डेस्क। प्रतापगढ़ में कुंभ मेले के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ कथित अभद्रता का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। आपको बता दें कि प्रयागराज के संगम तट पर इस समय धर्म और आस्था का दुनिया का सबसे बड़ा मेला लगा हुआ है। देश-विदेश के लोग त्रिवेणी संगम में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं और पुण्य की लगातार प्राप्ति कर रहे हैं। इसी माघ मेले के बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी चर्चा में हैं। दरअसल पिछले दिनों मौनी अमावस्या पर संगम में स्नान को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और माघ मेला प्रशासन के बीच तनातनी की दौर जारी है। माघ मेला प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर सवाल पैदा किया है और उनको नोटिस देकर पूछा कि वह ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य कैसे हैं। इन सभी विवादों के बीच आइए जानते हैं। हिंदू धर्म में शंकराचार्य क्या होते हैं? आदिगुरु शंकराचार्य कौन थे? शंकराचार्य कैसे बनते हैं और सनातन धर्म में इस उपाधि का क्या है महत्व।
गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है
हिंदू धर्म में गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आदि शंकाराचार्य ने ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया था। धार्मिक मतानुसार, आदि शंकाराचार्य ने ही मठों की शुरुआत की और हिंदू धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम किया। आदि शंकराचार्य ने चार शिष्य बनाए और उन्हें देश के अलग-अलग कोनों में स्थित मठों की जिम्मेदारी सौंपी थी। इन मठों के प्रमुख को ही आज के समय में शंकराचार्य का दर्जा प्राप्त होता है।
कौन होते हैं शंकराचार्य?

अद्वैत वेदांत परंपरा में शंकाराचार्य की उपाधि सर्वोच्च मानी गई है। आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में हिंदू धर्म के संरक्षण हेतु देश के चार कोनों में चार मठ स्थापित किए थे। इन मठों के प्रमुख को ही आज हम शंकराचार्य की उपाधि देते हैं। शंकराचार्यों का मुख्य कार्य धर्म रक्षा करना और अपने ज्ञान से समाज में संतुलन बैठाना है।
कैसे होता है शंकराचार्य का चुनाव?
शंकराचार्य की परीक्षा को पास करने के लिए एक संन्यासी को कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है। शंकराचार्य बनने के नियमों के बारे में आदि शंकराचार्य ने महानुशासन ग्रंथ में बताया है। शंकराचार्य बनने की पहली शर्त ये है कि व्यक्ति को संन्यासी होना चाहिए और उसे दर्शन, वेद, उपनिषदों और संस्कृत का प्रकांड विद्वान होना चाहिए। दूसरी शर्त ये है कि व्यक्ति ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया हो। तीसरी शर्त पूर्व शंकराचार्य होने वाले शंकराचार्य का चुनाव करे। पीठासीन शंकराचार्य अपने सबसे योग्य शिष्य का चुनाव शंकराचार्य बनने के लिए करते हैं। उत्तराधिकारी के नाम पर काशी विद्वत परिषद और अन्य विद्वान शंकराचार्यों की भी सहमति होनी चाहिए।
कौन थे आदि गुरु शंकराचार्य
आदि गुरु शंकराचार्य को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। सनातन धर्म में शंकराचार्य पद की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी, जिसके लिए उन्होंने भारत में चार मठों की स्थापना की थी। भारतीय सनातन परंपरा के विकास, धर्म के प्रचार-प्रसार और हिंदू धर्म के उत्थान में आदि गुरु शंकराचार्य की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही है। आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रेणता, संस्कृत के विद्वान, उपनिशद व्याख्याता और सनातन धर्म सुधारक थे।
हिंदू कैलेंडर के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म आठवीं सदी में वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को केरल के कालड़ी गांव में एक नम्बूदरी ब्राह्राण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्यम्बा था। माता-पिता दोनों को ही धर्म शास्त्रों को अच्छा ज्ञान था। इनके बचपन का नाम शंकर था जो बाद में आदि गुरु शंकराचार्य कहलाए। ऐसा कहा जाता है आदि शंकराचार्य ने महज 3- 4 वर्ष की आयु में ही अपनी भाषा मलयासम सीख ली थी। आदि शंकराचार्य ने 8 वर्ष की छोटी आयु में चारों वेदों में निपुण हो गए और उन्होंने चारों वेदों को कठस्थ कल लिया था। ये महज 12 वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत हो चुके थे और 32 वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया। इतनी अल्प आयु में आदि गुरु शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी। जो कि आज के चार धाम है और 3 बार पूरे भारत की यात्रा की। जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पुरी मठ, रामेश्वरम् में श्रंगेरी मठ, द्वारिका में शारदा मठ, बद्रीनाथ में ज्योतिर्मठ स्थापित किया। इसके बाद 32 वर्ष की उम्र में आदि शंकराचार्य ने हिमालय में समाधि ले ली थी।
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कैसे होता है शंकराचार्य का चयन ?
आदि गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की और इन सभी चार पीठों में अपने शिष्यों को पीठाधीश्वर नियुक्त कर केदारनाथ चले गए और यहीं 32 वर्ष की आयु में समाधि ले ली। आदिगुरु शंकराचार्य की समाधि के बाद इन चारों मठों से आज तक शंकराचार्य की परंपरा जारी है। इन चारों मठों में शंकराचार्य के चयन के लिए एक लंबी और काफी जटिल प्रक्रिया अपनाई जाती है।
शंकराचार्य बनने के लिए ब्राह्राण कुल में जन्म और संन्यासी होना जरूरी है। एक संन्यासी को शंकराचार्य बनने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग, मुंडन, पिंडदान और रुद्राक्ष को धारण करना बहुत ही अहम हिस्सा है। शंकराचार्य की पदवी पर आसीन होने वाला संन्यासी चारों वेदों और 6 वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए, साथी ही तन-मन से पवित्र होना जरूरी है।
शंकराचार्य की उपाधि को हासिल करने के लिए व्यक्ति को शंकराचार्यों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभी की सहमति और काशी विद्वत परिषद की सहमित लेनी जरूरी होती है। इसके बाद ही व्यक्ति को शंकराचार्य की पदवी हासिल होती है।
चारों मठों में किसी एक मठ के शंकराचार्य के चयन प्रक्रिया की शुरुआत अन्य मठों के प्रमुखों के साथ होती है। मठों का प्रमुख किसी एक योग्य और विद्वान उम्मीदवार का चयन करते हैं। फिर इस प्रस्ताव को आचार्य महामंडलेश्वरों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। आचार्य महामंडलेश्वर उम्मीदवार के वेदों, शास्त्रों के ज्ञान और योग्यता की जांच करते हैं, फिर ये आचार्य महामंडलेश्वर योग्य उम्मीदवाप को प्रतिष्ठित संतों की सभा के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
फिर सभा के सामने उम्मीदवार को एक परीक्षा देनी होती है, जिसमें ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता का परीक्षण किया जाता है। यदि उम्मीदवार परीक्षा में सफल होता है तो उसे काशी विद्वत परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। काशी विद्वत परिषद शंकराचार्य के उम्मीदवार की योग्यता का आखिरी मूल्यांकन करती है, उस व्यक्ति को शंकराचार्य की उपाधि प्रदान करती है।
कितने होते हैं शंकराचार्य ?
आदि गुरु शंकराचार्य ने पूरे भारतवर्ष की यात्राएं की और इस दौरान बड़े-बड़े विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। आदि गुरु शंकराचार्य अद्वेत वेदांत के सिद्धांत ,धर्म, भारतीय संस्कृति और दर्शन को बढ़ाने के लिए चार पीठों की स्थापना की और हर एक पीठ के प्रमुख को शंकराचार्य की उपाधि प्रदान की। उत्तर में ज्योतिर्मठ, पूर्व में यानी ओडिशा के पुरी में गोवर्धन पीठ, दक्षिण में कर्नाटक में शृंगेरी शारदा पीठ और पश्चिम में गुजरात के द्वारका में द्वारका पीठ। इन चारों पीठों के मठाधीश को ही शंकराचार्य कहते हैं। इस प्रकार कुल चार शंकराचार्य होते हैं।
भारत में 4 मुख्य पीठ हैं और इन मठों के मुखिया चार प्रमुख शंकराचार्य। यानि भारत में 4 शंकराचार्य हैं।
ज्योतिर्मठ- उत्तर भारत के उत्तराखंड राज्य में
गोवर्धन मठ- पूर्वी भारत के ओडिशा राज्य में
शृंगेरी शारदा पीठ- दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में
द्वारका शारदा पीठ- पश्चिम भारत के गुजरात राज्य में