नई दिल्ली: देश के राजनीतिक गलियारों में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने विपक्ष के कड़े विरोध प्रदर्शनों और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं के दबाव के बीच महज 24 घंटे के भीतर दो बड़े और ऐतिहासिक फैसले लिए। चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों यानी INDIA ब्लॉक और CJP की दो प्रमुख मांगों को स्वीकार कर लिया है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने साल 2018 के उस दौर की याद ताजा कर दी है जब खुद चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसी ही एक मांग का कड़ा विरोध किया था।
चुनाव आयोग द्वारा लिए गए 2 बड़े फैसले
1. 17 राज्यों में स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) का ऐलान
चुनाव आयोग ने चुनावी राज्यों सहित कुल 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) की घोषणा कर दी है।
- क्यों उठी थी मांग? पिछले कुछ समय से चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया चलाई जा रही थी, जिसके चलते नियमित वार्षिक SSR पर रोक लगी हुई थी।
- Gen-Z वोटर्स को राहत: SSR वह प्रक्रिया है जिसके जरिए हर साल 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके नए युवाओं (Gen-Z) का नाम मतदाता सूची में दर्ज किया जाता है। पिछले दो वर्षों से SSR बंद होने के कारण नए युवा वोटर कार्ड के लिए पंजीकरण नहीं करा पा रहे थे।
2. इतिहास में पहली बार मिलेगी वोटर लिस्ट की ‘सर्चable’ सॉफ्ट कॉपी
विपक्ष की एक अन्य बड़ी मांग को मानते हुए चुनाव आयोग ने पहली बार राजनीतिक दलों को मतदाता सूचियों की सॉफ्ट कॉपी PDF फॉर्मेट में देने का निर्देश दिया है।
- क्या होगा बदलाव? अब तक चुनाव आयोग केवल स्कैन किए हुए दस्तावेजों की PDF देता था, जिसमें कोई भी नाम सीधे सर्च (Search) नहीं किया जा सकता था।
- सर्च करने की सुविधा: नए आदेश के तहत अधिकारियों को ऐसी सॉफ्ट कॉपी देने को कहा गया है जिसमें जोड़े गए, हटाए गए और संशोधित किए गए सभी नामों को आसानी से टेक्स्ट या नाम के जरिए खोजा जा सके।
13 करोड़ नाम हटने के बाद गरमाई सियासत
चुनाव आयोग की ओर से चलाए गए SIR (Special Intensive Revision) अभियान के दौरान देश के लगभग 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से करीब 13 करोड़ लोगों के नाम हटाए जाने की रिपोर्ट्स सामने आई हैं। इस भारी-भरकम पैमाने पर नाम कटने के बाद विपक्ष आक्रामक हो गया और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सोची-समझी रणनीति के तहत वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं।
विपक्ष का तंज: “सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद आई अक्ल”
चुनाव आयोग के इस यू-टर्न पर कांग्रेस पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सांसद पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर तंज कसते हुए लिखा कि कड़े विरोध प्रदर्शनों और सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद आखिरकार चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को समझ आ गई है। चिदंबरम ने सवाल उठाया कि करोड़ों नाम अवैध रूप से हटाने के बाद अब चुनाव आयोग ‘छूटे हुए’ मतदाताओं को शामिल करने के लिए SSR तो करा रहा है, लेकिन जिन लोगों को प्रताड़ित होना पड़ा और जो प्रशासनिक खर्च बढ़ा, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
2018 का वह दौर: जब ECI ने SC में किया था विरोध
इस पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिस सॉफ्ट कॉपी को देने का फैसला आज चुनाव आयोग ने ‘ऐतिहासिक’ तौर पर लिया है, ठीक वैसी ही मांग साल 2018 में उठाई गई थी।
- कमलनाथ की याचिका: साल 2018 में कांग्रेस नेता कमलनाथ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राजनीतिक दलों को वोटर लिस्ट की एडिटेबल/सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध कराने की मांग की थी।
- ECI का रुख: उस दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर इसका पुरजोर विरोध किया था। ECI ने तर्क दिया था कि वोटर लिस्ट की सॉफ्ट कॉपी देने से नागरिकों की प्राइवेसी (गोपनीयता) खतरे में पड़ सकती है और डेटा का दुरुपयोग हो सकता है।
लेकिन वर्तमान राजनीतिक दबाव, विरोध प्रदर्शनों और कानूनी लड़ाइयों के बीच चुनाव आयोग को अपने सात साल पुराने रुख से पीछे हटना पड़ा है। बहरहाल, 17 राज्यों में शुरू होने वाले इस नए रिवीजन से युवाओं को तो राहत मिलेगी, लेकिन SIR के तहत काटे गए 13 करोड़ नामों का मुद्दा अभी भी राजनीतिक और कानूनी रूप से गरमाया हुआ है।