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तो चूहों की आबादी बढ़ जाएगी, आवारा कुत्ते मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प दलीलें, अदालत ने कहा- तो क्या बिल्लियां ले आएं

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर सुनवाई जारी है। एनिमल वेलफेयर की तरफ से दलील दे रहे एडवोकेट सीयू सिंह ने कहा कि कुत्ते हटाने से चूहों की आबादी बढ़ेगी। इस पर कोर्ट ने मजाकिया. . .

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों पर सुनवाई जारी है। एनिमल वेलफेयर की तरफ से दलील दे रहे एडवोकेट सीयू सिंह ने कहा कि कुत्ते हटाने से चूहों की आबादी बढ़ेगी। इस पर कोर्ट ने मजाकिया अंदाज में कहा- तो क्या बिल्लियां ले आएं?
बुधवार को इस मामले में करीब ढाई घंटे तक सुनवाई हुई थी। इस दौरान कोर्ट ने पूछा कि कुत्तों के कारण आम लोगों को आखिर कब तक परेशानी झेलनी पड़ेगी। कोर्ट ने कहा कि उसका आदेश सड़कों के लिए नहीं, बल्कि केवल संस्थागत क्षेत्रों के लिए है।
बेंच ने यह भी कहा कि पिछले 20 दिनों में हाईवे पर आवारा कुत्तों की वजह से दो जजों के साथ एक्सीडेंट हुए हैं। इसमें एक जज की हालत गंभीर है। बेंच ने सवाल उठाया कि स्कूलों, अस्पतालों और अदालत परिसरों के भीतर आवारा कुत्तों की क्या आवश्यकता है और उन्हें वहां से हटाने पर क्या आपत्ति हो सकती है।
यह मामला 28 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट के एक्शन से शुरू हुआ था, जब दिल्ली में आवारा कुत्तों के काटने से होने वाली रैबीज बीमारी पर एक मीडिया रिपोर्ट पब्लिश की गई थी। इस मामले में अब तक 5 बार सुनवाई हो चुकी है।

वकील बोले- हमें नहीं पता कि कुत्ता किसे पसंद करता है, किसे नहीं

वकील: एक पालतू कुत्ते का मालिक होता है। जबकि आवारा कुत्ते का कोई मालिक नहीं होता। न ही यह राज्य की जिम्मेदारी है। हालांकि राज्य का काम वैक्सीनेशन वगैरह देना है। ABC नियम ऐसे होने चाहिए कि मेरे घर तक का रास्ता सुरक्षित रहे।
वकील ने आगे कहा कि हम यह सुझाव नहीं दे रहे हैं कि कुत्तों को खत्म कर दिया जाए। लेकिन कानून को सही नजरिए से समझना होगा। हम कुत्तों को हमेशा के लिए शेल्टर होम में रखने की बात नहीं कर रहे हैं। हमें नहीं पता कि कुत्ता किसे पसंद करता है किसे नहीं।

वकील की दलील- कुत्ते की काउंसलिंग संभव नहीं, लेकिन मालिक की तो है

आवारा कुत्तों को हटाने की याचिकाकर्ता के वकील: अदालत का आदेश सिर्फ संस्थानों तक सीमित नहीं होना चाहिए। बल्कि उसे रिहायशी इलाकों पर भी लागू किया जाना चाहिए। वकील ने साफ कहा कि कुत्ते को समझाना (काउंसलिंग) संभव नहीं है, लेकिन कुत्ते की देखभाल करने वाले या मालिक को समझाया जा सकता है।
वकील ने जोर देकर कहा कि ABC नियम (एनिमल बर्थ कंट्रोल) इसलिए बनाए गए हैं ताकि कुत्तों की संख्या धीरे-धीरे कम हो, न कि बढ़ाने के लिए नहीं।उन्होंने बताया कि पालतू जानवर और सड़कों पर रहने वाले लेकिन इंसानों के आदी जानवर, दोनों में फर्क समझना जरूरी है।

सीनियर एडवोकेट नकुल दीवान- कुत्तों की तुलना भैंसों से नहीं की जा सकती

सीनियर एडवोकेट नकुल दीवान (एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील): मेरा क्लाइंट वर्ल्ड फॉर एनिमल्स एनजीओ चलाने वाला व्यक्ति है। एनजीओ में 45 लोग काम करते हैं। इस टीम ने 66000 कुत्तों को बचाया है, 15000 की नसबंदी की है।
उनके सुझाव ये हैं- – एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई जाए। जिसका मकसद कुत्तों की आबादी की ग्रोथ को कम करना है। – सड़कों पर मेरे पीछे कुत्ते के दौड़ने का खतरा है, लेकिन यह भी खतरा है कि कोई बस मुझे टक्कर मार देगी (क्योंकि दौड़ने वालों के लिए फुटपाथ नहीं हैं)। – कुत्तों के स्वभाव को ध्यान में रखते हुए, यह जरूरी है कि उन्हें उसी जगह वापस छोड़ा जाए जहां से उन्हें पकड़ा गया था। कुत्तों की तुलना मुर्गों, भैंसों से करना शायद सही नहीं होगा। – अगर आज आपको कोई समस्या है, तो आपको एक मानवीय समाधान खोजना होगा। हरियाणा, असम के हलफनामे साफ बताते हैं कि उनके पास मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। जस्टिस नाथ: किसी और की तो बात ही छोड़ दो। दिल्ली के पास ही नहीं है।

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