नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया। अदालत ने कहा कि SIR की प्रक्रिया पूरी होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया गया है या उसमें नए नाम जोड़ने का रास्ता बंद हो गया है। मतदाता सूची में नाम शामिल कराने की प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है। केरल, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पुनरीक्षण की समय-सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत की टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया कि ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए नामों को दोबारा शामिल कराने का विकल्प खुला रहेगा। इससे उन लोगों को राहत मिल सकती है, जिनके नाम पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से हट गए हैं।
वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने का रास्ता रहेगा खुला
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR की समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी पात्र मतदाता अपना नाम सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। अदालत के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। इसलिए केवल SIR पूरा होने के आधार पर समय-सीमा बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है।
नामांकन तक मतदाता सूची में शामिल हो सकता है नाम
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता डी. एस. नायडू ने बताया कि SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी मतदाता अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम समय-सीमा तक मतदाता सूची में नाम जोड़ने का प्रावधान उपलब्ध रहता है। इससे उन पात्र नागरिकों को राहत मिल सकती है, जिनका नाम किसी कारणवश पुनरीक्षण के दौरान सूची में शामिल नहीं हो पाया।
यूपी में फॉर्म-7 को लेकर गड़बड़ी, अधिकारियों पर कार्रवाई का भरोसा
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश में कुछ अधिकारियों द्वारा बड़ी संख्या में फॉर्म-7 स्वीकार करने की प्रक्रिया में अनियमितताएं हुई थीं। गौरतलब है कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज किसी नाम को हटाने या हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि इन गड़बड़ियों को सुधारने के लिए जरूरी कदम उठाए गए हैं। साथ ही, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आश्वासन भी दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को छूट दी कि वे इस तरह की अनियमितताओं से संबंधित शिकायतें सीधे चुनाव आयोग के सामने रख सकते हैं।
केरल में 24 लाख मतदाताओं के नाम हटने का दावा
केरल में SIR को लेकर भी सुनवाई के दौरान गंभीर सवाल उठाए गए। चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि राज्य में पुनरीक्षण की प्रक्रिया फरवरी में पूरी हो गई थी और इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में उसी मतदाता सूची का इस्तेमाल किया गया। वहीं, माकपा (CPM) की ओर से पेश अधिवक्ता जी. प्रकाश ने दावा किया कि केरल में करीब 24 लाख मतदाता अभी भी मतदाता सूची से बाहर हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी से ऐसे मतदाताओं का विस्तृत ब्योरा मांगा, जो समय की कमी के कारण अपने आवेदन या संबंधित फॉर्म जमा नहीं कर पाए थे। अदालत का उद्देश्य इन मामलों की जांच कराना और चुनाव आयोग को जरूरी सुधारात्मक कदम उठाने का अवसर देना है।
चुनाव आयोग को दाखिल करना होगा विस्तृत जवाब
सुनवाई के दौरान एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने केरल में SIR के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आरोप लगाया। उन्होंने दलील दी कि पुनरीक्षण प्रक्रिया पूरी हो जाने के बावजूद चुनाव आयोग को इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करना चाहिए, ताकि नाम हटाए जाने की प्रक्रिया और उससे जुड़ी शिकायतों की स्थिति स्पष्ट हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। अदालत ने आयोग को संबंधित याचिका और वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन की ओर से पेश किए गए नोट, दोनों पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया।
मतदाताओं के लिए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों अहम?
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि SIR पूरा होने के बाद भी पात्र नागरिकों के लिए मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का विकल्प बना रहेगा। यानी पुनरीक्षण की प्रक्रिया समाप्त होने का अर्थ मतदाता बनने का अधिकार समाप्त होना नहीं है। अदालत ने समय-सीमा बढ़ाने से भले ही इनकार किया हो, लेकिन उसकी टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची में सुधार और नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी प्रावधानों के तहत जारी रह सकती है। इससे उन नागरिकों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके नाम किसी त्रुटि, दस्तावेजों की कमी या अन्य कारणों से सूची से बाहर हो गए हैं।