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कैंसर मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण: ₹1 लाख में मिलने वाली इम्यूनोथेरेपी अब ₹30 हजार में, गरीब परिवारों को बड़ी राहत की उम्मीद

कैंसर का नाम सुनते ही किसी भी परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है—क्या अपनों की जान बचाने के लिए इलाज का खर्च उठा पाएंगे? बीमारी से लड़ने की जद्दोजहद के बीच जब दवाओं की कीमत लाखों. . .

नई दिल्ली: कैंसर का नाम सुनते ही किसी भी परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है—क्या अपनों की जान बचाने के लिए इलाज का खर्च उठा पाएंगे? बीमारी से लड़ने की जद्दोजहद के बीच जब दवाओं की कीमत लाखों रुपये तक पहुंच जाती है, तो कई परिवारों के लिए उम्मीद और आर्थिक मजबूरी के बीच चुनाव करना बेहद मुश्किल हो जाता है। लेकिन अब कैंसर के इलाज से जुड़ी एक सकारात्मक खबर सामने आई है। इम्यूनोथेरेपी की प्रमुख दवा निवोलुमब के सस्ते विकल्प बाजार में आने से मरीजों को इलाज कम कीमत पर उपलब्ध होने की उम्मीद बढ़ी है। जिस इलाज के एक साइकिल पर पहले एक लाख रुपये से अधिक खर्च हो सकता था, उसी दवा के एक विकल्प की कीमत अब करीब 30 हजार रुपये बताई जा रही है। यानी इलाज का खर्च काफी कम हो सकता है। यह बदलाव उन परिवारों के लिए खास मायने रखता है, जो महंगे इलाज के कारण अपनी बचत खत्म करने, कर्ज लेने या इलाज के विकल्पों पर दोबारा विचार करने को मजबूर हो जाते हैं। हालांकि, कम कीमत का लाभ हर मरीज को समान रूप से मिलेगा या नहीं, यह दवा की उपलब्धता, कैंसर के प्रकार और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करेगा।

जब इलाज की कीमत उम्मीद से बड़ी हो जाए

कैंसर केवल मरीज के शरीर को ही नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करता है। अस्पताल के चक्कर, जांच, दवाएं और लंबे इलाज का खर्च परिवार की आर्थिक स्थिति पर भारी पड़ सकता है। कई बार मरीज के परिजन अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं, जबकि कुछ परिवारों को इलाज जारी रखने के लिए कर्ज का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में इम्यूनोथेरेपी की कीमत में कमी एक महत्वपूर्ण राहत बन सकती है। यदि मरीज को डॉक्टर की सलाह के अनुसार यह दवा दी जाती है, तो कम खर्च में इलाज का विकल्प मिलने से परिवार पर आर्थिक दबाव घट सकता है। मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल के डॉक्टर इमरान शेख के अनुसार, सस्ता विकल्प आने के बाद पिछले छह महीनों में उनके यहां इम्यूनोथेरेपी लिखे जाने के मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि पहले जिन मरीजों को एक साइकिल पर एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च करने में परेशानी होती थी, वे अब लगभग 30 हजार रुपये की कीमत पर इलाज कराने के लिए अधिक सहज महसूस कर रहे हैं।

क्या है इम्यूनोथेरेपी, जो कैंसर के खिलाफ लड़ाई में जगा रही है उम्मीद?

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इम्यूनोथेरेपी कैंसर के इलाज का एक आधुनिक तरीका है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर कोशिकाओं की पहचान करने और उनसे लड़ने में मदद दी जाती है। निवोलुमब इसी तरह की एक दवा है, जो कुछ प्रकार के कैंसर में इस्तेमाल की जाती है।

इस इलाज की खासियत यह है कि उपयुक्त मरीजों में यह लंबे समय तक बीमारी को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसका असर हर मरीज पर एक जैसा नहीं होता। कैंसर का प्रकार, उसकी अवस्था, मरीज की सेहत और ट्यूमर की जैविक विशेषताओं के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं कि इम्यूनोथेरेपी उपयोगी होगी या नहीं।

इसलिए दवा सस्ती होने का मतलब यह नहीं है कि यह हर तरह के कैंसर का इलाज कर सकती है। लेकिन जिन मरीजों के लिए यह उपयुक्त है, उनके लिए कम कीमत इलाज तक पहुंच आसान बना सकती है।

पहले सिर्फ 2.8% योग्य मरीजों को मिल पा रहा था इलाज

टाटा मेमोरियल सेंटर के वर्ष 2022 के एक अध्ययन के अनुसार, इम्यूनोथेरेपी के योग्य मरीजों में से केवल 2.8 प्रतिशत को ही यह उपचार मिल पा रहा था। महंगी दवाएं इसकी पहुंच सीमित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल थीं। यह आंकड़ा बताता है कि चिकित्सा विज्ञान में नई खोज होना ही पर्याप्त नहीं है। जब तक उसका लाभ आम मरीज तक नहीं पहुंचता, तब तक बड़ी संख्या में लोग आधुनिक इलाज से वंचित रह सकते हैं। सस्ती दवाओं की उपलब्धता इस अंतर को कम करने में मदद कर सकती है। इससे उन मरीजों को भी इलाज के विकल्प पर डॉक्टर से चर्चा करने का अवसर मिल सकता है, जिनके लिए पहले इसकी कीमत सबसे बड़ी बाधा थी।

कुछ कैंसर में बेहतर नतीजों ने बढ़ाई उम्मीद

टाटा मेमोरियल अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग से जुड़े डॉ. कुमार प्रभास के अनुसार, कुछ कैंसर में इम्यूनोथेरेपी से उपचार के परिणामों में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।

  • स्किन कैंसर: कुछ उन्नत मामलों में इम्यूनोथेरेपी से लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बेहतर हुई है।
  • फेफड़ों का कैंसर: एडवांस स्टेज के कुछ मरीज भी इलाज के बाद पांच साल या उससे अधिक समय तक जीवित रह पा रहे हैं।
  • कोलन कैंसर: चुनिंदा शुरुआती मामलों में, विशेष जैविक विशेषताओं वाले ट्यूमर के लिए इम्यूनोथेरेपी से सर्जरी और कीमोथेरेपी के बिना इलाज संभव हो सकता है। ऐसे फैसले विशेषज्ञों की जांच और करीबी निगरानी में ही लिए जाते हैं।

इन नतीजों से उम्मीद जरूर बढ़ती है, लेकिन इन्हें हर मरीज पर लागू नहीं माना जा सकता। इलाज के परिणाम कैंसर के प्रकार और मरीज की व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार अलग-अलग होते हैं।

दवा सस्ती हुई, लेकिन इलाज की राह में चुनौतियां अब भी बाकी

दवा की कीमत घटने के बावजूद सभी मरीजों के लिए इम्यूनोथेरेपी तक पहुंच आसान होना अभी बाकी है। डॉक्टरों के अनुसार, भारत में उपलब्ध चेकपॉइंट इनहिबिटर दवाओं के विकल्प सीमित हैं और कुछ दवाएं अब भी आयात करनी पड़ती हैं। इनके इलाज का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। एक दूसरी चुनौती अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता है। थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क के के.एम. गोपीकुमार ने चिंता जताई है कि कुछ अस्पताल अपने मेडिकल स्टोर से ही दवाएं खरीदने की शर्त रख सकते हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि कम कीमत वाले विकल्प भी मरीजों के लिए उपलब्ध हों और खरीदारी के फैसले में मरीज के हित को प्राथमिकता मिले। दवा सस्ती होने का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब मरीज को उचित कीमत पर उसका विकल्प मिल सके और अस्पतालों में वह आसानी से उपलब्ध हो।

आगे और घट सकती है कीमत, ₹10 हजार तक पहुंचने की उम्मीद

निवोलुमब के चार और संस्करण बाजार में आने की संभावना जताई गई है। यदि इन विकल्पों के आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, तो दवा की कीमत लगभग 30 हजार रुपये से घटकर 10 हजार रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह संभावित कीमत है, इसकी गारंटी नहीं है। वास्तविक कीमत बाजार में उपलब्धता, प्रतिस्पर्धा और अस्पतालों की खरीद नीति पर निर्भर करेगी। इसके अलावा, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की ओर से 137 कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने के कदम से भी मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद जताई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इससे सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान है।

असली जीत तब होगी, जब पैसे की कमी इलाज के आड़े नहीं आएगी

कैंसर के खिलाफ लड़ाई में मरीज और उसका परिवार पहले ही मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों से गुजरता है। ऐसे में इलाज की कीमत कम होना केवल आर्थिक राहत नहीं, बल्कि उपचार जारी रखने की संभावना और भविष्य के प्रति भरोसा भी बढ़ा सकता है। निवोलुमब के सस्ते विकल्पों का आना इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है। लेकिन इस बदलाव की असली सफलता तब होगी, जब कम कीमत वाली दवाएं जरूरतमंद मरीजों को समय पर मिलें, अस्पतालों में उनकी उपलब्धता सुनिश्चित हो और इलाज की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो। क्योंकि कैंसर से लड़ रहे किसी परिवार के लिए दवा की कीमत में कमी सिर्फ पैसों की बचत नहीं होती—यह अपनों के साथ कुछ और समय बिताने, इलाज जारी रखने और उम्मीद बनाए रखने का एक अवसर भी हो सकता है।

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