डेस्क। दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों और अपनों के साथ वक्त बिताने का मौका लेकर आता है। इसी त्योहार के माहौल को पर्दे पर उतारने के लिए नेटफ्लिक्स पर फिल्म ‘दिलवाली दिवाली’ रिलीज हुई है। निर्देशक रितेश मेनन की यह फैमिली ड्रामा फिल्म रिश्तों, पीढ़ियों के बीच बदलती सोच और घर के असली मायने समझाने की कोशिश करती है। फिल्म का संदेश खूबसूरत है कि परिवार की खुशी किसी बड़े घर या महंगी सुविधाओं में नहीं, बल्कि अपनों के साथ और उनके बीच मिलने वाले प्यार में छिपी होती है। मिहिर आहूजा, मनोज पाहवा और नीलू कोहली जैसे कलाकारों से सजी यह फिल्म एक ऐसे परिवार की कहानी दिखाती है, जहां बेटा अपने माता-पिता को बेहतर जिंदगी देना चाहता है, लेकिन माता-पिता की खुशियों की परिभाषा कुछ अलग है। फिल्म का विषय दिलचस्प है और दिवाली के मौके पर परिवार के साथ देखने के लिए एक हल्का-फुल्का विकल्प बन सकता है। हालांकि, इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि कहानी को महज 61 मिनट में समेटने की कोशिश की गई है, जिसके चलते कई भावनात्मक पहलू पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते।
Dilwali Diwali: फिल्म की कहानी क्या है?
फिल्म की कहानी अंश सिक्का (मिहिर आहूजा) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो नौकरी के सिलसिले में नॉर्वे में रहता है। अंश चाहता है कि उसके माता-पिता सुधीर (मनोज पाहवा) और सुखमनी (नीलू कोहली) आरामदायक और सुविधाओं से भरी जिंदगी बिताएं। इसी सोच के साथ वह उनके लिए एक पॉश इलाके में शानदार अपार्टमेंट खरीदता है। लेकिन कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब माता-पिता को नया आलीशान घर उतना पसंद नहीं आता, जितनी उम्मीद अंश ने की थी। सुधीर और सुखमनी को अपने पुराने घर, मोहल्ले, पड़ोसियों और दोस्तों के बीच रहने में ज्यादा खुशी मिलती है। उनके लिए पुराने रिश्तों का साथ किसी भी आधुनिक सुविधा से कहीं ज्यादा मायने रखता है। हालांकि, बेटे की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, इसलिए दोनों नए घर में खुश होने का दिखावा करते हैं। दूसरी तरफ अंश भी अपनी जिंदगी में कुछ आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा है। जब दिवाली के मौके पर वह घर लौटता है, तो परिवार के सामने एक-दूसरे से छिपाई गई बातों को संभालने की चुनौती खड़ी हो जाती है। अब सवाल यह है कि क्या अंश अपने माता-पिता की असली खुशी समझ पाएगा? क्या परिवार के बीच छिपे राज उनके रिश्तों को और मजबूत करेंगे? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती है ‘दिलवाली दिवाली’ की कहानी।
निर्देशन और कहानी: सोच अच्छी, लेकिन स्क्रीनप्ले में जल्दबाजी
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका विषय है। रितेश मेनन ने एक ऐसे मुद्दे को उठाया है, जिससे आज के कई परिवार खुद को जोड़कर देख सकते हैं। अक्सर बच्चे अपने माता-पिता को बेहतर सुविधाएं देने के लिए उन्हें पुराने घर और परिचित माहौल से दूर ले जाना चाहते हैं। लेकिन वे यह समझना भूल जाते हैं कि माता-पिता के लिए खुशी का मतलब सिर्फ बड़ा घर, बेहतर फर्नीचर या आधुनिक सुविधाएं नहीं होता। उनके लिए पुराने पड़ोसियों से बातचीत, दोस्तों के साथ समय बिताना और आसपास के लोगों के सुख-दुख में शामिल होना भी उतना ही जरूरी है। फिल्म इसी भावनात्मक पहलू को सामने लाती है। निर्देशक की सोच अच्छी है और कहानी का संदेश भी दिल को छूता है। लेकिन पटकथा को जिस विस्तार की जरूरत थी, वह नहीं मिल पाता। महज 61 मिनट की अवधि में कई किरदारों और भावनाओं को दिखाने की कोशिश की गई है। नतीजा यह होता है कि कुछ घटनाएं बहुत जल्दी आगे बढ़ जाती हैं। किरदारों के बीच रिश्तों की गहराई और भावनात्मक टकराव को ज्यादा समय नहीं मिल पाता। अगर कहानी को थोड़ा और विस्तार दिया जाता, तो इसका प्रभाव कहीं ज्यादा मजबूत हो सकता था।
अभिनय: मनोज पाहवा और नीलू कोहली ने जीता दिल
फिल्म में अभिनय की बात करें तो मनोज पाहवा अपने परिचित और सहज अंदाज में नजर आते हैं। सुधीर के किरदार में उनकी कॉमिक टाइमिंग और स्वाभाविक अभिनय कहानी को हल्कापन देते हैं। वह अपने किरदार को बिना ज्यादा बनावटीपन के पर्दे पर पेश करते हैं। नीलू कोहली ने सुखमनी के रूप में एक ऐसी मां का किरदार निभाया है, जो बेटे की खुशी के लिए अपनी पसंद को पीछे रख देती है। उनके अभिनय में घरेलू भावनाओं और मां के स्नेह की झलक दिखाई देती है। वहीं मिहिर आहूजा ने अंश के किरदार में एक महत्वाकांक्षी और अपने माता-पिता की परवाह करने वाले बेटे की भूमिका निभाई है। उनका अभिनय कहानी के मुताबिक है, लेकिन उनके किरदार के भावनात्मक बदलाव को और बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता था। ऑरा भटनागर बडोनी भी फिल्म का हिस्सा हैं, लेकिन उनके किरदार को कहानी में ज्यादा जगह नहीं मिलती। निमिषा सिरोही की मौजूदगी भी फिल्म में सहायक भूमिका तक सीमित रहती है।
फिल्म की खूबियां
- परिवार और रिश्तों पर आधारित एक सकारात्मक कहानी।
- माता-पिता की भावनाओं और उनकी पसंद को समझने का अच्छा संदेश।
- मनोज पाहवा और नीलू कोहली का सहज अभिनय।
- दिवाली के पारिवारिक माहौल से जुड़ा विषय।
- कम अवधि होने के कारण फिल्म को कम समय में देखा जा सकता है।
कहां कमजोर पड़ती है ‘दिलवाली दिवाली’?
फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी जल्दबाजी है। कहानी में कई ऐसे भावनात्मक मोड़ हैं, जिन्हें विस्तार से दिखाया जा सकता था। लेकिन सीमित अवधि के कारण दर्शक किरदारों से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते। इसके अलावा कुछ किरदारों को पर्याप्त स्क्रीन टाइम नहीं मिला है। अंश के भावनात्मक बदलाव और माता-पिता के मन की उलझनों को और गहराई से दिखाया जाता तो फिल्म का असर बढ़ सकता था।
देखें या नहीं?
अगर आप दिवाली के मौके पर परिवार के साथ कोई हल्की-फुल्की और रिश्तों पर आधारित फिल्म देखना चाहते हैं, तो ‘दिलवाली दिवाली’ एक बार देखी जा सकती है। फिल्म की कहानी में कोई बहुत बड़ा रोमांच या चौंकाने वाला मोड़ नहीं है, लेकिन इसका भावनात्मक संदेश अच्छा है।
यह फिल्म याद दिलाती है कि माता-पिता को खुश रखने के लिए हमेशा महंगे तोहफे या आलीशान घर जरूरी नहीं होते। कई बार उनके लिए पुराने दोस्तों का साथ, परिचित मोहल्ला और परिवार के साथ बिताए गए कुछ पल ही सबसे बड़ी खुशी होते हैं। फाइनल वर्डिक्ट: ‘दिलवाली दिवाली’ एक साफ-सुथरी और अच्छी सोच वाली पारिवारिक फिल्म है। इसकी कहानी में अपनापन है और कलाकारों का अभिनय भी सहज है। हालांकि, कमजोर स्क्रीनप्ले और जल्दबाजी में समेटी गई कहानी इसे अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने नहीं देती। दिवाली के मौके पर परिवार के साथ खाली समय में इसे नेटफ्लिक्स पर देखा जा सकता है।
रेटिंग: 2.5/5 (संपादकीय आकलन)
फिल्म की जानकारी एक नजर में
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| फिल्म | दिलवाली दिवाली |
| निर्देशक | रितेश मेनन |
| मुख्य कलाकार | मिहिर आहूजा, मनोज पाहवा, नीलू कोहली |
| अन्य कलाकार | ऑरा भटनागर बडोनी, निमिषा सिरोही |
| जॉनर | हिंदी, फैमिली, ड्रामा |
| अवधि | 61 मिनट |
| OTT प्लेटफॉर्म | Netflix |
| रेटिंग | 2.5/5 (संपादकीय आकलन) |