कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहा घमासान अब एक नए पड़ाव पर पहुंच गया है। चुनाव आयोग के कड़े रुख के बाद, ममता बनर्जी खेमे और ऋतब्रत बनर्जी के बागी गुट ने आगामी उपचुनावों के लिए अपने-अपने तीन-तीन वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्नों की सूची आयोग को सौंप दी है।
दोनों गुटों के विकल्प और चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला
- ममता खेमे के विकल्प: सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी के धड़े ने ‘तृणमूल ममता कांग्रेस’ या ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ममता’ जैसे नाम सुझाए हैं। वहीं, चुनाव चिह्नों के विकल्पों में फुटबॉल, प्रार्थना और क्रिकेट बैट को शामिल किया गया है, जिसमें क्रिकेट बैट के साथ ‘खेला होबे’ का स्लोगन भी भेजा गया है।
- ऋतब्रत गुट का पक्ष: बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने भी पुष्टि की है कि उन्होंने अपने 3 नाम और 3 सिंबल ईमेल के जरिए चुनाव आयोग को भेज दिए हैं।
- चुनाव आयोग का रुख: चुनाव आयोग ने पैरा 15 की कार्यवाही के तहत मूल पार्टी के नाम और ‘फूल-घास’ वाले आरक्षित चुनाव चिह्न पर अंतिम फैसला आने तक रोक लगा दी है। आगामी उपचुनावों के लिए यह व्यवस्था पूरी तरह अंतरिम है, जिसके तहत दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और फ्री सिंबल आवंटित किए जाएंगे।
विवाद की शुरुआत और मुख्य कारण
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी को मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर बगावत शुरू हो गई थी। चुनाव के बाद अधिकांश जीते हुए विधायकों ने ममता बनर्जी को नेता मानने से इनकार कर दिया और ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में एक अलग गुट बना लिया। इसके बाद पार्टी फंड, नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार की कानूनी लड़ाई शुरू हो गई। बागी गुट का तर्क है कि टीएमसी की नेशनल वर्किंग कमेटी का गठन फरवरी 2022 में हुआ था, जिसका 3 साल का कार्यकाल फरवरी 2025 में समाप्त हो चुका है। इसी आधार पर उन्होंने मौजूदा संगठनात्मक ढांचे को अवैध बताते हुए 22 जून 2026 को एक बैठक में अरूप रॉय को कमेटी का नया चेयरपर्सन चुने जाने का दावा किया।
ममता गुट का पलटवार और आयोग की कार्रवाई
ममता बनर्जी गुट ने बागी गुट के इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। ममता खेमे का कहना है कि बागी गुट ने पार्टी संविधान की गलत व्याख्या की है और उनकी तथाकथित बैठकें पूरी तरह अवैध हैं। विवाद तब और गहरा गया जब नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव घोषित हुए और दोनों गुटों ने आधिकारिक नाम व ‘फूल-घास’ चिह्न पर अपना दावा ठोक दिया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों के दस्तावेज और पक्ष सुनने के बाद 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी किया, जिसके तहत दोनों पक्षों को फिलहाल नए नाम और सिंबल के साथ मैदान में उतरना होगा।