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क्या मालदा के निवासियों को बाढ़ और कटाव के अभिशाप से मिलेगी मुक्ति? वर्षों का इंतजार होगा खत्म, सीएम शुभेंदु के आश्वासन से अबकी बार जगी आस

पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर बसा मालदा जिला—एक ऐसा भूभाग, जहां की हर सुबह मानसून के दिनों में सहम कर होती है। यहां की आबोहवा में कलकल बहती नदियों का संगीत नहीं, बल्कि अपने ही आशियानों को नदी में. . .

कोलकाता/मालदा: पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर बसा मालदा जिला—एक ऐसा भूभाग, जहां की हर सुबह मानसून के दिनों में सहम कर होती है। यहां की आबोहवा में कलकल बहती नदियों का संगीत नहीं, बल्कि अपने ही आशियानों को नदी में समाते देख सहमे लोगों की सिसकियां गूंजती हैं। गंगा, फुलहर और महानंदा के बीच सैंडविच बने इस जिले के लिए बाढ़ और नदी का कटाव (Ganga Erosion) कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा दर्द है जो दशकों से पीढ़ियों दर पीढ़ियों ट्रांसफर होता आ रहा है। लेकिन क्या अब इस अंतहीन इंतजार का अंत होने वाला है? क्या दिल्ली में हुई हालिया उच्च-स्तरीय बैठकों और ऐतिहासिक घोषणाओं के बाद मालदा के लोगों को इस страш (भीषण) चक्रव्यूह से हमेशा के लिए मुक्ति मिलेगी? आइए टटोलते हैं इस दर्द की दास्तान और भविष्य की उम्मीदों को।

1998 का वह खौफनाक मंज़र: जब थम गई थीं सांसे

मालदा के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1998 की विनाशकारी बाढ़ का जिक्र आते ही आज भी बुजुर्गों की आंखें सिहर उठती हैं। वह साल था जब मानिकचक घाट पर गंगा नदी का जलस्तर अपने रिकॉर्ड तोड़ स्तर 26.50 मीटर पर जा पहुंचा था। उस महाप्रलय ने जो निशान छोड़े, वे महज़ ज़मीन पर नहीं, बल्कि लोगों के जेहन में हमेशा के लिए दर्ज हो गए। तब से लेकर आज (2026) तक, हर साल मानसून आते ही मालदा के लिए वक्त जैसे थम जाता है। भौगोलिक विडंबना यह है कि जब उत्तर प्रदेश या बिहार (जैसे वाराणसी या पटना) में भारी बारिश के बाद पानी छोड़ा जाता है, तो उसका सीधा और सबसे भयंकर प्रहार मालदा के मानिकचक (Manikchak) और रतुआ (Ratua) ब्लॉकों पर पड़ता है।

न सिर्फ बाढ़, बल्कि ज़मीन निगल जाने वाला ‘कटाव’

मालदा में संकट सिर्फ पानी भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे भी बड़ा खौफ नदी के कटाव (Erosion) का है। गंगा और उसकी सहायक नदियां जब विकराल रूप धारण करती हैं, तो वे सिर्फ तटबंधों को नहीं, बल्कि बस्तियों के अस्तित्व को ही मिटा देती हैं। कुछ समय पहले ही गंगा की गोद में समाया 150 साल पुराना ऐतिहासिक शिव मंदिर इस बात का मूक गवाह है कि नदियां यहां इतिहास और संस्कृति को भी नहीं बख्शतीं। हाल ही में (सितंबर-अक्टूबर 2026 में) एक बार फिर जब गंगा का जलस्तर खतरे के निशान से 75 सेंटीमीटर ऊपर पहुंचा, तो भूटनी द्वीप (Bhutni Diap) का तटबंध टूट गया। रतुआ और मानिकचक के 60 से अधिक गांव रातों-रात जलमग्न हो गए और लगभग 3 लाख लोग बेघर होने की कगार पर आ खड़े हुए। किसानों की उपजाऊ फसलें नदी में बह गईं और लोग सड़क के किनारे टेंट लगाकर रहने को मजबूर हो गए।

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अबकी बार जगी आस: दिल्ली से आई राहत की बयार

दशकों की उपेक्षा और राजनीतिक खींचतान के बाद, इस बार तस्वीर बदलती दिख रही है। 15 लंबे वर्षों के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्र के साथ हुई गंगा बाढ़ नियंत्रण बोर्ड की बैठक में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद मोर्चा संभालते हुए इस समस्या के स्थायी समाधान का ब्लू-प्रिंट पेश किया है:

  1. पड़ोसी राज्यों से तालमेल और ड्रेजिंग: मानिकचक के भूतनी और रतुआ में बाढ़ रोकने के लिए बिहार सरकार के साथ योजनाएं पहले ही तय हो चुकी हैं। अब 16 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में नदी की ड्रेजिंग (गाद निकालने) के लिए झारखंड सरकार के ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) की प्रक्रिया पर बात आगे बढ़ चुकी है।
  2. फरक्का बैराज का मोर्चा और 500 करोड़ का फंड: साल 2018 के अधूरे पड़े समझौतों को जीवंत करते हुए, अब राज्य और केंद्र ने मिलकर कमर कस ली है। केंद्र सरकार ने इस दिशा में शुरुआती तौर पर 500 करोड़ रुपये जारी करने का निर्देश दे दिया है, जिससे नदिया तक के 80 किलोमीटर के दायरे में कटाव रोकने के पक्के उपाय किए जाएंगे।
  3. घाटाल मास्टर प्लान को रफ्तार: सिर्फ मालदा ही नहीं, बल्कि बहुप्रतीक्षित घाटाल मास्टर प्लान के लिए भी 1,200 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से काम खुद अपने हाथों में लेने की घोषणा कर दी गई है।

क्या वाकई खत्म होगा वर्षों का वनवास?

मालदा के एक आम नागरिक के मन में आज भी एक ही सवाल है— “क्या इस बार वादों के बांध कागजों से बाहर निकलकर ज़मीन पर उतरेंगे?” भूटनी द्वीप के एक बुजुर्ग किसान कहते हैं, “हर साल चुनाव के वक्त नेता आते हैं, बांध बांधने के बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं, और मानसून आते ही सब बह जाता है। इस बार उम्मीद जगी है कि शायद हमारे बच्चे सुरक्षित घरों में सो सकें।” यदि केंद्र और राज्य सरकार की यह मिली-जुली इच्छाशक्ति धरातल पर उतरी, तो वह दिन दूर नहीं जब मालदा के मानिकचक और रतुआ के लोग हर साल की इस तबाही से आज़ाद हो जाएंगे। यह सिर्फ एक भौगोलिक समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि लाखों जिंदगियों को उनका खोया हुआ सम्मान और सुरक्षा वापस दिलाने की आखिरी उम्मीद है।

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