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Bengal Election 2026 : बिहार की तरह बंगाल में बहेगा बयार या फिर उलटे आएंगे नतीजे, एसआईआर के बाद ऐतिहासिक मतदान ने बढ़ाया सस्पेंस ? बढ़ी सियासी दलों की धड़कन

पटना। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में विशेष गहण निरिक्षण यानी एसआईआर (SIR) के बाद वोटर लिस्ट साफ हुई। तत्कालीन बिहार सरकार भारत निर्वाचन आयोग इस बड़े फैसले के साथ खड़ी दिखी। जब एसआईआर की रिपोर्ट आई तो लाखों. . .

पटना। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में विशेष गहण निरिक्षण यानी एसआईआर (SIR) के बाद वोटर लिस्ट साफ हुई। तत्कालीन बिहार सरकार भारत निर्वाचन आयोग इस बड़े फैसले के साथ खड़ी दिखी। जब एसआईआर की रिपोर्ट आई तो लाखों नाम कटे, लेकिन फिर भी रिकॉर्ड 67 प्रतिशत वोटिंग हुई। खास बात यह रही कि यह बिहार का अब तक का सबसे ऊंचा टर्नआउट था, नतीजा? नीतीश कुमार की NDA की भारी जीत हुई और दो दशक से चली आ रही उनकी सत्ता बरकरार ही रही. लोग कहते हैं कि साफ लिस्ट से असली वोटर निकले और इसका नीतीश कुमार को फायदा हुआ। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी SIR हुआ मगर यहां सियासी परिदृश्य थोड़ा बदला हुआ था। दरअसल, ममता बनर्जी एसआईआर के विरोध में खड़ी रहीं और इसे ‘वोट चोरी’ और ‘बांग्ला मां का अपमान’ बताया। लेकिन, चुनाव आयोग अपने फैसले पर अड़ा रहा और सुप्रीम कोर्ट के समर्थन से एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हुई और अब पहले चरण में वोटिंग हुई तो मतदान 10 प्रतिशत तक बढ़ गई। अब सवाल यही है- क्या यह बढ़ोतरी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ है या उनके पक्ष में?
बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में 23 अप्रैल को 152 सीटों पर रिकॉर्ड 92.88 प्रतिशत वोटिंग हुई। यह भारत की स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में मतदान का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। वर्ष 2021 में इन सीटों पर 83 प्रतिशत के आसपास वोट पड़े थे। वहीं, इस बार भी पिछली बार की तरह ही महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोट डाले। अब जब आगामी 29 अप्रैल को दूसरे चरण की 142 सीटों पर वोटिंग है तो उससे पहले ही यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या बंगाल में बिहार से उल्टा होने जा रहा है? इस सवाल का अर्थ सीधा सा यूं समझिए कि बिहार में मतदान प्रतिशत बढ़ा तो नीतीश कुमार ने सत्ता में पुनर्वापसी की, लेकिन पश्चिम बंगाल में वोटिंग प्रतिशत बढ़ने का मतलब सत्ता परिवर्तन का संकेत है?

बिहार में SIR के बाद क्या हुआ था?

बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने जोरदार वापसी करते हुए 243 में से लगभग 202 सीटों के पर जीत दर्ज की थी। 243 सदस्य वाली बिहार विधानसभा में यह स्पष्ट बहुमत के आंकड़े (122) से बहुत अधिक रही। वहीं विपक्षी महागठबंधन करीब 35 सीटों के दायरे में सिमट गया, जबकि अन्य दलों और निर्दलियों के खाते में सीमित सीटें ही आईं। वोट शेयर के स्तर पर भी एनडीए ने लगभग 50 प्रतिशत के आसपास समर्थन हासिल किया, जिससे उसकी बढ़त निर्णायक रही। इन नतीजों को मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के बाद बदले चुनावी समीकरणों और संगठित वोट ट्रांसफर से जोड़कर देखा गया, जिसने सत्ता वापसी का रास्ता आसान किया और विपक्ष को काफी हद तक धराशायी कर दिया।

विपक्ष का दावा: बदलाव की लहर साफ

इसी तर्ज पर बीजेपी की ओर से अमित शाह समेत कई नेता कह रहे हैं कि 92 प्रतिशत वोटिंग ‘भय से विश्वास’ की यात्रा है। उन्होंने दावा किया कि पहले चरण की 152 सीटों में बीजेपी 110 सीटें जीत सकती है। उनका तर्क है कि इतनी बड़ी भागीदारी सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) दिखाती है. TMC की 15 साल की सरकार में भ्रष्टाचार, सिंडिकेट्स और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे लोग भूल नहीं पाए। SIR से फर्जी वोटर कटे तो असली गुस्सा बाहर आ गया है। इसको लेकर सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रियता देखी जा रही है और #BengalWantsChange और #MamataOut ट्रेंड कर रहे हैं। राजनीतिक के जानकार कह रहे हैं कि अगर दूसरे चरण में भी यही पैटर्न रहा तो आगामी 4 मई को TMC की हार तय है।

TMC का जवाब: यही हमारी ताकत है!

दूसरी ओर ममता बनर्जी और टीएमसी (TMC) नेता इसे अपने पक्ष का संकेत बता रहे हैं। वे कहते हैं कि महिलाओं का रिकॉर्ड टर्नआउट लक्ष्मीर भंडार जैसी योजनाओं का नतीजा है और पहले चरण में ही 152 में से 106 सीटों पर टीएमसी ने बढ़त बना ली है। टीएमसी का दावा है कि मुसलमान वोटर भी उनके साथ मजबूती से खड़े हैं। दूसरी ओर टीएमसी अब भी SIR को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही है। इसी कड़ी में ममता बनर्जी का बयान भी आया है कि लोग गुस्से में निकले हैं, लेकिन यह TMC के समर्थन के लिए है। इसको लेकर कुछ जानकार भी मानते हैं कि बंगाल में मतदाताओं का अत्यधिक संख्या में मतदान के लिए निकलना ट्रेंड शो कर रहा है कि सत्ताधारी दल को फायदा देता रहा है। वे बिहार का उदाहरण भी देते हैं जहां नीतीश कुमार ने दोबारा सरकार बनाई थी. बता दें कि वर्ष 2021 में भी 83 प्रतिशत वोटिंग में TMC ने 215 सीटें जीती थीं. इसलिए उच्च मतदान (high voting) को सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) मानना गलत हो सकता है।

क्यों 4 मई से पहले ही ‘सत्ता चली गई’ की बहस?

लेकिन, सवाल यह कि बिहार होगा या बिहार का उल्टा होगा? इस सवाल पर राजनीति के जानकार इसकी दो वजहें भी बताते हैं। पहला, बिहार का उदाहरण… वहां SIR के बाद बढ़े मतदान प्रतिशत ने सत्ताधारी दल को मजबूती दी। दूसरी ओर बंगाल में उल्टा लग रहा है, क्योंकि विपक्ष इसे परिवर्तन का संकेत बता रहा है। दूसरा, राजनीतिक बयानबाजी भी कुछ इस बहस को आगे बढ़ा रहे हैं। एक ओर बीजेपी पहले चरण के बाद ही जीत का दावा कर रही है और कई मायनों में TMC डिफेंसिव दिख रही है। मीडिया और सोशल मीडिया में बंगाल एग्जिट पोल (Bengal exit poll) जैसे अनुमान पहले से चल रहे हैं और लोग 29 अप्रैल का इंतजार नहीं कर पा रहे। यह बहर इसलिए भी गर्म है क्योंकि 92 प्रतिशत वोटिंग ने सबको चौंका दिया है।

असली तस्वीर क्या है?

बहरहाल, अब 4 मई को पांच राज्यों के नतीजे आएंगे तो बंगाल का भविष्य साफ हो जाएगा। ऐसे में जानकार भी कहते हैं कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी है, क्योंकि उच्च मतदान लोकतंत्र की वास्तविक ताकत है। लेकिन अकेले हाई टर्न आउट के आधार पर ही फैसला नहीं तय किया जा सकता है। बंगाल में महिलाओं और अल्पसंख्यकों का वोटिंग पैटर्न, स्थानीय मुद्दे, स्थानीय नेतृत्व और दूसरे चरण में होने वाले मतदान तय करेंगे कि ऊंट किस करवट बैठेगा। बिहार में उच्च वोटिंग ने सत्ता बचाई है तो बंगाल में अगर यही ट्रेंड चला तो सत्ता बदल भी सकती है। वहीं, ममता की जादुई पकड़ बरकरार रह सकती है। ऐसे में अब 29 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान और 4 मई का चुनाव नतीजों के लिए इंतजार कीजिए। फिलहाल चर्चा यही है कि बंगाल 2026 में बिहार 2025 का उल्टा या वही फॉर्मूला दोहराएगा!

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