डेस्क। शारदीय नवरात्रि में कन्या पूजन (Kanya Pujan) की तारीख और सही समय को लेकर अक्सर असमंजस की स्थिति बनी रहती है। इस बार सप्तमी तिथि दो दिन होने के कारण व्रत और पूजन के दिन को लेकर लोगों में संशय है। पंचांग और शास्त्रों के नियमों के आधार पर पंडित राकेश झा ने अष्टमी और नवमी के कन्या पूजन का सटीक समय और नियम साझा किए हैं, जिससे आपका सारा कंफ्यूजन दूर हो जाएगा।
अष्टमी तिथि और कन्या पूजन का सही समय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग अष्टमी तिथि पर कन्या पूजन करते हैं, वे सप्तमी का व्रत रखते हैं।
- अष्टमी तिथि का आरंभ: पंचांग के अनुसार, 18 तारीख को सुबह 08:29 बजे के बाद अष्टमी तिथि शुरू होगी और यह 19 तारीख को सुबह 10:52 बजे तक रहेगी।
- पूजन कब करें?: आप 18 तारीख को सुबह 08:29 बजे के बाद पूरे दिन अष्टमी तिथि के संयोग में कन्या पूजन कर सकते हैं। इसके अलावा, जो लोग उदयकाल की तिथि को प्राथमिकता देते हैं, वे 19 तारीख को सुबह 10:52 बजे से पहले भी कन्या पूजन कर सकते हैं और उसके बाद व्रत का पारण कर सकते हैं।
नवमी तिथि और कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त
जो श्रद्धालु नवमी तिथि के दिन कन्या पूजन और व्रत का पारण करते हैं, उनके लिए विशेष नियम बताए गए हैं।
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- नवमी तिथि का आरंभ: 19 तारीख को सुबह 10:52 बजे के बाद नवमी तिथि का आरंभ होगा।
- पूजन का समय: नवमी तिथि का कन्या पूजन 19 तारीख को सुबह 10:52 बजे के बाद किया जा सकता है। इसके अलावा, जो लोग अगले दिन यानी 20 तारीख को पूजन करना चाहते हैं, वे सुबह 12:50 बजे (दोपहर से पहले) तक कर सकते हैं, क्योंकि इसके बाद दशमी तिथि लग जाएगी।
कन्या पूजन के दौरान इन नियमों का रखें विशेष ध्यान
शास्त्रों में माता रानी को प्रसन्न करने के लिए कन्या पूजन की एक निश्चित और पवित्र प्रक्रिया बताई गई है:
- आयु सीमा: कन्या पूजन के लिए 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की आयु की कन्याओं को ही घर पर आमंत्रित करना चाहिए। इस उम्र की कन्याओं को मां दुर्गा का सीधा स्वरूप माना जाता है।
- लंगूर या बटुक पूजन: कन्याओं के साथ एक छोटे बालक (जिसे भैरव बाबा या लांगुर कहा जाता है) को भी भोजन और पूजन में जरूर शामिल करना चाहिए।
- पूजन विधि: सबसे पहले कन्याओं का आदर के साथ स्वागत करें, उनके चरण धोएं। इसके बाद उनके माथे पर रोली-अक्षत का तिलक लगाएं, हाथ में कलावा बांधें और लाल चुनरी ओढ़ाएं।
- भोग और विदाई: कन्याओं को हलवा, पूरी और चने का प्रसाद श्रद्धापूर्वक परोसें। भोजन के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा और उपहार दें, फिर उनके पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें और उन्हें विदा करें।
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