सिलीगुड़ी। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र रेलवे विकास की लहर से कई वर्षों तक अछूता रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में यह स्थिति काफी हद तक बदली है। पूर्वोत्तर में कई विकास परियोजनाएं चल रही हैं। इस इलाके में रेल संपर्क को और मजबूत करने के लिए भारतीय रेल एक बेहद सामरिक महत्व की परियोजना पर काम कर रहा है। भारतीय रेलवे का चिकन नेक कॉरिडोर भौगोलिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, यह सामरिक दृष्टि से भी बहुत खास है। इस इलाके पर चीन की गहरी नजर है और चीन के साथ बदलते संबंधों के चलते अब बांग्लादेश भी इस पर ध्यान दे रहा है। ऐसे में इस इलाके में रेलवे ट्रेक का निर्माण बेहद संवेदनशील हो चुका है।
बांग्लादेश भारत को परेशान करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा
हकीकत यही है कि बांग्लादेश अपने मददगार पड़ोसी रहे भारत को परेशान करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है। हाल ही में बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार ने भारत के सबसे बड़े दुश्मन चीन से सैन्य ड्रोन को लेकर हाथ मिला लिया है। चीन की मदद से बांग्लादेश सैन्य ड्रोन की फैक्ट्री लगाने जा रहा है। तकनीकी ट्रांसफर, MALE UAV प्रोडॅक्शन और भारत की सीमाओं के निकट चीन की भागीदारी वाला बांग्लादेश का यह सौदा नई दिल्ली की टेंशन बढ़ा सकता है। वहीं, भारत भी रणनीतिक रूप से बेहद अहम चिकननेक तक अंडरग्राउंड रेल लाइन बिछाने जा रहा है। भारत का यह प्रोजेक्ट आम यात्रियों के लिए लाइफलाइन बनने के साथ-साथ जंग या आपातकाल के दौरान सेना और साजोसामान की आवाजाही को भी सुरक्षित रखेगा।
40 किलोमीटर तक अंडरग्राउंड रेल दौड़ाएगा भारत
लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के मुताबिक, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में कहा था कि बंगाल से नॉर्थईस्ट तक रणनीतिक ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर को सुरक्षित करने का प्लान है। इस प्लान में नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से घिरे तकरीबन 40 किलोमीटर के हिस्से में अंडरग्राउंड रेल ट्रैक बिछाना भी शामिल है। इससे माना जा रहा है कि भारत की कमजोर नस माना जाने वाला चिकननेक मजबूत हो जाएगा।
कहां से कहां तक बिछाई जाएगी अंडरग्राउंड रेल
नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे (NFR) ने स्पष्ट कर दिया है कि यह लाइन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और बिहार के किशनगंज को जोड़ते हुए बागडोगरा तक जाएगी। यह अंडरग्राउंड रूट डुमडांगी से बागडोगरा के बीच करीब 35.76 किलोमीटर तक फैला होगा। इसमें डुमडांगी और रंगपानी के बीच का 33.40 किमी का हिस्सा बेहद अहम है।
सामरिक दृष्टि से है बेहद महत्वपूर्ण
रेल मंत्री ने बताया था कि इन दो स्टेशनों का चयन क्यों किया गया है, तिनमिल हट दार्जिलिंग जिले में स्थित है। यह सिलीगुड़ी से 10 किलोमीटर दूर है। वहीं, बांग्लादेश के पंचगढ़ से इसकी दूरी मात्र 68 किलोमीटर है। चिकन नेक में निगरानी और सुरक्षा बढ़ाने के लिए यह रेलवे लाइन बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी। चिकन नेक का उपयोग उत्तर पूर्वी भारत से जुड़ने के लिए किया जा सकता है। इस मार्ग से सैन्य हथियारों से लेकर ईंधन तक सब कुछ भेजा जाता है। चिकन नेक के दक्षिण में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल और उत्तर में चीन की चुंबी घाटी स्थित है। इस चिकन नेक क्षेत्र में जरा सी भी गड़बड़ी होने पर पूरा पूर्वोत्तर भारत अलग-थलग पड़ जाएगा. सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश भी खतरे में पड़ जाएंगे।
भारत की कमजोर नस भी अब हो जाएगी मजबूत
लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, NFR का कटिहार डिवीजन इस प्रोजेक्ट की अगुवाई करेगा। यह लाइन रणनीतिक रूप से बेहद अहम सिलीगुड़ी कॉरिडोर के 22 किमी लंबे संकरे हिस्से को कवर करेगी, जो अब तक भारत की ‘कमजोर नस’ माना जाता था। तिनमाइल हाट से शुरू होकर यह लाइन सीधे रणनीतिक ठिकानों तक पहुंचेगी। घमंडी बांग्लादेश की सीमाओं के करीब होने के कारण यह सुरंग भारत की रक्षा तैयारियों के लिए बड़ा गेम चेंजर साबित होगी।
बांग्लादेश-चीन में ड्रोन बनाने को लेकर क्या है डील
वहीं, बीते 27 जनवरी को बांग्लादेश वायुसेना (BAF) और चीन की सरकारी स्वामित्व वाली रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी चाइना इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी ग्रुप कॉर्पोरेशन इंटरनेशनल (CETC) के बीच एक रक्षा समझौते पर दस्तखत किए गए थे। यह समझौता ढाका छावनी स्थित बांग्लादेश वायुसेना मुख्यालय में हुआ, जो इसकी अहमियत को और उजागर करता है। दोनों देश प्रस्तावित बोगरा हवाई अड्डे पर यह ड्रोन फैक्ट्री लगाएंगे, जो रणनीतिक रूप से अहम है।
D4 सिस्टम से चीन के ड्रोन रह जाएंगे धरे के धरे
जेएस सोढ़ी बताते हैं कि भारत के अंडरग्राउंड रेल दौड़ाने के प्लान से बांग्लादेश सीमा पर ताकाझांकी करने वाले ड्रोन धरे के धरे रह जाएंगे। दरअसल, भारत सीमा तक साजोसामान ले जा सकेगा। इसमें दुश्मन के ड्रोन को नाकाम करने वाले एंटी ड्रोन सिस्टम भी हो सकते हैं। DRDO द्वारा निर्मित ‘D4’ (डिटेक्ट, डिनाई, डिस्ट्रॉय) सिस्टम, जो 3-4 किमी की सीमा में दुश्मन के ड्रोन को रडार और रेडियो फ्रीक्वेंसी के जरिए पता लगाकर ‘सॉफ्ट’ (जैमर) या ‘हार्ड’ (लेजर) किलर तरीके से नष्ट कर सकता है। अभी ये सिस्टम सीमा सुरक्षा बल (BSF) की तैनाती वाले एरिया और संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात हैं।
बांग्लादेश में कैसे और किस तरह के ड्रोन बनेंगे
बांग्लादेश के चीन के साथ रक्षा साझेदारी के माध्यम से घरेलू मानवरहित हवाई वाहन (UAV) बनाने की फैक्ट्री के कदम ने दक्षिण एशिया के सुरक्षा परिदृश्य में एक नया रणनीतिक आयाम जोड़ दिया है। बांग्लादेश की वायुसेना मध्यम ऊंचाई कम सहनशक्ति (MALE) वाले ड्रोन और ऊर्ध्वाधर टेक-ऑफ और लैंडिंग (VTOL) प्लेटफॉर्म सहित कई श्रेणियों के यूएवी के निर्माण और तालमेल की क्षमता वाले ड्रोन बनाएगी।
इन प्रणालियों को नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए तैनात किए जाने की उम्मीद है। आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, साझेदारी के तहत उत्पादित यूएवी सैन्य अभियानों में उपयोग के अलावा मानवीय सहायता और आपदा प्रबंधन कार्यों में भी सहायक होंगे। इस अवसर पर वायुसेना प्रमुख हसन महमूद खान, बांग्लादेश में चीनी राजदूत याओ वेन समेत कई आला अधिकारी मौजूद थे।
भारत-बांग्लादेश के बीच 4,096 किमी लंबी सीमा
दरअसल, नई दिल्ली इस घटनाक्रम को अपने व्यापक सुरक्षा परिवेश के लिहाज से देख रही है। इसके पीछे बड़ी वजह ये है कि भारत के उत्तर-पूर्वी गलियारे से बांग्लादेश बेहद करीब है। साथ ही दोनों देशों की 4,096 किलोमीटर लंबी साझा भूमि सीमा है। ऐसे में बांग्लादेश का कोई भी कदम बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारत को कौन सी बात कर रही है परेशान
फर्स्ट पोस्ट पर छपी एक स्टोरी के मुताबिक, भारतीय अधिकारियों और विश्लेषकों ने चिंता जताई है कि बांग्लादेशी क्षेत्र से संचालित होने वाले लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले एमएएलई यूएवी भारतीय हवाई क्षेत्र के निकटवर्ती क्षेत्रों में निगरानी, टोही और इलेक्ट्रॉनिक खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं। संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों के निकट सशस्त्र ड्रोन (UAV) के संचालन की संभावना ने इन आशंकाओं को और बढ़ा दिया है।
बांग्लादेश का ड्रोन, चीन को खुफिया जानकारी!
कई पर्यवेक्षकों ने यह भी चेतावनी दी है कि चीन समर्थित ड्रोन सुविधा की स्थापना से बांग्लादेशी सशस्त्र बलों में बीजिंग की पहुंच और प्रभाव और गहरा सकता है। यह चिंता जताई गई है कि इसमें शामिल तकनीक भारतीय सीमा से लगे क्षेत्रों की निगरानी करने में सक्षम हो सकती है, जिससे प्राप्त खुफिया जानकारी व्यापक चीनी सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक हो सकती है।
हिंद महासागर में चीन का बढ़ा रहा दबदबा
2024 में ढाका में सत्ता परिवर्तन के बाद, अंतरिम नेता मुहम्मद यूनुस ने चीन के साथ रक्षा और आर्थिक संबंधों को तेज किया है। इस नए समीकरण का ही यह नतीजा रहा कि मार्च, 2025 में बीजिंग यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित अरबों डॉलर के समझौते हुए।
भारतीय नीति निर्माता इन घटनाक्रमों को बीजिंग की क्रमिक घेराबंदी रणनीति के संदर्भ में देखते हैं, जिसे अक्सर ‘मोतियों की माला’ कहा जाता है, जो दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को बताती है।