कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 206 सीटों पर जीत दर्ज की है और प्रदेश में ममता बनर्जी के चौथी बार सीएम बनने के सपने को भी तोड़ दिया। वहीं टीएमसी को महज 80 सीटों पर जीत मिली है। इसके अलावा सीएम ममता बनर्जी खुद अपनी सीट भवानीपुर को भी नहीं बचा पाईं।
भवानीपुर से ममता बनर्जी को 15105 वोटों से हार का सामना करना पड़ा है। बीजेपी प्रत्याशी सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया है। बता दें कि यह दूसरी बार है जब सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया है। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम से सुवेंदु ने ममता को मात दी थी।
कांटे का रहा मुकाबला
दरअसल, भवानीपुर विधानसभा सीट पर ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच कांटे का मुकाबला रहा, लेकिन अंत में BJP प्रत्याशी ने जीत हासिल की। रुझानों में ममता बनर्जी ने बढ़त बनाई हुई थी और करीब 19 हजार वोटों से आगे निकल गई। जैसे-जैसे वोटों की गिनती आगे बढ़ी, यह बढ़त घटती गई और अंततः सुवेंदु अधिकारी ने करीब 15 हजार वोटों से जीत दर्ज की।
ममता के हार के कारण
भवानीपुर से ममता बनर्जी के हार के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सबसे बड़ा फैक्टर भवानीपुर की जटिल जनसांख्यिकी रही। यहां करीब 42% बंगाली हिंदू, 34% गैर-बंगाली हिंदू और लगभग 25% मुस्लिम मतदाता हैं। इस बार गैर-बंगाली समुदाय के साथ-साथ बंगाली हिंदू वोटों में भी बीजेपी के पक्ष में झुकाव देखने को मिला, जिससे समीकरण बदल गया।
विश्लेषकों के अनुसार आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप-मर्डर केस का महिलाओं की सुरक्षा पर उनकी छवि पर असर, एसआईआर प्रक्रिया और मतदाताओं की जांच, भवानीपुर की जनसांख्यिकीय संरचना, और टीएमसी के खिलाफ व्यापक एंटी-इनकंबेंसी लहर भी ममता बनर्जी की हार के कारण हो सकते है।
बीजेपी की क्या रही रणनीति
भवानीपुर में ममता को हराने में बीजेपी की रणनीति भी निर्णायक रही है। पार्टी ने भवानीपुर को प्रतिष्ठा की लड़ाई बनाते हुए अपने सबसे बड़े दिग्गज नेता और 2021 में ममता को हराने वाले सुवेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा। बीजेपी ने बंगाल में दिल्ली वाली रणनीति अपनाई। बीजेपी का मानना था कि सुवेंदु अधिकारी को यदि ममता के सामने उतारा जाए तो वह सीमित हो जाएगी और अन्य टीएमसी प्रत्याशियों पर उनका प्रभाव भी कम हो जाएगा। इसके साथ ही बूथ स्तर पर मजबूत मैनेजमेंट, गैर-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण और उम्मीदवार की छवि का पूरा फायदा उठाया।