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श्रावण सोमवार को बाबा महाकाल भी रखते हैं व्रत, नगर भ्रमण से लौटने के बाद लगता है भोग; जानिए पूरी परंपरा

उज्जैन: श्रावण माह शुरू होते ही उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगती है। भगवान शिव को समर्पित इस पवित्र महीने में महाकाल के दर्शन और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। खास. . .

उज्जैन: श्रावण माह शुरू होते ही उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगती है। भगवान शिव को समर्पित इस पवित्र महीने में महाकाल के दर्शन और पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। खास तौर पर श्रावण के सोमवार को मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों और दर्शन का महत्व और बढ़ जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रावण सोमवार को व्रत रखकर बाबा महाकाल की आराधना करने से भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता यह भी है कि श्रावण माह में भगवान शिव का जल, दूध और बेलपत्र से अभिषेक करने से कई जन्मों के पापों का नाश होता है।

श्रावण सोमवार को बाबा महाकाल रखते हैं उपवास

महाकाल मंदिर की परंपराओं से जुड़ी मान्यता के अनुसार, श्रावण माह के प्रत्येक सोमवार को बाबा महाकाल भी उपवास रखते हैं। इस दिन भगवान नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं और प्रजा का हाल जानते हैं।नगर भ्रमण पूरा होने के बाद जब बाबा महाकाल मंदिर लौटते हैं, तब उन्हें भोग अर्पित किया जाता है। यही वजह है कि श्रावण सोमवार की पूजा पद्धति और भोग की परंपरा सामान्य दिनों से कुछ अलग होती है।

सुबह भस्म आरती से शुरू होती है पूजा

महाकाल मंदिर में प्रतिदिन की शुरुआत भस्म आरती से होती है। वंश परंपरा से जुड़े पुजारी विधि-विधान के साथ बाबा महाकाल की भस्म आरती संपन्न कराते हैं।

इसके बाद सुबह करीब 7 बजे आरती होती है। इस दौरान भगवान को चावल, दही और शक्कर का भोग अर्पित किया जाता है। हालांकि, श्रावण सोमवार को भगवान को विशेष रूप से फलाहार का भोग लगाने की परंपरा बताई जाती है।

पंचामृत पूजन के बाद लगता है अन्न का भोग

सुबह करीब 10 बजे बाबा महाकाल का पंचामृत पूजन किया जाता है। इसके बाद भोग आरती के दौरान भगवान को दाल, चावल, रोटी, सब्जी, भजिए और लड्डू सहित विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।श्रावण सोमवार को होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में यह भोग आरती विशेष मानी जाती है।

शाम को राजा स्वरूप में दर्शन देते हैं बाबा महाकाल

शाम करीब 5 बजे बाबा महाकाल का स्नान कराया जाता है। इसके बाद जलाभिषेक बंद कर दिया जाता है और भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है।श्रृंगार के बाद बाबा महाकाल राजा के स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। शाम करीब 7 बजे संध्या आरती होती है, जिसमें भगवान को दूध का भोग लगाया जाता है।

शयन आरती में मेवे का प्रसाद

रात्रि में करीब 10:20 बजे शयन आरती संपन्न होती है। इस दौरान बाबा महाकाल को मेवे का प्रसाद अर्पित किया जाता है। शयन आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।इस तरह श्रावण सोमवार के दिन बाबा महाकाल की पूजा, भोग और आरती की पूरी प्रक्रिया विशेष धार्मिक परंपराओं के अनुसार संपन्न होती है।

जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाने की खास मान्यता

मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा के अनुसार, श्रावण माह भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इस दौरान भगवान शिव को जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।धार्मिक मान्यता के मुताबिक, श्रावण में भगवान शिव के दर्शन और पूजन से कई जन्मों के पाप नष्ट होते हैं और भक्त को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

एक से एक लाख बेलपत्र चढ़ाने का भी महत्व

पंडित महेश शर्मा के अनुसार, भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करने की भी अलग धार्मिक महत्ता है। एक बेलपत्र से लेकर बड़ी संख्या में बेलपत्र अर्पित करने तक की परंपरा बताई गई है। मान्यता है कि अधिक संख्या में बेलपत्र अर्पित करने से अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

माता सती और पार्वती से जुड़ी है व्रत की परंपरा

श्रावण माह में रखे जाने वाले व्रतों को लेकर धार्मिक कथाओं में माता सती और माता पार्वती का विशेष उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने और उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर व्रत और तपस्या की थी। इसी धार्मिक परंपरा के कारण श्रावण माह में भगवान शिव की पूजा, सोमवार का व्रत और अभिषेक को विशेष फलदायी माना जाता है। उज्जैन में बाबा महाकाल की पूजा के दौरान इन परंपराओं का पालन विशेष श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया जाता है।

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