नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मामले में हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर आखिरी अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही देश के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के इस मामले का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता (अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल) की अपील और स्थगन की मांग को ठुकराते हुए इसे खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही खारिज कर दिया था। लगभग 40 साल पुराना यह रक्षा सौदा अदालतों और राजनीति के केंद्र में रहा था।
क्या था बोफोर्स घोटाला?
यह मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है, जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं।
साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने खुलासा किया था कि इस सौदे को पक्का करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को करोड़ों रुपये की घूस (कमीशन) दी गई थी। इस खुलासे से भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया था और इसे 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का एक बड़ा कारण माना गया था।
सीबीआई जांच और कोर्ट का रुख
- सीबीआई जांच: सीबीआई ने जनवरी 1990 में इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। अक्तूबर 2000 में दायर चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था।
- दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: 31 मई 2005 को दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स और एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले के इतने लंबे समय तक खिंचने पर हैरानी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और सुनवाई या देरी की कोई गुंजाइश नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स मामले से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुकी हैं।