कोलकाता। पश्चिम बंगाल में सत्ता की चाबी अक्सर ग्रामीण इलाकों से होकर गुजरती है और जब बात पूर्व मेदिनीपुर जिले की हो, तो सियासी पारा खुद-ब-खुद चढ़ जाता है। इस बार के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा कौतूहल ‘अधिकारी परिवार’ के दबदबे और उनके बदले हुए सियासी वफादारी को लेकर है। इन इलाकों में पूर्व केंद्रीय मंत्री शिशिर अधिकारी के परिवार का दबदबा कांग्रेस और वामपंथ विरोधी आंदोलन के समय से रहा है। बाद में यह परिवार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) का सबसे मजबूत स्तंभ बना और अब यह पूरी तरह भाजपा के साथ खड़ा है।
शिशिर अधिकारी के परिवार का प्रभाव
इस परिवार में शिशिर अधिकारी के अलावा उनके बेटे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी, पूर्व सांसद दिव्येंदु अधिकारी और कांथी लोकसभा से सांसद सौमेंदु अधिकारी शामिल हैं। कहीं न कहीं, इसी वजह से तमलुक, कांथी उत्तर और कांथी दक्षिण जैसे तीन हाई-प्रोफाइल सीट इस बार सबसे बड़े सियासी अखाड़े में तब्दील हो चुकी हैं।
कैसे चलता है अधिकारी परिवार का सिक्का?
बंगाल की राजनीति में ‘अधिकारी परिवार’ का दबदबा किसी रियासत जैसा है, जिसकी जड़ें पूर्वी मेदिनीपुर की मिट्टी में बहुत गहरी हैं। इस वर्चस्व की शुरुआत शिशिर अधिकारी ने दशकों पहले नगर पालिका स्तर से की थी, लेकिन इसे असली पहचान 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से मिली। उस वक्त सुवेंदु अधिकारी ने किसानों की जमीन बचाने के लिए जो लड़ाई लड़ी, उसने वामपंथी सरकार की चूलें हिला दीं और ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाया। तब से इस परिवार ने इलाके के हर बूथ और स्थानीय संगठन पर ऐसी पकड़ बनाई कि यहां का वोटर उम्मीदवार से ज्यादा ‘अधिकारी परिवार’ के नाम पर मुहर लगाने लगा।
इस दबदबे का दूसरा बड़ा कारण परिवार का सत्ता के केंद्रों पर सीधा नियंत्रण है। पिता शिशिर अधिकारी और उनके तीनों बेटे, सुवेंदु, दिब्येंदु और सौमेंदु, एक साथ सांसद, विधायक, मंत्री और नगर पालिका अध्यक्ष जैसे ऊंचे पदों पर काबिज रहे हैं। वर्षों तक जिला परिषद और को-ऑपरेटिव बैंकों की कमान इनके हाथों में रहने से इनका स्थानीय नेटवर्क इतना मजबूत हो गया कि पार्टी चाहे TMC हो या भाजपा, पूर्वी मेदिनीपुर में राजनीतिक हवा आज भी इसी परिवार के इशारे पर बदलती है। यही वजह है कि ममता बनर्जी से अलग होने के बाद भी यह परिवार भाजपा के लिए बंगाल के इस हिस्से में सबसे बड़ा पावर सेंटर बना हुआ है।