25 सालों में एलियंस से मुलाकात करेंगे इंसान, अंतरिक्ष वैज्ञानिक का दावा, क्वांटम फिजिक्स से मिलेगी जीत
नई दिल्ली। अंतरिक्ष की दुनिया में रिसर्च करने वाले एक बड़े वैज्ञानिक के मुताबिक, अगले 25 सालों में एलियंस का पता लगा लिया जाएगा और धरती के बाहर मौजूद जीवन की खोज कर ली जाएगी। अंतरिक्ष रिसर्चर साशा क्वांज ने दावा किया है कि, हम काफी तेजी से टेक्नोलॉजी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और तकनीकी प्रगति का मतलब है कि, 25 साल की महत्वाकांक्षी समय सीमा, जो हमने हमारे सौर मंडल से बाहर जीवन खोजने के लिए खुद के सामने निर्धारित किया है, और वह “अवास्तविक” नहीं है।
25 साल में एलियंस से मिलेंगे
खगोल वैज्ञानिक साशा क्वांज ने कहा कि, “सफलता की कोई गारंटी नहीं है। लेकिन हम रास्ते में अन्य चीजें सीखने जा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि, नया जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप पहले से ही हमारे सौर मंडल के बाहर गैस विशाल ग्रहों की असाधारण छवियां प्रदान कर रहा था। लेकिन स्विट्जरलैंड के ईटीएच ज्यूरिख संस्थान में डॉ क्वांज की टीम एक नए टेलीस्कोप के लिए एक उपकरण पर काम कर रही हैं, जो छोटे, पृथ्वी जैसे ग्रहों पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होगा। उन्होंने आगे कहा कि, “इस टेलीस्कोप का पहला लक्ष्य सौरमंडल में पृथ्वी की ही तरह दिखने वाले ग्रहों की तस्वीरें लेना है, जो काफी हद तक पृथ्वी के समान हैं और नजदीकी सितारों में से एक है और अगर ये काम हो जाता है, तो यकीनन ये एक बड़ी उपलब्धि होगी।” लेकिन, हमारी दीर्घकालिक नजर ना सिर्फ दर्जनों ऐसे सितारों की खोज करना है, बल्कि उन सितारों को लेकर रिसर्च भी करना है। इसके साथ ही उन्होंने जेम्स वेब टेलीस्कोप की भी तारीफ की है, जिसने पिछले दिनों एक्सोप्लैनेट की पहली प्रत्यक्ष तस्वीर नासा को भेजी है।
पृथ्वी जैसे दूसरे ग्रहों की खोज
जेम्स वेब टेलीस्कोप ने जिस ग्रह की तस्वीर भेजी है, उसका नाम एचआईपी 65426 रखा गया है और वैज्ञानिकों को पता चला है, कि ये ग्रह विशाल गैस से भरा हुआ है। हालांकि, ये गैस क्या है, इसकी प्रकृति क्या है, इसका पता नहीं चल पाया है। वहीं, वैज्ञानिकों का कहना है कि, टेलीस्कोप भविष्य में और भी तस्वीरें लाने में मदद करेगा। हालांकि, साशा क्वांज ने कहा कि, जेम्स वेब टेलीस्कोप छोटे ग्रहों की गहराई से तस्वीर नहीं ले सकता है, क्योंकि ऐसा करने के लिए उसके पास पर्याप्त क्षमता नहीं है और ये टेलीस्कोप पर्याप्त शक्तिशाली नहीं है। लेकिन, उन्होंने कहा कि, हमारे पास ऐसे प्लान हैं और हम ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं, जो आगे जाकर इस खोज को मुमकिन बना देगी और अगले कुछ सालों में हमारा सामना किसी और ग्रह पर रहने वाले जीवों से हो जाएगा। हालांकि, कुछ लोग आश्वस्त हैं कि अलौकिक लोगों के साथ हमारी पहली मुठभेड़ पहले ही हो चुकी है।
एलियंस पर अलग अलग दावे
एलियंस को लेकर पिछले कुछ सालों में अलग अलग दावे किए जाते रहे हैं और कई बार ये दावा भी किया गया है, कि एलियंस असल में धरती पर पहले ही पहुंच चुके हैं। पृथ्वी के अलावा किसी और ग्रह पर जीवन है या नहीं या फिर क्या एलियन वास्तव में होते हैं या नहीं, इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक पिछले कई सालों से कोशिश कर रहे हैं और पिछले दिनों एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने गणितीय गणनाओं का उपयोग यह दिखाने के लिए किया है, कि क्वांटम कम्युनिकेशन का उपयोग करके इंटरस्टेलर स्पेस में सिग्नल भेजना सैद्धांतिक रूप से संभव है और इसके जरिए एलियंस से संपर्क साधना संभव है।
क्वांटम टेक्नोलॉजी से एलियंस की खोज
शोध करने वाले वैज्ञानिकों की टीम ने कहा है कि, सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि इसी तरह के कम्युनिकेशन चैनल का इस्तेमाल एलियंस भी इंसानों से संपर्क स्थापित करने के लिए कर रहे हैं और टीम ने दावा किया है, कि इस तरीके से अलौकिक प्राणियों से संपर्क साधना संभव है।
क्वांटम कम्युनिकेशन डेटा की सुरक्षा के लिए क्वांटम भौतिकी के नियमों का लाभ उठाता है। क्वांटम लॉ प्रकाश के कणों को एक साथ कई जगहों पर भेजने की इजाजत देता है और ये डेटा काफी ज्यादा सीक्रेट होता है और अगर किसी भी टेक्नोलॉजी के जरिए उस संदेश को खोलने की कोशिश की जाएगी, तो वो संदेश ढह जाएगा और किसी के लिए भी इसे हैक करना संभव नहीं होगा। फिलहाल, इस टेक्नोलॉजी का परीक्षण अमेरिका और चीन के साथ भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो ने भी कर लिया है और चीन और अमेरिका की कोशिश क्वांटम टेक्नोलॉजी से लैस सैटेलाइट लांच करने की है और भारत भी इसी दिशा में काम कर रहा है।
वैज्ञानिकों का रिसर्च क्या कहता है?
एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम यह पता लगाना चाहती थी, कि क्या इंटरस्टेलर स्पेस में इसी तरह के कम्युनिकेशन संभव हो सकते हैं। उन्होंने इंटरस्टेलर माध्यम में एक्स-रे की गति का अध्ययन करने के लिए गणित का उपयोग किया। शोधकर्ता बताते हैं, कि चूंकि अंतरिक्ष खाली है, लिहाजा एक्स-रे फोटॉन बिना किसी हस्तक्षेप के सैकड़ों हजारों प्रकाश वर्ष की यात्रा कर सकते हैं।
CERN वैज्ञानिकों को क्या पता लगा?
इसी साल फ्रांस में सर्न के वैज्ञानिकों ने लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर मशीन को चार सालों के बाद चलाया था, जिससे जरिए गॉड पार्टिकिल की खोज की गई थी। ये दुनिया का सबसे शक्तिशाली मशीन माना जाता है और इस मशीन को चलाकर प्रोटोन के बीच टक्कर करवाई गई। इस दौरान भौतिकविदों ने तीन नए उप परमाणु कणों स्ट्रेंज पेंटाक्वार्क, एक डबल चार्ज टेट्राक्वार्क, और इसका तटस्थ साथी, की खोज की है। क्वार्क प्राथमिक कण हैं और छह ‘फ्लेवर्स’ में आते हैं, ऊपर, नीचे, आकर्षण, अजीब, ऊपर और नीचे। वे आम तौर पर दो और तीन के समूहों में एक साथ मिलकर कण बनाते हैं, जिन्हें हैड्रॉन के रूप में जाना जाता है, जैसे प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जो परमाणु नाभिक बनाते हैं। हालांकि, अत्यंत दुर्लभ स्थिति में वे चार-क्वार्क और पांच-क्वार्क कणों, या टेट्राक्वार्क और पेंटाक्वार्क में भी मिल सकते हैं। और यहां आपको जानकर हैरानी होगी, कि करीब 60 साल पहले इन हैड्रॉन कणों को कैप्चर किया गया था, लेकिन टेक्नोलॉडजी नहीं होने की वजह से उन्हें पढ़ा नहीं जा सका और पिछले 20 सालों में उन्हें एलएचसीबी और अन्य प्रयोगों द्वारा पढ़ने की कोशिश की जा रही है।
एलियंस पर खुफिया प्रमुखों के दावे
एक सवाल ये भी हमारे मन में उठता है, कि हम कौन हैं, हम कहां से आए हैं और क्या पृथ्वी के अलावा भी किसी और ग्रह पर कोई जिंदगी रहती है? अब तक वैज्ञानिकों ने पृथ्वी ग्रह से 30 अरब प्रकाश वर्ष तक के दायरे की खोज की है और कुछ भी नहीं मिला है, लेकिन अभी भी काफी कुछ मौजूद है, जहां हमने अभी तक खोज नहीं की है। फिर भी पांच खुफिया और अंतरिक्ष एजेंसी के प्रमुख, जो अमेरिका, ब्रिटेन, इज़राइल और रूस से हैं, उन्होंने कहा है कि वे पहले से ही विश्वास करने के लिए पर्याप्त सबूत देख चुके हैं, कि एलियंस मौजूद हैं, संभवतः हमें आने वाले वक्त में उनको लेकर काफी खतरनाक जानकारियां मिली हैं।
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