नई दिल्ली। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हैं कार्यकर्ता। इस ताकत को मजबूत करने पर शुरू से ही उसने काफी ध्यान दिया। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही इस पर बहुत तेजी से काम हुआ। पार्टी ने सदस्यता अभियान चला कर कार्यकर्ता जोड़े। भाजपा खुद को विश्व का सबसे बड़ा पार्टी बताती है। फिर भी, जरूरत पड़ने पर चुनाव के वक्त पैसे देकर काम करने वाले लोग रखने से परहेज नहीं करती है। मतलब जो रणनीति बनी उसे जमीन पर उतारने के लिए लोगों की कमी नहीं होगी।
भवानीपुर में हर समुदाय के लोग हैं
ज्यादा से ज्यादा सदस्य बनाने और बचे लोगों को समर्थक बनाने की उसकी कोशिश का ही नतीजा है कि आज भाजपा किसी भी जाति-धर्म-समुदाय के लिए अछूत नहीं है। पश्चिम बंगाल के भवानीपुर में हर समुदाय के लोग हैं। फिर भी भाजपा के उम्मीदवार सुवेंदु अधिकारी करीब 15 हजार वोटों के अंतर से जीते।
राज्य में 90 फीसदी से ज्यादा हिंदू मतदाताओं वाली 49 की 49 सीटें भाजपा ने अपने पाले में कर लीं। मुस्लिम बहुल कुछ सीटों पर भी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन रहा। पश्चिम बंगाल में राज्य की कुल करीब आधी आबादी ने भाजपा को वोट दिया।
पार्टी ने आज लोगों (कार्यकर्ताओं या पैसे देकर रखे गए लोगों) की ऐसी मशीनरी खड़ी कर ली है कि कोई भी नरेटिव जनता तक पहुंचाने में वह अक्सर कामयाब हो जाती है।
बंगाल के चुनाव में भी भाजपा के हिंदुत्व का एक अलग रूप दिखा
पार्टी में एक और बड़ा बदलाव इस रूप में देखा गया है कि वह हिंदुत्व पर अपना रुख लगातार बदलती रही है। जहां जैसा ‘हिंदू कार्ड’ खेलना जरूरी समझा गया, वहां वैसा खेला गया। उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुए चुनाव में अमित शाह ने साफ कहा, ‘यह चुनाव बदले के लिए है।’ इस बार बंगाल के चुनाव में भी भाजपा के हिंदुत्व का एक अलग रूप दिखा, जब पार्टी के नेताओं ने कैमरे के सामने मछली खाई।
कट्टर हिंदुत्व वाली छवि को नरम किया
पार्टी ने अपना विस्तार करने के लिए रणनीतिक तौर पर अपनी कट्टर हिंदुत्व वाली छवि को नरम किया और काल-परिस्थिति के अनुसार बदला। 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि लोक सभा में सबसे बड़ा दल बन कर आने के बावजूद कई पार्टियां भाजपा को अछूत मानती हैं। 2014 के बाद वह स्थिति बिल्कुल नहीं रही है।
मोदी 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री और 2014 में प्रधानमंत्री बने
मोदी 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री और 2014 में प्रधानमंत्री बने। तब से कोई भी चुनाव नहीं हारे। न गुजरात में और न केंद्र में। इस बीच उन्होंने सरकारी योजनाओं और फैसलों के जरिए भी अपने समर्थकों का बड़ा आधार तैयार किया। जन-धन खाता, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना…। लिस्ट लंबी है। नोटबंदी जैसे फैसले को भी उन्होंने इस रूप में प्रचारित किया कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में 125 करोड़ जनता का योगदान होगा।
मोदी की ‘हवा’ बनती गई और बिखरा, कमजोर व निष्क्रिय विपक्ष के चलते बिना किसी बाधा के बहती गई। कभी बीजेपी के बड़े नेता रहे केएन गोविंदाचार्य ने कहा था कि नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी ताकत है राजनीतिक मार्केटिंग और उनके लिए राजनीति का मतलब है सत्ता। सत्ता चुनाव से आती है। चुनाव छवि की लड़ाई है। मतलब राजनीति छवि के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके लिए किसी भी नेता के पास तीन चीजें होनी चाहिए: बुनियादी सुविधाएं (infrastructure), संसाधन (resource)और तकनीक (technology)।
मोदी जननेता के रूप में राजनीति में खुद को स्थापित किया है
इन तीन मामलों में आज बीजेपी के टक्कर में कोई नहीं है। मोदी ने अलग-अलग समूहों के लिए अपनी अलग-अलग छवि गढ़ी है। आरएसएस के लिए वह हिंदूवादी नेता हैं, शहरी मध्य वर्ग के लिए विकास करने, नौकरी देने वाले नेता, राष्ट्रवादियों के लिए पाकिस्तान और मुस्लिमों की अक्ल ठिकाने लगाने वाले नेता…। इस छवि को बनाए रखना और भुनाते रहना मोदी और भाजपा की कामयाबी का बड़ा आधार है।
इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अपनी अलग-अलग छवियों के दम पर मोदी ने हर वर्ग में अपने समर्थक बनाए हैं और जननेता के रूप में राजनीति में खुद को स्थापित किया है। गांधी परिवार से बाहर, अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा देश का कोई प्रधानमंत्री लोकप्रियता के मामले में इस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है।