस हत्याकांड की ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
उधर, सैफ अल-इस्लाम की राजनीतिक दल ने हमले की जांच की मांग लीबियाई न्यायपालिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से की है। उसका मानना है कि यह सिर्फ हत्या नहीं बल्कि एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है।
कौन था सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी?
तानाशाह पिता के राज में सैफ अल-इस्लाम ने लीबिया की नीति को आकार दिया. उन्होंने हाई-प्रोफाइल, संवेदनशील राजनयिक मिशनों में लीबिया की तरफ से मध्यस्थता की, लीबिया द्वारा सामूहिक विनाश के हथियार छोड़ने पर पश्चिमी देशों के साथ हुए बातचीत का नेतृत्व किया।1988 में स्कॉटलैंड के लॉकरबी में पैन एम फ्लाइट 103 की बमबारी में मारे गए लोगों के परिवारों के लिए मुआवजे पर भी सैफ ने बातचीत की थी।
लीबिया को वो दुनिया के साथ लाना चाहते थे. उसकी अछूत स्थिति से छुटकारा दिलाने के लिए सैफ अल-इस्लाम ने पश्चिम के साथ मिलकर काम किया और खुद को एक सुधारक के रूप में प्रचारित किया। उन्होंने एक संविधान और मानवाधिकारों के सम्मान की मांग की।
खास बात है कि सैफ अल-इस्लामी गद्दाफी ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की थी।फटाफट अंग्रेजी बोलते थे। उन्हें एक समय कई सरकारें लीबिया के स्वीकार्य, पश्चिमी-अनुकूल चेहरे के रूप में देखती थीं। लेकिन जब 2011 में गद्दाफी के लंबे शासन के खिलाफ विद्रोह हुआ, तो सैफ अल-इस्लाम ने तुरंत विद्रोहियों पर क्रूर कार्रवाई करने के लिए परिवार और कबीले की वफादारी को चुना।रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार विद्रोह के समय बात करते हुए उन्होंने कहा था: “हम यहां लीबिया में लड़ते हैं, हम यहां लीबिया में मरते हैं।”
उन्होंने चेतावनी दी कि खून की नदियां बहेंगी और सरकार अंतिम आदमी और औरत तक लड़ेगी और गोली चलाएगी। उन्होंने टीवी पर आकर उंगली हिलाते हुए कहा था, “पूरा लीबिया नष्ट हो जाएगा. देश को चलाने के तरीके पर एक समझौते पर पहुंचने में हमें 40 साल लगेंगे, क्योंकि आज, हर कोई राष्ट्रपति या अमीर बनना चाहेगा और हर कोई देश चलाना चाहेगा।”।
तानाशाह पिता के मौत के बाद की जिंदगी
2011 में ही विद्रोहियों ने लीबिया की राजधानी त्रिपोली पर कब्जा कर लिया. फिर सैफ अल-इस्लाम ने बेडौइन जनजाति के वेश में पड़ोसी देश नाइजर भागने की कोशिश की। लेकिन अबू बक्र सादिक ब्रिगेड मिलिशिया ने उसे एक रेगिस्तानी सड़क पर पकड़ लिया।लगभग एक महीने बाद उसके पिता की 20 अक्टूबर 2011 को विद्रोहियों गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद सैफ को पश्चिमी शहर ज़िंटान ले जाया गया. सैफ अल-इस्लाम को एक लीबियाई खानाबदोश ने धोखा देकर विद्रोहियों के हवाले किया था।
सैफ ने अगले छह साल जिंटान में हिरासत में बिताए। यह जिंदगी तानाशाह पिता के राज में बिताए आलिशान जिंदगी से काफी अलग थी। कभी सैफ के पास अपने पालतू बाघ थे, वो बाज के साथ शिकार करते थे और लंदन ट्रिप पा जाकर ब्रिटिश उच्च समाज के साथ घुलमिल जाता था। 2015 में, सैफ अल-इस्लाम को युद्ध अपराधों के लिए त्रिपोली की एक अदालत ने मौत की सजा सुनाई। इतना ही नहीं सैफ अल-इस्लाम युद्ध अपराधों के लिए इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) द्वारा भी वांटेड था. अदालत ने “हत्या और उत्पीड़न” के लिए उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था।
2017 में रिहा किया गया
सैफ अल-इस्लाम 2017 में रिहा होने के बाद हत्या के डर से वर्षों तक जिंटान में छिपे रहे. 2016 से, उन्हें लीबिया के अंदर और बाहर लोगों से संपर्क करने की अनुमति दी गई। 2021 में पारंपरिक वेशभूषा में राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी दाखिल करने सभा पहुंचे। उनकी रणनीति यह थी कि 2011 से पहले के अपेक्षाकृत स्थिर दौर की यादों को भुनाकर जनता का समर्थन हासिल किया जाए। लेकिन उनकी उम्मीदवारी अत्यंत विवादास्पद रही. गद्दाफी शासन के पीड़ितों और 2011 के विद्रोह से उभरे सशस्त्र गुटों ने इसका कड़ा विरोध किया। 2015 की सजा के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया और अपील की कोशिश भी हिंसा और अवरोध के कारण विफल रही। इन विवादों ने 2021 की चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह ठप कर दिया और लीबिया एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध में लौट गया. अब 3 फरवरी 2026 को उनकी हत्या की खबर आ गई है।