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भारत पर ट्रिपल अटैक! महंगे क्रूड के बाद भीषण गर्मी और कम बारिश ने बढ़ाई टेंशन, एक्सपर्ट ने दिए बड़ी तबाही के संकेत

नई दिल्ली। तेल और गैस संकट के बाद भारत पर इस समय भीषण गर्मी और कम बारिश की मार पड़ सकती है। इससे और आर्थिक संकट गहरा सकता है। दरअसल, उत्तर भारत में 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुकी भीषण. . .

नई दिल्ली। तेल और गैस संकट के बाद भारत पर इस समय भीषण गर्मी और कम बारिश की मार पड़ सकती है। इससे और आर्थिक संकट गहरा सकता है। दरअसल, उत्तर भारत में 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुकी भीषण गर्मी और मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश के अनुमान ने नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के बाद अब खाद्य महंगाई अर्थव्यवस्था के लिए नया जोखिम पैदा कर रही है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इन कारणों से आने वाले महीनों में खाद्य कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जिससे आम लोगों की जेब पर असर पड़ेगा।

भारत के सामने कई आर्थिक चुनौतियां

@ रेकॉर्ड बिजली मांग: भीषण गर्मी के कारण घरों और दफ्तरों में एसी-कूलर के बढ़ते इस्तेमाल से देश में बिजली की मांग रेकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। शनिवार को देश में पावर डिमांड रेकॉर्ड 256 GW पहुंच गई थी।
@ मानसून का संकट: जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसून की बारिश खेती के लिए जीवन रेखा है। सरकार और मौसम विशेषज्ञों ने इस साल बारिश सामान्य से कम रहने की भविष्यवाणी की है।
@ महंगाई दर में उछाल: अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि 1 अप्रैल से शुरू हुए चालू वित्त वर्ष में महंगाई दर 5% के पार जा सकती है, जबकि रिजर्व बैंक (RBI) ने इसे 4.6% रहने का अनुमान जताया था।

बड़ी तबाही जैसी स्थिति

ऑस्ट्रेलिया एंड न्यू जीलैंड (ANZ) बैंकिंग ग्रुप के अर्थशास्त्री धीरज निम के अनुसार, भीषण गर्मी और अनिश्चित मानसून खाद्य कीमतों के लिए जोखिम पैदा करेंगे। ऊंची ऊर्जा कीमतें और खेती की बढ़ती लागत आने वाले समय में परफेक्ट स्टॉर्म यानी बड़ी तबाही जैसी स्थिति पैदा कर सकती है। निम को उम्मीद है कि इस वित्तीय वर्ष में मुद्रास्फीति औसतन 5% के करीब रहेगी।

महंगाई 5.8% तक पहुंच सकती है

अर्थशास्त्री अभिषेक गुप्ता का कहना है किस अगर मानसून खराब रहता है तो महंगाई 5.8% तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक को अपनी ब्याज दरों में कटौती की योजना टालनी पड़ सकती है या दरें बढ़ानी भी पड़ सकती हैं। पिछले साल जब बारिश 5.4% कम हुई थी, तब खाद्य महंगाई बढ़कर 8% पर पहुंच गई थी। इस बार भी हालात चुनौतीपूर्ण लग रहे हैं।

आम आदमी पर सीधा असर

@ कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी 37% है। यह इंडेक्स में सबसे बड़ा हिस्सा है। इसलिए अनाज या सब्जियों के दाम बढ़ने का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है।

@भारत की 60% से अधिक आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है और खेती पर निर्भर है। ऐसे में इसका गहरा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।

@खराब फसल से किसानों की आय घटेगी, जिससे ग्रामीण भारत में सामान की मांग कम हो सकती है।

@बारिश कम होने पर किसानों को डीजल पंपों का सहारा लेना होगा। ईरान युद्ध के कारण कच्चा तेल पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पार है, जिससे खेती की लागत काफी बढ़ जाएगी।

राहत की उम्मीद भी

कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि स्थिति नियंत्रण में भी रह सकती है। नोमुरा होल्डिंग्स के अनुसार, भारत के पास गेहूं और चावल का अच्छा बफर स्टॉक है। इससे खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। नोमुरा के मुताबिक बेहतर सिंचाई सुविधाओं और जलवायु-प्रतिरोधी बीजों के कारण खेती पर अल नीनो का असर अब पहले के मुकाबले कम होता है।

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