डेस्क। पूर्व रेल मंत्री और एक समय में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे मुकुल रॉय का निधन हो गया है। उन्होंने कोलकाता के एक अस्पताल में रविवार को आधी रात के बाद तकरीबन 1:30 बजे अंतिम सांस ली। वह 71 साल के थे और लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे। मुकुल रॉय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी के रूप में उभरे थे। एक समय में उन्हें TMC में नंबर-2 लीडर माना जाता था। इसके साथ ही मुकुल रॉय पार्टी के ‘क्राइसिस मैनेजर’ भी थे। TMC के हित में कोई भी बात कहीं भी अटकी हो, रॉय उसे दूर करने में अपना पूरा दमखम लगा देते थे। वे टीएमसी के लिए चुनाव की रणनीतियां भी बनाते थे।
ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘रणनीति के मास्टर’ माने जाने वाले मुकुल रॉय का नाम कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद साथियों में शामिल था।संगठन खड़ा करने से लेकर चुनावी रणनीति बनाने तक, उनके राजनीतिक सफर ने बंगाल की राजनीति को कई बार नई दिशा दी। लंबे समय तक टीएमसी के दूसरे सबसे ताकतवर चेहरे रहे मुकुल रॉय ने तीन दशक में कई पड़ाव देखे कांग्रेस, तृणमूल, बीजेपी और वापस तृणमूल, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच उनकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ती गई।
यूथ कांग्रेस से हुई थी राजनीतिक जीवन की शुरुआत
मुकुल रॉय और ममता बनर्जी की राजनीतिक शुरुआत एक ही जगह से हुई यूथ कांग्रेस। दोनों साथ में ही राजनीति में आगे बढ़े। जनवरी 1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस बनाई, उस समय मुकुल रॉय संगठन का सबसे मजबूत स्तंभ माने गए। पार्टी गठन के तुरंत बाद उन्हें महासचिव बनाया गया। बंगाल के बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही। यही वजह थी कि कुछ ही सालों में वे टीएमसी का केंद्र की राजनीति में प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।
TMC के संस्थापक सदस्य थे मुकुल रॉय
तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल वरिष्ठ नेता रॉय का राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। जनवरी 1998 में गठित TMC के शुरुआती दौर से जुड़े रॉय को कभी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का करीबी सहयोगी माना जाता थ। ममता बनर्जी की तरह ही उन्होंने भी अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बंगाल में यूथ कांग्रेस से की थी। तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद रॉय ने पार्टी संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया। समय के साथ वे दिल्ली की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। वर्ष 2006 में वह राज्य सभा के लिए निर्वाचित हुए और 2009 से 2012 तक सदन में पार्टी के नेता रहे। यूपीए-2 सरकार के दौरान उन्होंने पहले शिपिंग मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में काम किया और बाद में मार्च 2012 में पार्टी सहयोगी दिनेश त्रिवेदी की जगह रेल मंत्री का पद संभाला।
एक समय तृणमूल कांग्रेस में दूसरे नंबर का नेता माना जाता था
एक समय ‘बंगाल की राजनीति के चाणक्य’ के रूप में पहचाने जाने वाले मुकल रॉय को तृणमूल कांग्रेस में दूसरे नंबर का नेता माना जाता था। वर्ष 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस ने 34 वर्षों के वाम शासन को समाप्त कर सत्ता हासिल की और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं, तब पार्टी को मजबूत करने में रॉय की भूमिका अहम रही। साल 2015 तक महासचिव रहते हुए उन्होंने माकपा और कांग्रेस से कई नेताओं को पार्टी में शामिल कराया। हालांकि, उनका नाम शारदा चिटफंड घोटाले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन से जुड़ने के बाद वे विवादों में भी रहे।
2017 में बने थे भाजपाई
पार्टी नेतृत्व से मतभेद बढ़ने पर मुकुल रॉय नवंबर 2017 में भाजपा का दामन थाम लिया था। रॉय ने जमीनी स्तर पर भाजपा का संगठन मजबूत करने में भूमिका निभाई और 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को राज्य में 18 सीटें दिलाने का श्रेय भी उन्हें दिया गया। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में वह कृष्णानगर उत्तर से भाजपा विधायक निर्वाचित हुए। हालांकि, भाजपा के साथ भी उनका रिश्ता अधिक समय तक नहीं चला और जून 2021 में वह फिर तृणमूल कांग्रेस में लौट आए. वापसी के बाद पार्टी में उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। बताया जाता है कि वह डिमेंशिया समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं से भी जूझ रहे थे।
याद किए जाएंगे मुकुल रॉय
इसी बीच 13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें विधायक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। अदालत ने 2021 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने को आधार बनाते हुए यह फैसला सुनाया। रॉय का राजनीतिक सफर बंगाल की राजनीति में उनकी रणनीतिक भूमिका, विवादों और लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों के लिए याद किया जाता है।