ब्लड ग्रुप और टाइप-2 डायबिटीज के बीच संभावित संबंध पर रिसर्च, लेकिन सिर्फ ब्लड टाइप के आधार पर खतरे का आकलन करना सही नहीं
डेस्क: डायबिटीज आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। खासकर टाइप-2 डायबिटीज के मामलों में जीवनशैली, वजन, शारीरिक गतिविधि और आनुवंशिक कारणों की बड़ी भूमिका मानी जाती है। लेकिन क्या आपका ब्लड ग्रुप भी डायबिटीज के खतरे से जुड़ा हो सकता है?इसी सवाल पर अलग-अलग अध्ययनों में शोध किया गया है। कुछ रिसर्च में A, B और AB ब्लड ग्रुप वाले लोगों में O ग्रुप की तुलना में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक पाया गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि किसी खास ब्लड ग्रुप वाला व्यक्ति डायबिटीज का शिकार जरूर होगा।
A, B, AB और O में क्या अंतर है?
इंसानों में मुख्य रूप से चार ABO ब्लड ग्रुप होते हैं—A, B, AB और O। इनके अलावा Rh फैक्टर के आधार पर ब्लड ग्रुप पॉजिटिव या नेगेटिव हो सकता है। यानी किसी व्यक्ति का ब्लड ग्रुप A+, A-, B+, B-, AB+, AB-, O+ या O- हो सकता है। वैज्ञानिकों ने लंबे समय से यह अध्ययन किया है कि ABO ब्लड ग्रुप का कुछ बीमारियों के जोखिम से कोई संबंध है या नहीं। डायबिटीज को लेकर भी इसी दिशा में कई शोध हुए हैं।
क्या B ब्लड ग्रुप में डायबिटीज का खतरा ज्यादा है?
कुछ अध्ययनों में B ब्लड ग्रुप और टाइप-2 डायबिटीज के बीच संभावित संबंध पाया गया है। उपलब्ध शोधों के विश्लेषण में B ब्लड ग्रुप वाले लोगों में टाइप-2 डायबिटीज के मामले अपेक्षाकृत अधिक देखे गए हैं, जबकि O ब्लड ग्रुप को कुछ अध्ययनों में अपेक्षाकृत कम जोखिम से जोड़ा गया है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है—संबंध पाए जाने का मतलब यह नहीं है कि ब्लड ग्रुप ही डायबिटीज का कारण है। किसी व्यक्ति में डायबिटीज विकसित होने के पीछे कई दूसरे कारक भी हो सकते हैं।
A, B और AB ग्रुप को लेकर क्या कहती हैं रिसर्च?
कुछ बड़े observational studies में O ब्लड ग्रुप की तुलना करते हुए A, B और AB ग्रुप में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम अधिक पाया गया। एक रिपोर्ट में O ब्लड ग्रुप वाली महिलाओं की तुलना में A ग्रुप में जोखिम लगभग 10%, B ग्रुप में करीब 21% और AB ग्रुप में लगभग 17% अधिक बताया गया था। हालांकि, ऐसे आंकड़ों को व्यक्तिगत भविष्यवाणी के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। रिसर्च में पाया गया संबंध आबादी के स्तर पर हो सकता है और इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि A, B या AB ग्रुप वाले हर व्यक्ति को डायबिटीज का ज्यादा खतरा है।
ब्लड ग्रुप डायबिटीज को कैसे प्रभावित कर सकता है?
वैज्ञानिक अभी तक इस संबंध की पूरी वजह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं। ABO ब्लड ग्रुप लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर मौजूद कुछ विशेष एंटीजन और शरीर में मौजूद अन्य जैविक प्रक्रियाओं से जुड़ा होता है। शोधकर्ताओं ने ब्लड ग्रुप और शरीर में सूजन, रक्त वाहिकाओं तथा मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं के बीच संभावित संबंधों पर अध्ययन किया है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ब्लड ग्रुप सीधे तौर पर टाइप-2 डायबिटीज पैदा करता है। इसलिए ब्लड ग्रुप को एक संभावित बायोमार्कर या रिसर्च फैक्टर के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन इसे अकेले डायबिटीज का जोखिम तय करने का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।
डॉक्टरों के मुताबिक सबसे अहम हैं दूसरे रिस्क फैक्टर
टाइप-2 डायबिटीज एक मल्टी-फैक्टोरियल बीमारी है। यानी इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण हो सकते हैं। NIDDK के अनुसार अधिक वजन या मोटापा, शारीरिक रूप से कम सक्रिय रहना, परिवार में डायबिटीज का इतिहास, उम्र बढ़ना और प्रीडायबिटीज जैसे कारक जोखिम बढ़ाते हैं। गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज का इतिहास भी आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे से जुड़ा है।
किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत?
इन स्थितियों में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है:
- परिवार में माता-पिता या भाई-बहन को डायबिटीज होना।
- शरीर का वजन अधिक होना या मोटापा।
- शारीरिक गतिविधि बहुत कम होना।
- प्रीडायबिटीज होना।
- उम्र बढ़ना, खासकर 35 वर्ष के बाद जोखिम बढ़ना।
- गर्भावस्था के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज का इतिहास।
- हाई ब्लड प्रेशर और कुछ अन्य मेटाबॉलिक समस्याएं।
- धूम्रपान या तंबाकू का सेवन। 1
इनमें से कई जोखिम कारकों को जीवनशैली में बदलाव के जरिए कम किया जा सकता है।
डायबिटीज के इन संकेतों को नजरअंदाज न करें
टाइप-2 डायबिटीज कई बार धीरे-धीरे विकसित होती है और शुरुआत में स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। फिर भी कुछ संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है:
- बार-बार पेशाब आना।
- सामान्य से ज्यादा प्यास लगना।
- ज्यादा भूख लगना।
- लगातार थकान महसूस होना।
- धुंधला दिखाई देना।
- हाथ-पैर में झुनझुनी या सुन्नपन।
- घाव का देर से भरना।
- बिना वजह वजन कम होना।
अगर ऐसे लक्षण लगातार बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेकर ब्लड ग्लूकोज की जांच कराना उचित है। डायबिटीज और प्रीडायबिटीज की पुष्टि रक्त जांच से की जाती है। N
ब्लड ग्रुप नहीं, लाइफस्टाइल पर दें ज्यादा ध्यान
अगर आपका ब्लड ग्रुप A, B या AB है, तो सिर्फ इस वजह से घबराने की जरूरत नहीं है। मौजूदा चिकित्सा जानकारी में ब्लड ग्रुप को टाइप-2 डायबिटीज का स्वतंत्र और निर्णायक जोखिम कारक नहीं माना जाता।वहीं वजन नियंत्रित रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना, संतुलित आहार लेना और धूम्रपान से बचना डायबिटीज के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। NIDDK के अनुसार वजन कम करना और नियमित शारीरिक गतिविधि टाइप-2 डायबिटीज को रोकने या देर से होने में मदद कर सकती है।
निष्कर्ष:
O ग्रुप को कम जोखिम से जोड़ अपने ब्लड ग्रुप को लेकर चिंता करने के बजाय वजन, खान-पान, व्यायाम, पारिवारिक इतिहास और ब्लड शुगर जैसे वास्तविक जोखिम कारकों पर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि जोखिम कारक मौजूद हैं या लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह से समय पर जांच कराना सबसे सुरक्षितने वाली रिसर्च, लेकिन कहानी इतनी सरल नहीं रिसर्च में B, A और AB ब्लड ग्रुप को O ग्रुप की तुलना में टाइप-2 डायबिटीज के अधिक जोखिम से जोड़ने वाले संकेत मिले हैं। लेकिन ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि ब्लड ग्रुप अकेले किसी व्यक्ति को डायबिटीज से बचा सकता है या बीमारी पैदा कर सकता है।इसलिए अपने ब्लड ग्रुप को लेकर चिंता करने के बजाय वजन, खान-पान, व्यायाम, पारिवारिक इतिहास और ब्लड शुगर जैसे वास्तविक जोखिम कारकों पर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि जोखिम कारक मौजूद हैं या लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह से समय पर जांच कराना सबसे सुरक्षित कदम है।