डेस्क। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व माना गया है। यह समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का होता है। पितृ पक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और हवन जैसे धार्मिक कार्य किए जाते हैं। ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या के साथ होगा।
पितरों की शांति के लिए किया जाता है तर्पण
पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों पितर लोक से पूर्वज पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने परिवार के सदस्यों को आशीर्वाद देते हैं। यही कारण है कि पितृ पक्ष के दौरान उनके नाम से पूजा, तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों को तृप्ति और शांति मिलती है तथा परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
श्रद्धा से किया गया कर्म ही कहलाता है श्राद्ध
श्राद्ध शब्द का संबंध श्रद्धा से माना जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार, दिवंगत परिजनों की आत्मा की तृप्ति और शांति के लिए श्रद्धापूर्वक किया गया तर्पण और धार्मिक कर्म श्राद्ध कहलाता है। मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान मृत्यु के देवता यमराज पितरों को अपने परिजनों के पास जाने की अनुमति देते हैं, ताकि वे अपने परिवार द्वारा किए गए तर्पण को ग्रहण कर सकें। मृत व्यक्ति चाहे स्त्री हो या पुरुष, विवाहित हो या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग—उनके निधन के बाद उन्हें पितर के रूप में स्मरण किया जाता है।
पिंडदान, तर्पण और हवन का है विशेष महत्व
पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं। इस दौरान पिंडदान, तर्पण और हवन आदि धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। कई श्रद्धालु पितरों की शांति के लिए गया सहित अन्य तीर्थस्थलों पर जाकर पिंडदान भी करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण करने से उन्हें शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है।
पितृ पक्ष में शुभ कार्यों से क्यों किया जाता है परहेज?
पितृ पक्ष के दिनों को पूर्वजों को समर्पित माना जाता है। इसलिए इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और कर्ण छेदन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। कई परंपराओं में इस दौरान नए कपड़े खरीदने या पहनने से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है।इन दिनों में परिवार के लोग पितरों के निमित्त भोजन निकालते हैं और उनकी निर्धारित तिथि पर ब्राह्मण भोज भी कराया जाता है।
दोपहर में किया जाता है पितरों का तर्पण
देवी-देवताओं की पूजा के लिए सुबह और शाम का समय प्रमुख माना जाता है, जबकि पितरों से जुड़े श्राद्ध कर्म के लिए दोपहर का समय उपयुक्त माना जाता है। सामान्य तौर पर दोपहर करीब 12 बजे श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। सुबह नित्यकर्म और स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद पितरों का तर्पण करने की परंपरा है।
इस साल कब-कब होगा श्राद्ध?
पितृ पक्ष की प्रमुख तिथियां इस प्रकार हैं:
- 26 सितंबर — पूर्णिमा श्राद्ध
- 27 सितंबर — प्रतिपदा श्राद्ध
- 28 सितंबर — द्वितीया श्राद्ध
- 29 सितंबर — तृतीया श्राद्ध
- 30 सितंबर — चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
- 1 अक्टूबर — षष्ठी श्राद्ध
- 2 अक्टूबर — सप्तमी श्राद्ध
- 3 अक्टूबर — अष्टमी श्राद्ध
- 4 अक्टूबर — नवमी श्राद्ध
- 5 अक्टूबर — दशमी श्राद्ध
- 6 अक्टूबर — एकादशी श्राद्ध
- 7 अक्टूबर — द्वादशी श्राद्ध
- 8 अक्टूबर — त्रयोदशी श्राद्ध
- 9 अक्टूबर — चतुर्दशी श्राद्ध
- 10 अक्टूबर — सर्व पितृ अमावस्या
- 11 अक्टूबर — मातामह नान श्राद्ध
पितृ पक्ष में अपने दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है। जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए सर्व पितृ अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है।