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मानव V वन्यप्राणी संघर्ष : हाथियों के आतंक से उजड़ा कामातपाड़ा : 50 परिवार हुए बेघर, बस्ती की जगह अब चाय बागान

सिलीगुड़ी। प्रकृति और मानव के संघर्ष में एक बार फिर जीत वन्यप्राणियों की हुई है। सिलीगुड़ी से सटे बैकुंठपुर वन क्षेत्र के पास स्थित साजानो चटकियाविटा इलाके का कामातपाड़ा गांव अब केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया. . .

सिलीगुड़ी। प्रकृति और मानव के संघर्ष में एक बार फिर जीत वन्यप्राणियों की हुई है। सिलीगुड़ी से सटे बैकुंठपुर वन क्षेत्र के पास स्थित साजानो चटकियाविटा इलाके का कामातपाड़ा गांव अब केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया है। लगातार हाथियों के हमलों से परेशान होकर गांव के लगभग 50 परिवार अपनी जमीन-जायदाद छोड़ने को मजबूर हो गए।

कामातपाड़ा गांव में लगभग 50 परिवार रहते थे

कभी जहां लोगों की चहल-पहल, बच्चों की किलकारियां और खेत-खलिहानों की रौनक थी, आज वहां सिर्फ चाय बागान की खामोशी और हाथियों के पैरों के निशान दिखाई देते हैं। एक समय कामातपाड़ा गांव में लगभग 50 परिवार रहते थे। खेती-बाड़ी, छोटे-मोटे काम और दिहाड़ी मजदूरी कर ग्रामीण शांतिपूर्वक जीवन बिता रहे थे।

2010 के बाद गांव की तस्वीर बदलने लगी

करीब 2010 के बाद गांव की तस्वीर बदलने लगी। जंगल से हाथियों के झुंड हर रात रिहायशी इलाके में घुसने लगे। आबादी बढ़ने के साथ ही हाथी दिन में भी भोजन की तलाश में गांव आने लगे। घरों को तोड़ने के साथ-साथ हाथियों के हमलों में कई ग्रामीणों की जान भी चली गई। जान के खतरे को देखते हुए अंततः ग्रामीणों ने गांव छोड़ने का कठिन फैसला लिया। एक-एक कर सभी परिवार पलायन कर गए और गांव पूरी तरह सुनसान हो गया।

न जोखिम में डालकर पढ़ाई करना असंभव

हाथियों के आतंक से बच्चे भी सुरक्षित नहीं रहे। गांव का एकमात्र शैक्षणिक संस्थान ‘कामातपाड़ा प्राथमिक विद्यालय’ आज परित्यक्त पड़ा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, हाथियों के डर से बच्चे स्कूल जाने से कतराते थे। जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करना असंभव हो गया था। अंततः छात्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए शिक्षा विभाग ने स्कूल को अन्यत्र स्थानांतरित कर दिया। जंगल से सटे इस इलाके में खड़ा परित्यक्त स्कूल भवन आज दर्दनाक यादों का गवाह बन गया है।

गांव उजड़ गया, हाथियों का उपद्रव कायम

हालांकि गांव उजड़ गया, लेकिन हाथियों का उपद्रव थमा नहीं है। आसपास के गांवों में आज भी हर रात हाथियों के झुंड दस्तक दे रहे हैं। बैकुंठपुर वन विभाग के डाबग्राम-2 रेंज के अंतर्गत चटकियाविटा बीट कार्यालय के वनकर्मियों को रोज़ाना जान जोखिम में डालकर हाथियों को खदेड़ना पड़ रहा है।
पूर्व ग्रामीणों का कहना है, “आज जहां चाय बागान है, वहां कभी हमारे घर थे, बच्चों की हंसी थी। सब कुछ अब अतीत बन गया। हम अपनी जमीन से बेघर हो चुके हैं।”

मानव और वन्यजीवों के इस टकराव का भविष्य

जंगल से सटे इलाकों में मानव और वन्यजीवों के इस टकराव का भविष्य किस दिशा में जाएगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। कामातपाड़ा अब सिर्फ एक गांव का नाम नहीं, बल्कि उत्तर बंगाल के नक्शे पर विस्थापित लोगों की पीड़ा और आह का प्रतीक बन चुका है।

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