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बंगाल विधानसभा चुनाव से पहल महापुरुषों पर सियासत : ‘बंकिमदा’ के बाद ‘स्वामी रामकृष्ण’ ! मोदी के पोस्ट पर ममता हैरान, जताई आपत्ति

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर राजनीति पहले से चल रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार के मंदिर और सांस्कृतिक परिसरों से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं ने. . .

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर राजनीति पहले से चल रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार के मंदिर और सांस्कृतिक परिसरों से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच सियासी टकराव को और गहरा कर दिया है।
इस बीच अब बंगला में महापुरुषों पर भी राजनीति शुरू हो गई है। महापुरुषों को लेकर तृणमूल और भाजपा आमने सामने दिख रहे हैं। ठाकुर श्री श्री रामकृष्ण परमहंसदेव की 191वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स पर किया गया एक पोस्ट राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में रामकृष्ण परमहंसदेव को “स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी” कहकर श्रद्धांजलि दी, जिस पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कड़ी आपत्ति जताई है।

क्या लिखा प्रधानमंत्री ने?

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पोस्ट में लिखा, “स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि। उन्होंने जिस प्रकार आध्यात्मिकता और साधना को जीवन की शक्ति के रूप में स्थापित किया, वह हर युग में मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी। उनके विचार और संदेश सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेंगे।”
पोस्ट सामने आते ही राज्य की राजनीति में इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई।

ममता बनर्जी की आपत्ति

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के पोस्ट को री-शेयर करते हुए लिखा कि वह “फिर से हैरान” हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने बंगाल की महान विभूतियों के प्रति सांस्कृतिक असंवेदनशीलता दिखाई है और रामकृष्ण परमहंसदेव के नाम के साथ “अनुपयुक्त उपसर्ग ‘स्वामी’” जोड़ा है।
ममता ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि श्री रामकृष्ण को व्यापक रूप से “ठाकुर” के रूप में सम्मानित किया जाता है। उनके अनुसार, गुरु के देहावसान के बाद उनके संन्यासी शिष्यों ने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। भारतीय परंपरा के अनुसार उन संन्यासियों को “स्वामी” कहा जाता है, लेकिन स्वयं गुरु को “ठाकुर” या “श्री श्री रामकृष्ण परमहंसदेव” के रूप में ही संबोधित किया जाता है।

‘ठाकुर-मां-स्वामीजी’ की परंपरा

मुख्यमंत्री ने आगे लिखा कि रामकृष्ण परंपरा में पवित्र त्रिमूर्ति “ठाकुर-मां-स्वामीजी” के रूप में जानी जाती है कि ठाकुर हैं श्री रामकृष्ण, मां हैं मां शारदा और स्वामीजी हैं स्वामी विवेकानंद। उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बंगाल के पुनर्जागरण काल के महान व्यक्तित्वों के नामों के साथ नए उपसर्ग या प्रत्यय जोड़ने से बचें।

तृणमूल की प्रतिक्रिया

तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष ने भी प्रधानमंत्री को टैग करते हुए पोस्ट में सवाल उठाया कि “स्वामी रामकृष्ण? क्या आप सुनिश्चित हैं, प्रधानमंत्री जी? वे ठाकुर श्री श्री रामकृष्ण परमहंसदेव हैं, ‘स्वामी’ रामकृष्ण नहीं। कृपया अपना पोस्ट संशोधित करें।”

बढ़ती राजनीतिक गर्मी

गौरतलब है कि हाल ही में “बंकिमदा” संबोधन को लेकर भी विवाद हुआ था। अब “स्वामी रामकृष्ण” को लेकर नया विवाद सामने आने से राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। सांस्कृतिक पहचान और परंपरा के सम्मान को लेकर यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

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