डेस्क। पश्चिम बंगाल में इस साल विधानसभा चुनाव है. चुनाव को लेकर सियासी हलचल बढ़ गई है। बंगाल की सियासत एक बार फिर उसी जगह पर आ गई है, जहां से कभी ममता बनर्जी का सियासी उदय हुआ था। जी हां, सिंगूर में पीएम मोदी की रैली होने वाली है, यहीं से भाजपा को उम्मीद की किरण दिख रही है। सिंगूर वही जगह है, जहां कभी टाटा नैनो की फैक्ट्री हुआ करती थी। अब भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 18 जनवरी को होने वाली रैली के लिए इसी जगह को चुना है। पीएम मोदी की रैली से यहां के लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं।
अपने बंगाल दौरे के दूसरे दिन यानी रविवार को वे हुगली जिले में आने वाले सिंगूर में 830 करोड़ रुपये की विभिन्न विकास परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे। साथ ही जनसभा को संबोधित कर ममता सरकार पर भी निशाना साधेंगे। बीजेपी ने इस सभा को भाजपा की “परिवर्तन संकल्प रैली” का नाम दिया है।
दोपहर 3 बजे सिंगूर पहुंचेंगे PM मोदी
विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सिंगूर दौरा केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं है। इसे राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ अहम दौरा माना जा रहा है।आधिकारिक जानकारी के अनुसार पीएम मोदी दोपहर करीब तीन बजे सिंगूर पहुंचेंगे. वे बुनियादी ढांचे, रेलवे और बंदरगाह से जुड़ी कई अहम परियोजनाओं की नींव रखेंगे।
इस दौरान वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए 3 नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों को हरी झंडी दिखाएंगे। इनमें हावड़ा–आनंद बिहार टर्मिनल, सियालदह–वाराणसी और संतरागाछी–तांबरम अमृत भारत एक्सप्रेस शामिल हैं। सरकार का दावा है कि इन ट्रेनों से लंबी दूरी की यात्रा अधिक किफायती, सुविधाजनक और भरोसेमंद हो जाएगी।
सिंगूर में करीब 1000 एकड़ उपजाऊ जमीन
बात अक्टूबर 2008 की है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर में करीब 1000 एकड़ उपजाऊ जमीन पर एक अजीब सी खामोशी छा गई। यह खामोशी टाटा ग्रुप के तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा की एक नाटकीय घोषणा के बाद आई थी। वह घोषणा थी टाटा के नैनो कार प्रोजेक्ट से जुड़ी। जी हां, खराब कारोबारी माहौल का हवाला देते हुए टाटा ने नैनो कार प्रोजेक्ट को सिंगूर से गुजरात के सानंद में शिफ्ट करने की घोषणा की। तब टाटा ने एक अच्छा एम (गुड एम) और एक बुरा एम (बैड एम) का जिक्र किया था। टाटा की नजर में शायद इसका अर्थ था बुरा एम मतलब ममता बनर्जी और अच्छा एम मतलब गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी. उन्होंने कहा था कि उनके सिर पर बंदूक तान दी गई थी और ट्रिगर दबा दिया गया था।
जमीन ज्यादातर बंजर पड़ी है
अठारह साल बाद भी सिंगूर की वह जमीन ज्यादातर बंजर पड़ी है. खेती वापस शुरू नहीं हुई है। और सिंगूर एक प्रतीक बना हुआ है- खोए हुए मौके, राजनीतिक टकराव और अधूरे वादों का। दरअसल, सिंगूर विवाद के दौरान रतन टाटा ने ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण पश्चिम बंगाल से टाटा मोटर्स का नैनो प्लांट हटाने का फैसला किया था। यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण और ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए किसान आंदोलन से जुड़ा था. इसी के बाद टाटा समूह को प्लांट गुजरात ले जाना पड़ा।
सिंगूर के किसानों का दुख
आज इस जमीन के ज़्यादातर हिस्से पर खेती के कोई निशान नहीं दिखते। किसानों से बात की, जिन्होंने अपनी मर्जी से और बिना मर्ज़ी के ज़मीन दी थी, जिनकी जिंदगी सिंगूर आंदोलन से बदल गई थी। सिंगूर के रहने वाले कौशिक बाग अब 60 के दशक में हैं। उन्होंने बताया कि वह अपनी मर्ज़ी से जमीन देने वाले किसान थे। उन्होंने टाटा फैक्ट्री के लिए सरकार को छह बीघा जमीन दी थी। उन्होंने उस समय तीन महीने की ट्रेनिंग भी ली थी, इस उम्मीद में कि उन्हें रोजगार मिलेगा. लेकिन कुछ नहीं हुआ ।
जमीन मिली मगर अब खेती लायक नहीं
हालांकि जमीन आखिरकार वापस मिल गई. कौशिक कहते हैं कि अब वह खेती के लायक नहीं रही। 18 साल की रुकावट के बाद अब उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा से बदलाव आ सकता है। हालांकि, कौशिक बाग अकेले नहीं हैं। श्यामापदो दास कहते हैं कि वह बिना मर्जी के जमीन देने वाले किसान थे, जिन्होंने तीन बीघा जमीन दी थी। उन्होंने आंदोलन के दौरान मीटिंग और रैलियों में हिस्सा लिया था, यह मानते हुए कि जमीन वापस मिल जाएगी और खेती फिर से शुरू हो जाएगी।
कैसे राजनीति में फंस गए किसान
स्वपन मित्रा अब इसे एक गलती कहते हैं और कहते हैं कि परिवार राजनीति में फंस गया था। आज स्वपन चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी दखल दें और आजीविका बहाल करने में मदद करें। जब पड़ताल की तो पाया कि सिंगूर में जमीन खेती के लिए कितनी मुश्किल हो गई है। माणिक घोष नामक एक और किसान जो शुरू से ही आंदोलन का हिस्सा थे, अब गुजारा करने के लिए ऑटो चलाते हैं। वह कहते हैं कि जमीन वापस मिलने के बाद उन्होंने खेती करने की कोशिश की, लेकिन मिट्टी अब फसल नहीं उगा सकती थी। माणिक का मानना है कि फैक्ट्री उनकी जिंदगी बदल सकती थी और वह मौका अब चला गया है।
सिंगूर को लेकर असहज महसूस कर रही TMC
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस दौरे को केवल विकास परियोजनाओं तक नहीं देखा जाना चाहिए। असल में इसके बहाने पीएम मोदी बंगाल की जनता को बड़ा संदेश देने जा रहा है। जिसकी आंच सीएम ममता और उनकी पार्टी टीएमसी अभी से महसूस कर रही हैं।
असल में पीएम मोदी ने विकास कार्यों और जनसभा के लिए जिस सिंगूर का चयन किया है। यह वही जगह है, जिसने लगभग दो दशक पहले बंगाल की राजनीति बदल दी थी। टाटा नैनो परियोजना को लेकर हुए भूमि अधिग्रहण और उसके खिलाफ चले आंदोलन ने ममता बनर्जी को प्रदेश में बड़ा राजनीतिक चेहरा बना दिया था। इस आंदोलन के बाद नैनो परियोजना बंगाल छोड़कर गुजरात चली गई। सथ ही 2011 में वाममोर्चा के 34 साल पुराने शासन का भी अंत हो गया।
‘विकास बनाम अवरोध’ का संदेश देने की तैयारी
नैनो परियोजना का यह हश्र देखकर बाकी उद्यमियों ने बंगाल से किनारा कर लिया और उसके बाद से राज्य में कोई बड़ा निवेश नहीं हुआ। अब उसी सिंगूर का चयन करके बीजेपी पीएम मोदी के इस दौरे को ‘विकास बनाम अवरोध’ के रूप में पेश करने की तैयारी में है। वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक स्टंट करार दे रही है।
‘TMC ने घुसपैठियों को वोटर बनाने का बड़ा
माना जा रहा है कि सिंगूर में जनसभा के जरिए बीजेपी यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि जिस भूमि पर कभी उद्योगों को रोका गया था, अब वहीं से विकास की नई शुरुआत होगी। भाजपा इस रैली के जरिए ममता सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना चाहती है. साथ ही अपने कार्यकर्ताओं में चुनावी ऊर्जा भी भरना चाहती है।
क्या बीजेपी का दांव हो पाएगा कामयाब?
इससे पहले शनिवार को प्रधानमंत्री मोदी ने मालदा में करीब 3,250 करोड़ रुपये की रेल और सड़क परियोजनाओं का उद्घाटन-शिलान्यास किया। उन्होंने हावड़ा–गुवाहाटी वंदे भारत स्लीपर सहित चार नई अमृत भारत ट्रेनों को भी रवाना किया।इसके जरिए बीजेपी जनता को संदेश दे रही है कि मोदी सरकार बंगाल में बुनियादी ढांचे को लेकर आक्रामक रणनीति अपना रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सिंगूर और नंदीग्राम जैसे इलाके बंगाल की राजनीति की धुरी रहे हैं। ऐसे में बीजेपी अब सीएम ममता का दांव उन्हीं पर आजमाना चाहती है। देखना होगा कि प्रधानमंत्री का यह दौरा बीजेपी को कितना राजनीतिक लाभ दिला पाता है। साथ ही क्या सिंगुर एक बार फिर बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने जा रहे हैं।