मध्य-पूर्व की बिगड़ती भू-राजनीतिक स्थिति के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी बीच ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन पर तीखा हमला बोला है। तेहरान का दावा है कि जो अमेरिका पहले रूस के तेल पर कड़े प्रतिबंध लगाने की बात करता था, वही अब भारत सहित कई देशों से रूस से तेल खरीद जारी रखने की अप्रत्यक्ष अपील कर रहा है।
ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों ने ट्रंप की वैश्विक नीति को “भ्रमित और विफल” बताया है। उनका कहना है कि वाइट हाउस इस समय ऐसी स्थिति में फंस गया है, जहां एक ओर उसे अपने सहयोगियों के हितों को संभालना पड़ रहा है और दूसरी ओर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए रूस पर परोक्ष रूप से निर्भर रहना पड़ रहा है।
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने बोला हमला
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि अमेरिका कई महीनों से भारत को रूस से तेल आयात बंद करने की चेतावनी देता रहा है। लेकिन ईरान के साथ तनाव बढ़ने के कुछ ही समय बाद वही अमेरिका भारत समेत दुनिया के कई देशों से रूस का कच्चा तेल खरीदने की अपील करता दिखाई दे रहा है।
अराघची ने यह भी कहा कि यूरोप को उम्मीद थी कि ईरान के खिलाफ अमेरिका का समर्थन करने से उसे रूस के मुद्दे पर वाशिंगटन का पूरा साथ मिलेगा, लेकिन मौजूदा हालात ने उस उम्मीद पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने का खतरा
दरअसल, हाल ही में अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया है कि फिलहाल रूस से तेल खरीद पर सख्ती नहीं की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे बड़ा आर्थिक कारण है। उनका कहना है कि मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने का खतरा है। यदि रूस से तेल की आपूर्ति भी कम हो जाती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ेगा
विशेषज्ञों के मुताबिक तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ेगा, जिससे घरेलू राजनीति में ट्रंप सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि वाइट हाउस फिलहाल इस मुद्दे पर “रणनीतिक चुप्पी” बनाए हुए है।
ईरान का आरोप है कि अमेरिका एक तरफ रूस पर प्रतिबंधों की बात करता है, लेकिन दूसरी तरफ भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों को रूसी तेल खरीदने से रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठा रहा। तेहरान ने इसे अमेरिका की “दोहरी नीति और मजबूरी” का उदाहरण बताया है।