कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद के बीच पार्टी के भीतर से बड़े खुलासे सामने आए हैं। टीएमसी सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने निर्वाचन आयोग (EC) की कार्यप्रणाली और विरोधी रितव्रत गुट के तौर-तरीकों पर तीखे सवाल खड़े किए हैं, खासकर उपचुनावों के दौरान की गई कार्रवाई पर गंभीर संदेह जताया गया है।
72 दिनों की चुप्पी और उपचुनाव के ठीक पहले सक्रियता
सूत्रों का दावा है कि 6 जुलाई से 12 सितंबर के बीच यानी पूरे 72 दिनों की लंबी अवधि तक तथाकथित बागी गुट ने चुनाव आयोग को एक लाइन का भी जवाब नहीं दिया था। इन 72 दिनों तक आयोग पूरी तरह शांत बैठा रहा, लेकिन जैसे ही उपचुनावों की घोषणा हुई, आयोग अचानक हरकत में आ गया। इस दौरान बागी गुट की तरफ से केवल बार-बार समय सीमा (एक्सटेंशन) बढ़ाने की मांग की जाती रही।
चुनाव चिह्न चुनने के लिए सिर्फ 11 घंटे का समय
पार्टी सूत्रों के अनुसार, चुनाव आयोग ने नया चुनाव चिह्न चुनने के लिए केवल 11 घंटे का बेहद कम समय दिया। इतनी कम अवधि में किसी भी राजनीतिक दल के लिए व्यावहारिक निर्णय लेना असंभव सा होता है, जिसे लेकर पार्टी हलकों में गहरी नाराजगी और हैरानी है।
सांगठनिक चुनाव और नेतृत्व की पूर्ण वैधता
एआईटीसी (AITC) ने चुनाव आयोग के सामने 10 अहम बिंदु रखे हैं। इसके तहत यह स्पष्ट किया गया है कि पिछले 20 वर्षों में पार्टी के सांगठनिक चुनाव हर 5 साल पर नियमित रूप से हुए हैं, जिसके अनुसार अगले सांगठनिक चुनाव 2027 में होने हैं। पार्टी की चेयरपर्सन ही नेशनल वर्किंग कमेटी (NWC) की भी चेयरपर्सन हैं, जिससे नेतृत्व को लेकर किसी भी संशय की गुंजाइश नहीं बचती।
बागी गुट के दोहरे रुख पर कानूनी सवाल
सूत्रों से पता चला है कि बागी गुट जिस एनडब्ल्यूसी और चेयरपर्सन के कार्यकाल को मार्च 2025 में समाप्त होने का दावा कर रहा है, उसी चेयरपर्सन के हस्ताक्षर वाले फॉर्म से उन्होंने मार्च 2026 के चुनाव में उम्मीदवारी दर्ज कराई थी। इतना ही नहीं, उन्होंने चुनाव फंड के रूप में 25 लाख रुपये अपने खाते में स्वीकार भी किए थे। कानूनी शब्दावली में इसे ‘एप्रोबेट एंड रिप्रोबेट’ यानी सुविधा के अनुसार अपना रुख बदलना कहा जाता है।
पार्टी संविधान के आधार पर बागी गुट के दावे खारिज
पार्टी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि चुनाव आयोग के सामने हुई ब्रीफिंग में बागी गुट की तथाकथित अवैध और फर्जी बैठकों को एआईटीसी के संविधान के आधार पर पूरी तरह से बेनकाब कर दिया गया। पार्टी का मानना है कि आंतरिक मामलों और स्थापित कानूनी प्रावधानों को दरकिनार कर लिए गए फैसले लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिल्कुल अनुकूल नहीं हैं।