नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में दल-बदल को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने 10 बागी विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शुक्रवार को उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु के फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल की। इस मामले में लोकतांत्रिक तृणमूल के नेता और विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय, संदीपन साहा और फिरहाद हाकिम समेत 10 विधायकों को पक्षकार बनाया गया है। मामले की सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना जताई जा रही है।
स्पीकर के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
शोभनदेव चट्टोपाध्याय इससे पहले भी ऋतब्रत बंद्योपाध्याय समेत अन्य विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। हालांकि, उस समय शीर्ष अदालत ने मामले में सीधे हस्तक्षेप नहीं किया था। सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को इस मुद्दे पर फैसला लेने के लिए तीन महीने का समय दिया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने दल-बदल से जुड़े मामलों में संवैधानिक प्रक्रिया के महत्व पर जोर दिया था। अब शोभनदेव ने विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनकी ओर से दायर याचिका को प्रक्रियागत खामियों के आधार पर खारिज कर दिया गया था।
आखिर क्यों खारिज हुई थी TMC विधायक की याचिका?
विधानसभा अध्यक्ष ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दाखिल आवेदन में प्रक्रियागत कमियां बताई थीं। उनके अनुसार, याचिका के साथ जमा किए गए दस्तावेजों पर जरूरी हस्ताक्षर और निर्धारित नियमों के तहत आवश्यक औपचारिकताएं पूरी नहीं की गई थीं। इसी आधार पर आवेदन खारिज कर दिया गया। हालांकि, अध्यक्ष ने यह भी संकेत दिया था कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए नए सिरे से आवेदन दाखिल किया जा सकता है। इसके बाद शोभनदेव ने अध्यक्ष के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का कदम उठाया है। अब शीर्ष अदालत में होने वाली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
दल-बदल के मामलों में स्पीकर की भूमिका क्या है?
दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी विधायक की सदस्यता समाप्त करने से जुड़े मामलों में विधानसभा अध्यक्ष की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2021 के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकार स्पीकर के पास है। साथ ही, इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय उचित समयसीमा का पालन भी जरूरी है। सामान्य तौर पर ऐसे मामलों में तीन महीने के भीतर फैसला लेने की अपेक्षा की जाती है। इसी कानूनी व्यवस्था के कारण पहले सुप्रीम कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय विधानसभा अध्यक्ष को निर्णय लेने का अवसर दिया था।
चुनाव के बाद बंगाल में TMC में बड़ी टूट का दावा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव के करीब एक महीने के भीतर तृणमूल कांग्रेस में टूट की स्थिति पैदा हुई। उलूबेड़िया पूर्व के विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय और एंटाली के विधायक संदीपन साहा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अलग तृणमूल संगठन बनाने की घोषणा की थी। दावा किया गया कि बाद में करीब 64 तृणमूल विधायक उनके साथ जुड़ गए। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने ऋतब्रत और संदीपन को पार्टी से निष्कासित कर दिया। हालांकि, विवाद तब और बढ़ गया, जब विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे दी।
10 विधायकों की सदस्यता पर टिकी निगाहें
बागी विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कालीघाट स्थित तृणमूल नेतृत्व की ओर से कानूनी लड़ाई जारी है। शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने इन विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई है और अब विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले में अगले सप्ताह संभावित सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत का रुख यह तय करने में अहम हो सकता है कि याचिका पर आगे किस तरह की कानूनी कार्रवाई होगी। फिलहाल, पश्चिम बंगाल में दल-बदल, विपक्ष के नेता की मान्यता और बागी विधायकों की सदस्यता को लेकर राजनीतिक और कानूनी टकराव जारी है।