डेस्क। जल ही जीवन है’ ये मशहूर स्लोगन तो आपने जरूर सुना ही होगा और पढ़ा भी होगा। अब जरा सोचिए, अगर जिंदगी के लिए महत्वपूर्ण ‘पानी’; मौत का कारण बन जाए तो फिर क्या होगा।
हम सभी जानते हैं कि भारत का सबसे स्वच्छ शहर इंदौर अभी गंभीर दूषित पानी संकट का सामना कर रहा है। शहर के इलाके में नल के पानी में गंदगी और सीवरेज मिला पानी पीने से सैकड़ों लोग बीमार पड़े और कई की मौत हो गई। यह सिर्फ इंदौर का स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि पूरे प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा तंत्र की मजबूती पर प्रश्नचिह्न भी है।
राजधानी दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब सहित कई राज्यों में प्रदूषित पानी की समस्या से निपटने के लिए राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर काम कर सकती हैं। दिल्ली में गर्मियों में पानी की कमी ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता की समस्या भी बड़ी चुनौती है। इसका कारण यमुना का प्रदूषण और कच्चे पानी का अस्थिर स्रोत जर्जर और पुरानी आपूर्ति नेटवर्क का सीवर से मिल जाने का जोखिम है। इसके अलावा, पानी की नियमित गुणवत्ता जांच भी नहीं की जाती।
पुरानी पाइपलाइन
दिल्ली का पीने का पानी मुख्यतः यमुना से आता है। कई रिपोर्ट में कहा गया है कि यमुना के पानी में अमोनिया जैसे प्रदूषक स्तर अधिक हैं। इसलिए उपचार के बाद भी आपूर्ति की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कई इलाकों में 40-80 साल पुरानी पाइपलाइन है, जिससे पानी की गुणवत्ता बिगड़ रही है। सरकार ने बजट में पेयजल, स्वच्छता और जल संरचना के लिए 9,000 करोड़ रुपये दिए हैं। राशि का उपयोग नए बोरवेल, पाइपलाइन अपग्रेड, वर्षा जल संचयन और यमुना सफाई पर किया जाएगा।
जल जीवन मिशन
केंद्र ने 2025-26 के बजट में ‘जल जीवन मिशन’ के लिए 67,000 करोड़ दिए। सरकार ने मिशन के लक्ष्य को 2028 तक बढ़ाया है, ताकि देश के सभी ग्रामीण घरों में नल से पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। मिशन के लागू होने से पहले करीब 3.24 करोड़ ग्रामीण घरों में टैप कनेक्शन था। अब 15.5 करोड़ से अधिक घरों को नल से पानी मिल रहा है। अमृत योजना 2015 में शुरू की गई। इसके तहत 4,700 से अधिक शहरों-नगर निकायों में पाइप जलापूर्ति विकसित करना है। अमृत 2.0 का अनुमानित बजट लगभग 2.77 लाख करोड़ से 2.99 लाख करोड़ रुपये तक है।
पेयजल परियोजनाएं
उत्तर प्रदेश में हर घर जल योजना तेजी से आगे बढ़ रही है। मध्य प्रदेश में ‘हर घर नल से जल’ योजना की तरफ गहरा प्रयास किया जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में भी ‘अमृत’ के तहत बड़ा निवेश हुआ है। भोपाल में 582 करोड़ रुपये की पेयजल परियोजना का शिलान्यास किया गया। इससे 3 साल में 100% पानी नेटवर्क लक्ष्य पूरा करना है।
WHO और UNICEF की चेतावनी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और UNICEF समय-समय पर अलर्ट करता रहा है कि असुरक्षित पेयजल गंभीर खतरा है और हर व्यक्ति तक शुद्ध और प्रबंधित पेयजल पहुंचना जरूरी है। साथ ही ये भी ध्यान में दिलाया कि जिन देशों में पानी की गुणवत्ता खराब है वहां, स्वास्थ्य व्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा और विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
साल 1990: इस दशक से ही WHO ने पेयजल और स्वच्छता को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौतियों में शामिल कर लिया था। उस समय बताया गया कि दूषित पानी सीधे तौर पर मानव जीवन के लिए खतरा है, खासकर बच्चों और गरीब आबादी के लिए। WHO ने यह भी उजागर किया कि अगर लोगों को सुरक्षित पानी मिले, तो हैजा, टाइफॉयड और डायरिया जैसी जलजनित बीमारियों से होने वाली ज्यादातर मौतों को रोका जा सकता है।
साल 2000: साल 2000 के बाद पानी और सैनिटेशन को वैश्विक विकास एजेंडे में जगह मिली। संयुक्त राष्ट्र ने मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (MDGs) तय किए, जिनमें शुद्ध पेयजल और स्वच्छता को अहम लक्ष्य बनाया गया। WHO ने इस दौरान बार-बार कहा कि पानी की समस्या को नजरअंदाज करने से स्वास्थ्य और विकास दोनों प्रभावित होंगे।
साल 2015: 15 साल पहले 2000 में तैयार किए गए MDGs के बाद सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स लागू किए गए। WHO ने फिर साफ शब्दों में चेताया कि पानी हर किसी को मिले केवल यही काफी नहीं है, बल्कि सुरक्षित और प्रबंधित पेयजल मिलना भी जरूरत है। फिर SDG-6 के तहत सभी के लिए पानी को सुरक्षित करने के गोल रखे गए। इस समय WHO की रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया कि पानी से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण, इसमें बैक्टीरिया, कैमिकल्स और भारी धातुएं अनुमेय सीमा (Permissible Limits of Heavy Metals) से ऊपर होना है। इससे कई गंभीर बीमारियां होने का भी खतरा बना हुआ है।
2000-2024: चौबीस साल की रिपोर्ट ने चौंकाया
पिछले साल वर्ल्ड वाटर वीक 2025 में WHO और UNICEF ने 2000 से 2024 तक की संयुक्त रिपोर्ट जारी की। JMP के इस ग्लोबल डेटा के अनुसार, लगभग 2.1 अरब लोग अभी भी साफ और प्रबंधित पेयजल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। वहीं, UNICEF के भारत WASH प्रोग्राम के आंकड़े भी चिंताजनक थे।
रिपोर्ट में बताया गया कि देश में लाखों लोग अभी भी सुरक्षित पानी से वंचित हैं और केवल 50 प्रतिशत से भी कम आबादी के पास ही सुरक्षित जल उपलब्ध है। इसके अलावा, कई राज्यों में भूजल की स्थिति गंभीर हो गई है, जिसमें नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक और अन्य भारी धातुएं अनुमेय सीमा से कहीं अधिक पाई गई हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में पानी की सुरक्षा और गुणवत्ता एक बड़ा खतरा बनी हुई है।
Ground Water: भारत के लिए चुनौती
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की 2024‑2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ग्राउंडवाटर व्यापक रूप से प्रदूषित हो चुका है। रिपोर्ट में लिए गए नमूनों में नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक और यूरेनियमजैसी तत्वों की मात्रा परमिसिबल लिमिट से अधिक पाई गई है। देश के कई राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, पंजाब, बिहार और तेलंगाना हॉटस्पॉट के रूप में सामने आए हैं, जहां स्थिति गंभीर है। लंबे समय तक फ्लोराइड अधिक मात्रा में रहने से दांत और हड्डियों की समस्याएं बढ़ रही हैं, जबकि आर्सेनिक के कारण कैंसर और त्वचा रोग जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है।