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SIR पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, ममता बनर्जी खुद रहेंगी उपस्थित, लेकिन नहीं रख पाएंगी दलील? समझिए लीगल पहलू

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में चल रही एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज सुप्रीम कोर्ट में पेश होंगी। ममता ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजीआई) सूर्यकांत से इस केस को खुद लड़ने की इजाजत मांगी है। उनकी. . .

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में चल रही एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज सुप्रीम कोर्ट में पेश होंगी। ममता ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजीआई) सूर्यकांत से इस केस को खुद लड़ने की इजाजत मांगी है। उनकी लीगल टीम ने कोर्ट से सीधे अपनी बात रखने की अनुमति के लिए एक अर्जी दायर की है। बता दें कि इस केस में सीएम ममता खुद एक याचिकाकर्ता हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक अंतरिम अर्जी दायर की है। इस अर्जी में उन्होंने कहा है कि वे इस मामले के तथ्यों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रियाओं और नियमों को जानती हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि वे कोर्ट के नियमों का पालन करेंगी।

इन याचिकाओं पर होगी सुनवाई


जानकारी के अनुसार, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इन याचिकाओं में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अलावा टीएमसी सांसदों डेरेक ओ’ब्रायन, डोला सेन और याचिकाकर्ता मोस्तारी बानू के नाम भी शामिल हैं। ममता बनर्जी के सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश के लिए पास भी जारी कर दिया गया है। इससे यह साफ है कि उनकी कोर्ट में मौजूदगी की उम्मीद है। मुख्यमंत्री बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दायर कर एसआईआर प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाया था और आरोप लगाया था कि जिस तरह से इसे किया जा रहा है, उससे लाखों वोटर्स, खासकर समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के लोगों के वोट देने का अधिकार छीना जा सकता है।

ममता लॉयर हैं, एडवोकेट नहीं

ममता बनर्जी के नाम सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश के लिए पास भी जारी कर दिया गया है। साथ ही यह भी संकेत हैं कि वे मुख्य न्यायाधीश से सीधे अनुमति मांग सकती हैं। लेकिन सवाल अब भी कायम है- क्या कानून इसकी इजाजत देता है। दरअसल, ममता ने एलएलबी किया और लॉयर हैं। लेकिन एडवोकेट नहीं हैं यानी वे प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं है। कहा जा सकता है कि ममता आज सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में हिस्सा लेती हैं तो वकील के रूप में नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के रूप में शामिल हो सकती हैं।

LLB करने से क्या कोर्ट में बहस का हक मिल जाता है?

सीधा जवाब है, नहीं. देश में LLB डिग्री यह तो साबित करती है कि किसी व्यक्ति ने कानून की पढ़ाई की है, लेकिन इससे अपने आप अदालत में केस लड़ने, जज के सामने बहस करने या वकालतनामा दाखिल करने का अधिकार नहीं मिलता। कोर्ट में दलील देने का अधिकार Advocates Act, 1961 और Bar Council of India (BCI) के नियमों से तय होता है।

ममता बनर्जी ने क्या किया और क्या नहीं किया?

ममता बनर्जी कानून स्नातक यानी LLB डिग्री होल्डर हैं, लेकिन उन्होंने किसी State Bar Council में Enrollment नहीं कराया। All India Bar Examination (AIBE) पास नहीं किया। Bar Council of India से Certificate of Practice (CoP) नहीं लिया,इसीलिए वे प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं मानी जातीं। कानूनी भाषा में कहें तो ममता बनर्जी Law Graduate हैं, लेकिन एडवोकेट नहीं हैं

Advocates Act, 1961 क्या कहता है?

Advocates Act, 1961 के मुताबिक, अदालत में दलील देने का अधिकार सिर्फ उसी व्यक्ति को है- जिसका नाम किसी State Bar Council में दर्ज हो, जिसने AIBE पास किया हो. जिसके पास Certificate of Practice हो। इन शर्तों के बिना अदालत में बहस करना गैरकानूनी प्रैक्टिस की श्रेणी में आता है।

तो ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में क्या कर सकती हैं?

ममता बनर्जी इस मामले में याचिकाकर्ता (Petitioner) के रूप में अदालत में मौजूद रह सकती हैं। कोर्ट की कार्यवाही देख सकती हैं। अपने वकीलों को निर्देश दे सकती हैं। लेकिन जज के सामने खुद कानूनी बहस नहीं कर सकतीं। वकील की भूमिका में दलील नहीं रख सकतीं। वकालतनामा दाखिल नहीं कर सकतीं।

ममता ने सुप्रीम कोर्ट से क्या अनुमति मांगी है?

ममता बनर्जी की ओर से दाखिल अंतरिम आवेदन में कहा गया है कि वे पश्चिम बंगाल SIR मामले में याचिकाकर्ता हैं और केस के तथ्यों से भली-भांति परिचित हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा, प्रक्रिया और परंपराओं की पूरी जानकारी है और वे उसी के अनुरूप आचरण करेंगी। उन्हें SIR प्रक्रिया के कारण पश्चिम बंगाल के लोगों को हो रही जमीनी समस्याओं की प्रत्यक्ष जानकारी है। हालांकि, यह अनुमति पूरी तरह से अदालत के विवेकाधिकार पर निर्भर करती है।

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के बाबू जगजीवन राम इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत मिश्रा स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ LLB डिग्री होना, सुप्रीम कोर्ट में दलील रखने का अधिकार नहीं देता। डॉ. मिश्रा कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट में बोलने या बहस करने का अधिकार सिर्फ उन्हीं लोगों को होता है, जो Advocates Act, 1961 और Bar Council of India के नियमों के तहत प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हों
। सबसे पहले State Bar Council में एनरोलमेंट जरूरी है, उसके बाद All India Bar Examination पास करना और Certificate of Practice लेना अनिवार्य होता है। वे आगे बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में तो शर्तें और भी सख्त हैं। सुप्रीम कोर्ट में किसी केस में वकालतनामा दाखिल करने और दलील रखने का अधिकार सिर्फ Advocate-on-Record (AOR) को होता है। इसके लिए परीक्षा पास करना जरूरी है। बिना AOR बने कोई भी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में नियमित रूप से बहस नहीं कर सकता।
डॉ. मिश्रा के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में खुद पक्ष रखने के लिए एक सीमित विकल्प जरूर है, लेकिन वह भी अपवाद है। सुप्रीम कोर्ट किसी व्यक्ति को सिर्फ उसके निजी मामले में विशेष अनुमति देकर खुद बहस करने की इजाजत दे सकता है। इसे ‘बिहाफ ऑफ द परमिशन ऑफ सुप्रीम कोर्ट’ कहा जाता है, लेकिन यह अनुमति पब्लिक इंटरेस्ट या संवैधानिक मामलों में बेहद असाधारण परिस्थितियों में ही दी जाती है।
डॉ. मिश्रा साफ शब्दों में कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं है तो वो चाहे LLB होल्डर ही क्यों न हो, सुप्रीम कोर्ट में वकील की तरह खड़े होकर दलील नहीं रख सकता। ममता बनर्जी का मामला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक और संवैधानिक प्रकृति का है। सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में आज सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच सुनवाई करेगी।

ईसीआई पर राजनीतिक इरादे से काम करने का आरोप

अपनी याचिका में, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने ईसीआई पर राजनीतिक इरादे से काम करने का आरोप लगाया और दावा किया कि एक संवैधानिक संस्था, जिससे निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद की जाती है, एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है जो ‘किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद चिंताजनक है।’ उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से सीधे दखल देने की मांग की है और चुनाव आयोग को उचित निर्देश देने की प्रार्थना की है। इससे पहले, तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा, राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और डोला सेन ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उन याचिकाओं को भी मंगलवार को सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया है।

टीएमसी ने किया ट्वीट

टीएमसी ने इसे लेकर अपने एक्स अकाउंट पर एक फोटो भी शेयर की है। इस फोटो पर ‘लोगों का वकील बनाम शैतान का वकील’ कैप्शन दिया गया है। इस फोटो में ममता बनर्जी वकील की वर्दी में दिखाई दे रही है। फोटो के ऊपर लिखा है ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में SIR को चुनौती देंगी।

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