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एसआईआर और बंगाल का दर्द : राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% वोटरों का नाम कटा, हटाए गए वोटरों के लिए आखिर क्या है आगे का रास्ता है?

डेस्क। पूर्वी भारत में सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को चुनाव होने जा रहे हैं, और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। गुरुवार को हुए चुनावों. . .

डेस्क। पूर्वी भारत में सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में से एक पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को चुनाव होने जा रहे हैं, और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। गुरुवार को हुए चुनावों के बाद, अब सारा ध्यान इस पूर्वी राज्य पर केंद्रित हो गया है। फिलवक्त, यह राज्य एक निराशाजनक तस्वीर पेश कर रहा है। जो चुनाव शासन और रोजी-रोटी को लेकर होना चाहिए, वह इसके बजाय पहचान और मतदाता सूची की बुनावट पर लड़ा जा रहा है।

राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% वोटरों का नाम कटा

पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से क़रीब 91 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। यह काम राज्य की मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) के बाद हुआ। यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% है, जो बीते साल अक्तूबर में एसआईआर शुरू होने के समय क़रीब 7.66 करोड़ थी।इन 91 लाख में से 63 लाख से ज़्यादा वोटरों के नाम फ़रवरी में चुनाव आयोग की जारी सूची में ही हटा दिए गए थे। इन लोगों को “अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या डुप्लीकेट” बताया गया।
इसके अलावा 60.06 लाख वोटरों को “अंडर एडजुडिकेशन” यानी जांच के दायरे में रखा गया है। चुनाव आयोग के मुताबिक़ इन लोगों के रिकॉर्ड में “तार्किक गड़बड़ियां” थीं, जैसे नाम की स्पेलिंग, जेंडर में ग़लती, माता-पिता से उम्र का असामान्य अंतर आदि।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद, लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों को “अंडर एडजुडिकेशन” हर वोटर की योग्यता को उनके जमा किए गए पहचान के दस्तावेज़ों के आधार पर वेरिफ़ाई करने का काम सौंपा गया था।

अल्पसंख्यक मतदाता और सीमाई जिलों में रहने वाले लोग ज्यादा प्रभावित

वाम मोर्चा से सत्ता छीनने के बाद, तृणमूल कांग्रेस तीन बार से सत्ता में है। एक ज्यादा तर्कसंगत दुनिया में, 2026 का विधानसभा चुनाव पिछले 15 सालों में ममता बनर्जी-नीत सरकार के प्रदर्शन और इस सरकार द्वारा राज्य को प्रमुख सामाजिक-आर्थिक सूचकों में मध्य या निचले स्तर पर रखे जाने के सवाल पर निर्भर करता। फिर भी, हालिया अतीत में इस राज्य में मतदाताओं की पसंद तय करने में शासन लगभग कभी भी मानदंड नहीं रहा है और यह चुनाव भी अपवाद प्रतीत नहीं हो रहा है। यह राज्य उन एक दर्जन राज्यों में शामिल है जहां भारत निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया। यहां 91 लाख मतदाता घट गये, जो 12 फीसदी की कमी है। जमीनी रिपोर्टों ने उजागर किया कि बिहार के उलट, जहां नाम हटना सांप्रदायिक आधार पर ज्यादा समान रूप से वितरित था, पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक मतदाता और सीमाई जिलों में रहने वाले लोग गैर-आनुपातिक ढंग से प्रभावित हुए।

न्यायाधिकरण की प्रक्रिया चुनाव से पहले समाप्त होगी या नहीं

शुरू में ही एसआईआर की गणना प्रक्रिया में विलोपनों के अलावा, मसौदा सूची में 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं को ‘तार्किक असंगतियों’ वाला बताया गया। सुप्रीम कोर्ट ने, जिसने इन मतदाताओं की पात्रता तय करने के लिए हस्तक्षेप किया था, इस काम के लिए न्यायिक अधिकारी नियुक्त किये। लेकिन इस प्रक्रिया का नतीजा 27 लाख मतदाताओं का मताधिकार छिनने के रूप में सामने आया। इन्हें अब न्यायाधिकरणों पास जाने का विकल्प दिया गया है। इस बात को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है कि न्यायाधिकरण की प्रक्रिया चुनाव से पहले समाप्त होगी या नहीं।

एसआईआर को लेकर जमीन पर व्याप्त है गुस्सा

एसआईआर को लेकर जमीन पर व्याप्त गुस्सा और मतदाताओं पर अपनी पात्रता साबित करने के लिए डाले गये मुश्किल बोझ, जिनकी मुख्य वजह बेपरवाह निर्वाचन आयोग द्वारा दोषपूर्ण गणना प्रक्रिया अपनाना है, अब खुद एक चुनावी मुद्दा बन गये हैं और नागरिक व शासन संबंधी मुद्दे दरकिनार हो गये हैं। तृणमूल ने एसआईआर को लेकर असंतोष जाहिर किया है। उसने इसे केंद्र और निर्वाचन आयोग की गुप्त चाल का परिणाम बताया है, जबकि भाजपा ने एसआईआर को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। पश्चिम बंगाल को एक ऐसी राजनीति की सख्त जरूरत है जहां मुकाबला मुख्यत: कृषि और सेवा पर आधारित अर्थव्यवस्था में रोजगार वाली औद्योगिक वृद्धि हासिल करने के सवाल पर हो, न कि मतदाताओं की धार्मिक व भाषाई पहचानों पर।
बंगाल एसआईआर में क्या सच में कुछ विवादित है?

राज्यों में क़रीब 8% नाम हटाए गए

फ़रवरी में जब चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट प्रकाशित की थी, तब पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में क़रीब 8% नाम हटाए गए थे। एक अन्य बड़े राज्य तमिलनाडु जहां चुनाव होना है वहां भी क़रीब 74 लाख नाम हटाए गए, जो पश्चिम बंगाल के लगभग समान स्तर है। इसके अलावा, चुनाव आयोग ने मतदाता लिस्ट से “विदेशियों” के नाम हटाने पर भी कोई ख़ास डेटा नहीं दिया है।
लेकिन विवाद असली आंकड़ों में नहीं, बल्कि प्रक्रिया में है। सबसे पहले, पॉलिटिकल जानकारों ने बताया है कि “तार्किक विसंगतियां” कैटेगरी, जिसके कारण लाखों वोटर “अंडर ज्यूरिडिक्शन” में आए हैं, उसका ज़िक्र एसआईआर के बारे में चुनाव आयोग के शुरुआती आदेश में नहीं किया गया था। इसे पश्चिम बंगाल से पहले किसी भी राज्य में लागू नहीं किया गया था।
चुनाव आयोग के शुरुआती नियमों के मुताबिक़, अगर कोई वोटर ख़ुद या अपने माता-पिता का नाम 2002 की वोटर लिस्ट से जोड़ सकता था, तो उसे योग्य माना जाता, लेकिन बाद में उसी डेटा में भी “गड़बड़ियां” बताकर लोगों को जांच में डाल दिया गया।

बेंगल में एसआईआर बिहार या बाक़ी देश से बिलकुल अलग


राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा, “बंगाल के एसआईआर में जो हुआ वो बिहार या बाक़ी देश से बिलकुल अलग है। “”चुनाव आयोग ने यह मानकर शुरुआत की कि बंगाल में वोटर्स की संख्या बहुत ज़्यादा है और उसने एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी के लिए राज्य के बाहर से अधिकारियों की एक फ़ौज को काम पर रखा। बंगाल के बारे में ख़ास बात यह भी है कि इन 60 लाख वोटर्स की एक ख़ास कांट-छांट की गई.”
कोलकाता के एक थिंक टैंक सबर इंस्टीट्यूट के एक विश्लेषण में पाया गया कि मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल ज़िलों में वोटरों के नाम हटाने की संख्या “बहुत ज़्यादा” थी।
ख़ास बात यह है कि “अंडर एडजुडिकेशन” में रखे गए वोटरों में से “अयोग्य” घोषित लोगों की सूची में मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है। उत्तर 24 परगना और मालदा इस सूची में दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं।
इन बातों ने तृणमूल कांग्रेस के इस दावे को बल दिया है कि एसआईआर प्रक्रिया में उसके मुस्लिम समर्थन आधार को निशाना बनाया गया। पिछले महीने कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीबीसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से कुछ समुदायों के ख़ुद को निशाना बनाए जाने की भावना पर सवाल किया। इसके जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार पूरक सूचियां जारी की जाएंगी. मंज़ूरी की यह सूची वेबसाइट पर भी उपलब्ध होगी और चरणबद्ध तरीक़े से जारी की जाएगी। “
वहीं दो अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पश्चिम बंगाल बीजेपी नेता शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी का “भारतीय मुसलमानों” से कोई विरोध नहीं है, लेकिन वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि “पश्चिम बंगाल, पश्चिम बांग्लादेश न बन जाए। “

चुनाव आयोग ने 19 अपील ट्रिब्यूनल बनाए

सोमवार को “अयोग्य” घोषित किए गए वोटरों के नाम तकनीकी रूप से अभी पूरी तरह वोटर लिस्ट से हटाए नहीं गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग ने 19 अपील ट्रिब्यूनल बनाए हैं, जहां वोटर अपनी योग्यता पर लिए गए फ़ैसलों के ख़िलाफ़ अपील या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं। जब वोटर लिस्ट फ्रीज़ होने में कुछ ही घंटे बचे थे, तब पूरे राज्य में हज़ारों लोग ज़िला प्रशासन कार्यालयों के बाहर अपील दर्ज कराने के लिए लाइन में खड़े दिखे। लेकिन 9 अप्रैल तक वोटर लिस्ट पूरी तरह फ़ाइनल हो जाने के कारण इन 91 लाख वोटरों के लिए इस चुनाव में अपनी योग्यता साबित कर वोट देने का लगभग कोई मौक़ा नहीं है। हालांकि अगर वे बाद में अपनी योग्यता साबित कर देते हैं, तो उन्हें अगले चुनावों में वोट देने की अनुमति होगी। ये हटाए गए वोटर नए वोटर के रूप में भी पंजीकरण नहीं कर पाएंगे क्योंकि इसकी आख़िरी तारीख़ 31 मार्च निकल चुकी है.

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