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टीएमसी में टूट के बाद ममता बनर्जी के सामने अस्तित्व का संकट, अब पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न बचाने की जद्दोजहद, जाने क्या है उनके पास विकल्प

डेस्क पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में इस कदर असंतोष उभरा कि पार्टी ही टूट के कगार पर पहुंच गई। टीएमसी में उभरते आंतरिक संकट ने राज्य की राजनीति में हलचल. . .

डेस्क पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में इस कदर असंतोष उभरा कि पार्टी ही टूट के कगार पर पहुंच गई। टीएमसी में उभरते आंतरिक संकट ने राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। विधानसभा स्पीकर रथींद्र बोस ने बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी है। बुधवार को अध्यक्ष ने उनके पद को मंजूरी दी और विधानसभा में विपक्ष को आवंटित कमरे की चाबियां उन्हें सौंप दीं।
1998 में स्थापना के बाद से ममता बनर्जी के लिए पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने के मामले में यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने ममता के विरोध किया है। ऋतब्रत बनर्जी को इस हफ्ते की शुरुआत में टीएमसी से निष्कासित कर दिया गया था, अब विधानसभा में इस बागी गुट का नेतृत्व कर रहे हैं।

राष्टीय राजनीति पर भी पडेगा टीएमसी में टूट का असर

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस घटनाक्रम को केवल बंगाल तक सीमित नहीं मान रही। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि टीएमसी में विभाजन होता है तो इसका सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ संसद में मिल सकता है, जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को कई महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता है। इसमें परिसीमन और एक राष्‍ट्र-एक चुनाव से जुड़े विधेयक अहम हैं. दो तिहाई बहुमत न होने की वजह से संसद के पछिले सत्र में परिसीमन विधेयक सरकार पास नहीं करवा सकी थी

फिरहाद हाकिम का इस्तीफा

यह फैसला नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर हुए विवाद के बाद आया है। ममता बनर्जी ने इस भूमिका के लिए अनुभवी नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम वाला पत्र सौंपा था, जिसमें नयना बंद्योपाध्याय और असीमा पात्रा को उपनेता और फिरहाद हाकिम को मुख्य सचेतक बनाया गया था। लेकिन बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने दावा किया कि पत्र पर किए गए हस्ताक्षर फर्जी थे। राज्य की सीआईडी अब इस मामले की जांच कर रही है।
स्पीकर के फैसले के कुछ ही मिनटों बाद ममता बनर्जी के करीबी और पार्टी के प्रमुख अल्पसंख्यक चेहरे फिरहाद हाकिम ने कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया। 67 वर्षीय हाकिम 2018 से इस पद पर थे और राज्य सरकार में कई मंत्री पदों पर भी रहे हैं। कोलकाता नगर निगम 2010 से तृणमूल के नियंत्रण में है।
बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद आ रही मुश्किलों का हवाला देते हुए उन्होंने पहले ही इस्तीफा देने की अनुमति मांगी थी, जिसे बुधवार को ममता बनर्जी ने मंजूरी दे दी।

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टीएमसी की सभी कमेटियां भंग

तृणमूल कांग्रेस ने आत्ममंथन के लिए समय की आवश्यकता बताते हुए अपनी सभी समितियों और अनुषांगिक संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया। वहीं, ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि हम ममता बनर्जी से अनुरोध करेंगे कि वे इस विपक्षी मोर्चे की हमारी मुख्य सलाहकार बनें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 18वीं पश्चिम बंगाल विधानसभा के गठन से अभिषेक बनर्जी का कोई लेना-देना नहीं है।
घटनाओं का यह क्रम महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुई राजनीतिक टूट की याद दिलाता है, हालांकि पश्चिम बंगाल में संदर्भ अलग है। महाराष्ट्र में सरकार गठन के दौरान विभाजन हुआ था और टूटकर अलग हुए गुटों के नेताओं को उपमुख्यमंत्री बनाया गया था। बाद में चुनाव आयोग ने उन बागी गुटों को असली पार्टी के रूप में मान्यता दी और उन्हें नाम तथा चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया।
एनडीटीवी के रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिम बंगाल में भाजपा के पास भारी बहुमत है और उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह टीएमसी नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करेगी। इसलिए, यह विभाजन विपक्ष के भीतर ही हुआ है।
विधानसभा में 58 विधायकों के समूह को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता दी गई है। मानव जायसवाल सहित टीएमसी नेताओं ने इस टूट को भाजपा द्वारा रची गई साजिश करार दिया है। जायसवाल ने कहा कि हर कोई जानता है कि क्या हो रहा है।

ममता के सामने क्या है चुनौतियां?

इससे पहले ऋतब्रत बनर्जी 80 में से 59 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए विधानसभा पहुंचे थे। उन्होंने दावा किया था कि उनका समूह ही असली तृणमूल कांग्रेस है, हालांकि सौंपे गए पत्र में उन्होंने ममता बनर्जी को ही अपना नेता बताया था। पार्टी के भीतर यह बगावत चुनाव में मिली हार के बाद से ही सुलग रही थी। भ्रष्टाचार और आरजी कर रेप-मर्डर केस से निपटने के तरीकों सहित कई मुद्दों पर नेताओं ने पार्टी की आलोचना की थी। पिछले हफ्ते कई बागी नेताओं ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई एक बैठक में भी हिस्सा लिया था।
इन घटनाक्रमों ने ममता बनर्जी को कई तात्कालिक चुनौतियों में डाल दिया है। विधानसभा में विभाजन के औपचारिक होने के बाद, ऋतब्रत बनर्जी नेता प्रतिपक्ष के अपने दर्जे का हवाला देते हुए असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता का दावा करने के लिए चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा सकती हैं।

पार्टी का नाम और चिह्न बचाने की जद्दोजहद

पार्टी सूत्रों का संकेत है कि आने वाले दिनों में लोकसभा और राज्यसभा में भी टीएमसी के भीतर विभाजन हो सकता है, जिससे अलग हुए गुट की स्थिति और मजबूत होगी। ममता बनर्जी का ध्यान अब पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न बचाने के प्रयासों पर केंद्रित हो गया है। महाराष्ट्र की नजीर को देखते हुए, यह काम काफी मुश्किल लग रहा है।
ममता बनर्जी के अनुरोध पर अगले हफ्ते दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दलों के शामिल होने और समर्थन देने की उम्मीद है। हालांकि, यह देखना बाकी है कि क्या विपक्ष का एकजुट समर्थन उन्हें अपने मौजूदा स्वरूप में तृणमूल कांग्रेस को बचाने के लिए पर्याप्त होगा।
पार्टी के ढांचे का तेजी से ढहना, नेता प्रतिपक्ष का पद छिनना और फिरहाद हाकिम जैसे प्रमुख चेहरे के इस्तीफे ने ममता बनर्जी को भारी दबाव में डाल दिया है, जबकि वह अपने राजनीतिक संगठन को फिर से खड़ा करने की जद्दोजहद कर रही हैं।

ममता के सामने फिलहाल पहला विकल्प कानूनी लड़ाई का

ममता बनर्जी के सामने फिलहाल पहला विकल्प कानूनी लड़ाई का है। वह विधानसभा अध्यक्ष द्वारा ऋतब्रत को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दिए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं।
ममता खेमे का दावा है कि विपक्ष के नेता के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम प्रस्तावित किया गया था। हालांकि संसदीय मामलों में अदालतें आमतौर पर सीधे हस्तक्षेप नहीं करतीं, लेकिन अतीत में कई मामलों में अध्यक्ष के फैसलों की न्यायिक समीक्षा हुई है।

दूसरा विकल्प बागी विधायकों को पार्टी से निष्कासित करने का

दूसरा विकल्प बागी विधायकों को पार्टी से निष्कासित करने का है। यदि ऐसा होता है तो तृणमूल के विधायकों की संख्या घटकर लगभग 20 रह जाएगी और पार्टी प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा भी खो सकती है। इसके बाद बागी विधायक चुनाव आयोग के पास जाकर स्वयं को असली तृणमूल बताकर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा कर सकते हैं।
ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग पूरे मामले की जांच करेगा। केवल विधायकों की संख्या ही नहीं, बल्कि सांसदों, संगठन के विभिन्न पदाधिकारियों और पार्टी संरचना में समर्थन का भी आकलन किया जाएगा। आयोग सभी पक्षों की राय लेकर तय करेगा कि वास्तविक तृणमूल किसे माना जाए।
इसलिए चुनाव चिह्न बचाने की संभावना अभी भी ममता खेमे के पास बनी रह सकती है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि विधायकों की यह बगावत सांसदों और संगठन के अन्य स्तरों तक भी पहुंची है या नहीं।

तीसरा रास्ता बागी विधायकों से बातचीत का

ममता बनर्जी के सामने तीसरा रास्ता बागी विधायकों से बातचीत का है। लेकिन यह विकल्प फिलहाल सबसे कठिन माना जा रहा है। बागी खेमे ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।
ऐसे में समझौते की कोई भी कोशिश अभिषेक की भूमिका को लेकर विवाद पैदा कर सकती है, जिसकी संभावना फिलहाल बेहद कम दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल इस समय अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है।
अब यह देखना होगा कि ममता बनर्जी कानूनी लड़ाई का रास्ता चुनती हैं, बागियों के खिलाफ कड़ा कदम उठाती हैं या फिर किसी तरह संगठन को एकजुट रखने का प्रयास करती हैं। आने वाले दिनों में तृणमूल का भविष्य और उसके चुनाव चिह्न की स्थिति काफी हद तक इन्हीं फैसलों पर निर्भर करेगी।

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