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वसंत पंचमी : प्रकृति के श्रृंगार, ज्ञान की साधना और नई चेतना का महापर्व

डेस्क। भारत ऋतुओं का देश है, जहाँ छह ऋतुएं अपनी अलग-अलग छटा बिखेरती हैं। इन सभी ऋतुओं में ‘वसंत’ को ‘ऋतुराज’ यानी ऋतुओं का राजा कहा गया है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला. . .

डेस्क। भारत ऋतुओं का देश है, जहाँ छह ऋतुएं अपनी अलग-अलग छटा बिखेरती हैं। इन सभी ऋतुओं में ‘वसंत’ को ‘ऋतुराज’ यानी ऋतुओं का राजा कहा गया है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला वसंत पंचमी का पर्व इसी ऋतुराज के आगमन का शंखनाद है। यह पर्व केवल एक तिथि विशेष नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, आध्यात्म, विद्या और कला के संगम का उत्सव है।

प्रकृति का नव-श्रृंगार और मानवीय उल्लास

वसंत के आते ही प्रकृति मानो अपनी पुरानी, सूखी केंचुली को त्यागकर नव-वधू की तरह श्रृंगार करती है। कड़ाके की ठंड की विदाई होती है और सूर्य की किरणें शरीर में सिहरन के बजाय गर्माहट भरने लगती हैं। खेतों में सरसों के पीले फूल ऐसे लहराते हैं मानो धरती ने ‘पीतांबर’ ओढ़ लिया हो। पेड़ों पर नई कोपलें आने लगती हैं, आम की मंजरियों की महक वातावरण को सुगंधित कर देती है और कोयल की कूक मन को आनंदित कर देती है। यह वह समय है जब प्रकृति और पुरुष दोनों में नई ऊर्जा का संचार होता है।

माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी का सबसे अधिक महत्व विद्या की देवी माँ सरस्वती के पूजन के कारण है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो उन्हें चारों ओर मौन और शांति दिखाई दी। उस मौन को मुखरित करने के लिए उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक देवी प्रकट हुईं जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी। जैसे ही देवी ने वीणा के तारों को छुआ, संपूर्ण सृष्टि में ध्वनि और संगीत का प्रसार हुआ। पशु-पक्षी चहकने लगे और नदियों में कल-कल की ध्वनि गूँजने लगी। चूंकि इस दिन सरस्वती माता का प्राकट्य हुआ था, इसलिए छात्र, संगीतकार, लेखक और कलाकार इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। इस दिन ‘अक्षर अभ्यास’ या ‘विद्यारंभ’ संस्कार की परंपरा है, जिसमें छोटे बच्चों को पहली बार वर्णमाला लिखना सिखाया जाता है। शिक्षण संस्थानों में सरस्वती पूजन के साथ ज्ञान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

पीत वर्ण (पीला रंग) का महत्व

वसंत पंचमी के उत्सव में पीला रंग प्रधान होता है। यह रंग सादगी, शुद्धता, समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। सरसों के लहलहाते पीले खेत इस रंग की महिमा को दर्शाते हैं। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, भगवान को पीले फूल अर्पित करते हैं और केसरिया भात या पीला भोजन ग्रहण करते हैं। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से पीला रंग बृहस्पति ग्रह का प्रतीक है, जो बुद्धि और ज्ञान का कारक माना जाता है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ

वसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व भी गहरा है। यह पर्व राजा भोज के काल में विशेष रूप से मनाया जाता था। वहीं मध्यकालीन इतिहास में पृथ्वीराज चौहान की वीरता भी इस दिन से जुड़ी है। कहा जाता है कि वसंत पंचमी के दिन ही उन्होंने शब्दभेदी बाण से मोहम्मद गोरी का अंत किया था। स्वतंत्रता संग्राम के समय में भी वीर हकीकत राय का बलिदान इसी दिन हुआ था, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इस प्रकार यह पर्व हमें न केवल ज्ञान बल्कि शौर्य और त्याग की भी प्रेरणा देता है।

कामदेव और रति का उत्सव

भारतीय शास्त्रों में वसंत को प्रेम का मास भी माना गया है। प्राचीन काल में इस दिन कामदेव और रति की पूजा की जाती थी। यह जीवन में प्रेम, उत्साह और रचनात्मकता को बनाए रखने का उत्सव है। दांपत्य जीवन में मधुरता के लिए भी इस दिन का विशेष महत्व बताया गया है।
बंगाल से लेकर पंजाब तक: उत्सव के विविध रूप

भारत के अलग-अलग हिस्सों में वसंत पंचमी को मनाने के तरीके भिन्न हैं:

बंगाल: यहाँ सरस्वती पूजा एक महापर्व की तरह मनाई जाती है। लोग पंडालों में माँ की भव्य प्रतिमाएं स्थापित करते हैं और पीले वस्त्रों में उत्सव मनाते हैं।
पंजाब और हरियाणा: यहाँ यह पर्व 'पतंगबाजी' के लिए प्रसिद्ध है। आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है और 'आई बो' के नारों से गलियां गूँज उठती हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार: यहाँ गंगा और अन्य पवित्र नदियों के तट पर विशेष पूजा और लोक गीतों का आयोजन होता है।

आज के दौर में प्रासंगिकता

आज के भागदौड़ भरे जीवन और तकनीकी युग में वसंत पंचमी की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। जहाँ मशीनें हमारा काम कर रही हैं, वहीं रचनात्मकता, विवेक और कला (जो माँ सरस्वती का स्वरूप हैं) की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। यह पर्व हमें संदेश देता है कि हमें अपनी जड़ों, प्रकृति और ज्ञान की साधना से जुड़े रहना चाहिए। यह पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है, क्योंकि जब प्रकृति स्वस्थ रहेगी, तभी वसंत खिलेगा।
पर्व का संदेश

वसंत पंचमी का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—जड़ता को त्यागकर चेतना को अपनाना। जैसे पेड़ों के पुराने पत्ते गिरते हैं और नए पत्तों का आगमन होता है, वैसे ही मनुष्य को भी अपने मन की नकारात्मकता को त्यागकर नए विचारों और ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ना चाहिए। वीणा की मधुर तान हमें जीवन में सौहार्द और सामंजस्य बिठाने की कला सिखाती है। आइए, इस वसंत पंचमी पर हम केवल कर्मकांडी पूजा न करें, बल्कि अज्ञानता के अंधकार को मिटाने और विद्या के दीप को प्रज्वलित करने का संकल्प लें।

वसंत पंचमी 2026 कब है?

पंचांग के अनुसार, माघ शुक्ल पंचमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी, गुरुवार के दिन रात में 2 बजकर 29 मिनट से होगी और इसका समापन 23 जनवरी, शुक्रवार को रात में 1 बजकर 47 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार, बसंत पंचमी 23 तारीख को मनाई जाएगी और इसी दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाएगी।

बसंत पंचमी 2026 का शुभ संयोग

23 जनवरी, शुक्रवार के दिन यानी वसंत पंचमी पर चंद्रमा का गोचर मीन राशि में होने जा रहा है। वहीं, चंद्रमा से चतुर्थ भाव में गुरु के होने से गजकेसरी का शुभ संयोग बन रहा है। ज्ञान के कारक गुरु की राशि में बैठकर चंद्रमा का गजकेसरी योग बनाना अत्यंत शुभ है।

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