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शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: गिनाईं 5 बड़ी दिक्कतें, जहरीली शराब से 600 से ज्यादा मौतों का किया जिक्र

नई दिल्ली: शराबबंदी की प्रभावशीलता और उसके सामाजिक-प्रशासनिक असर पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को अहम टिप्पणियां कीं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध से जुड़ी कई चुनौतियों. . .

नई दिल्ली: शराबबंदी की प्रभावशीलता और उसके सामाजिक-प्रशासनिक असर पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को अहम टिप्पणियां कीं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध से जुड़ी कई चुनौतियों का जिक्र करते हुए पूछा कि ऐसी पाबंदी से वास्तव में क्या हासिल होता है। अदालत ने शराबबंदी से जुड़ी पांच प्रमुख समस्याओं की ओर इशारा किया। इनमें राजस्व का नुकसान, प्रतिबंध लागू करने पर होने वाला सरकारी खर्च, पुलिस में भ्रष्टाचार, अवैध शराब के कारोबार का बढ़ना और नशीले पदार्थों की ओर बढ़ता रुझान शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने गिनाईं शराबबंदी की 5 बड़ी समस्याएं

पीठ ने शराबबंदी की नीतियों के प्रभाव पर चर्चा करते हुए पांच प्रमुख पहलुओं का उल्लेख किया:

1. सरकार को राजस्व का नुकसान

शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने से राज्यों को मिलने वाले आबकारी राजस्व में कमी आती है। अदालत ने शराबबंदी के आर्थिक प्रभाव को भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

2. कानून लागू करने में भारी खर्च

शराबबंदी को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए निगरानी, जांच और अवैध शराब की तस्करी रोकने पर सरकारी संसाधन खर्च होते हैं। अदालत ने इस अतिरिक्त प्रशासनिक और वित्तीय बोझ का भी उल्लेख किया।

3. पुलिस में भ्रष्टाचार का खतरा

पीठ ने कहा कि शराबबंदी के कारण जब शराब का कारोबार भूमिगत होता है तो कानून लागू करने वाली एजेंसियों के स्तर पर भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ सकती है। यह शराबबंदी से जुड़े प्रमुख प्रशासनिक जोखिमों में से एक है।India

4. अवैध और जहरीली शराब का कारोबार

अदालत ने कहा कि पूर्ण शराबबंदी से शराब का कारोबार भूमिगत होने और अनियंत्रित शराब के उत्पादन का खतरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में जहरीली या मिलावटी शराब की घटनाएं गंभीर जनहानि का कारण बन सकती हैं। पीठ ने गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में लंबे समय से सख्त शराबबंदी लागू है, फिर भी राज्य के गठन के बाद कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हुई हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत हुई।

5. दूसरे नशीले पदार्थों की ओर बढ़ने का खतरा

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शराब की उपलब्धता पर प्रतिबंध के बाद कुछ लोग दूसरे नशीले पदार्थों की ओर जा सकते हैं। अदालत ने शराबबंदी से जुड़े संभावित ड्रग्स खतरे को भी अपनी टिप्पणी में शामिल किया।

गुजरात और मध्य प्रदेश की जहरीली शराब त्रासदियों का जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में हुई जहरीली शराब की घटनाओं का भी उल्लेख किया। पीठ ने गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हुई घटनाओं को अधिकारियों के लिए चेतावनी बताया। रिपोर्ट के मुताबिक, भावनगर में जहरीली शराब से 13 लोगों और सागर में 15 लोगों की मौत हुई थी। अदालत ने इन घटनाओं को अवैध और अनियंत्रित शराब के कारोबार से जुड़े जोखिम के संदर्भ में देखा।

1991 के मुंबई शराब कांड के बाद बने थे महाराष्ट्र के नियम

यह मामला महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18A और 18B से जुड़ा था। इन नियमों के तहत मेथनॉल की खरीद पर प्रतिबंध और गैर-दवा निर्माताओं को इसकी बिक्री से पहले उसमें कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की अनिवार्यता जैसे प्रावधान थे। ये नियम 1991 में मुंबई में मेथनॉल मिले जहरीले शराब कांड में 93 लोगों की मौत के बाद बनाए गए थे। केमिकल मैन्युफैक्चरर्स और इंडियन केमिकल काउंसिल समेत कई याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के नियम क्यों रद्द किए?

पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की दलील को स्वीकार नहीं किया और नियम 18A तथा 18B को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने की अनिवार्यता तथा जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य के बीच पर्याप्त तार्किक संबंध स्थापित नहीं किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसे राज्य की मंशा पर संदेह नहीं है, लेकिन केवल अच्छी मंशा किसी नियम को मनमानेपन की कसौटी से बाहर नहीं कर सकती।

अदालत का सवाल: क्या इससे मेथनॉल का इस्तेमाल वास्तव में रुकेगा?

पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि मेथनॉल में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाने से उसके लगातार इस्तेमाल को किस तरह रोका या हतोत्साहित किया जाएगा। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या इन पदार्थों को मिलाने से मेथनॉल की रासायनिक संरचना इस तरह बदलेगी कि उसका इस्तेमाल जहरीली शराब बनाने में संभव न रहे। साथ ही अदालत ने यह सवाल उठाया कि अगर अवैध शराब बनाने वाले दूसरे मिलावटी पदार्थों का इस्तेमाल करें, तो उन्हें रोकने के लिए राज्य की क्या रणनीति होगी।

शराबबंदी की नीति पर फिर उठी बहस

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं जब गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में शराबबंदी को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। अदालत ने मौजूदा मामले में शराबबंदी की संवैधानिक वैधता पर कोई व्यापक फैसला नहीं दिया, बल्कि जहरीली शराब रोकने के लिए बनाए गए महाराष्ट्र के विशिष्ट नियमों की प्रभावशीलता और तर्कसंगतता पर सवाल उठाए। इस मामले ने एक बार फिर शराबबंदी के उद्देश्य, उसके क्रियान्वयन और अवैध शराब से होने वाले नुकसान के बीच संतुलन को लेकर बहस को सामने ला दिया है।

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