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सुप्रीम कोर्ट बोला-हिंदू धर्म जीवन जीने का तरीका: सबरीमाला केस में कहा-हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि हिंदू धर्म जीवन जीने का एक तरीका है, जहां इसमें आस्था रखने वालों के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है। भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली 9 जजों. . .

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि हिंदू धर्म जीवन जीने का एक तरीका है, जहां इसमें आस्था रखने वालों के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है। भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली 9 जजों की संवैधानिक बेंच में यहां तक कहा गया कि हिंदू धर्म में आस्था होने के लिए अपनी झोपड़ी में दीपक जलाना भी काफी है।
सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर समेत अन्य धार्मिक स्थानों में महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। इसी के साथ यह बेंच दाऊदी बोहरा और अन्य संप्रदायों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक आजादी के दायरे पर भी सुनवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट में सवाल हिंदू कौन है

बुधवार को इस मामले की सुनवाई का 15वां दिन था। पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान याचिकाकर्ता के एक वकील डॉ जी मोहन गोपाल ने यह कहकर अपना पक्ष रखा कि धार्मिक समुदायों के भीतर से ही सामाजिक न्याय की मांग उभर रही है। उन्होंने कहा, ‘हिंदू धर्म को एक धार्मिक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया था। उसके बाद 1966 में यह पाया गया कि हिंदू वह है, जो सभी धार्मिक और दार्शनिक मामलों में वेदों की सर्वोच्चता स्वीकार करता है। उन्होंने हमसे नहीं पूछा। हम में से किसी ने कभी ऐसा नहीं कहा।’

‘हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं’

उन्होंने सवाल करते हुए कहा, ‘अब मेरे मन में वेदों के प्रति सर्वोच्च सम्मान और गहरी आस्था है। लेकिन,क्या यह सच है कि आज हर व्यक्ति जिसे हिंदू माना गया है, वेदों की सर्वोच्च सत्ता को सभी आध्यात्मिक और दार्शनिक मामलों में स्वीकार करता है?’ इसपर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने जवाब में कहा-
इसी कारण हिंदू धर्म को जीवन जीने का एक तरीका कहा जाता है। एक हिंदू के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि मंदिर जाए या हिंदू बने रहने के लिए कोई अनुष्ठान करे।

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‘झोपड़ी के अंदर दीपक जलाना भी पर्याप्त’

जस्टिस नागरत्ना ने यहां तक कहा कि किसी को भी कर्मकांडी होने की जरूरत नहीं है और न ही कोई किसी की आस्था के बीच में आ सकता है। इसकी और खुली व्याख्या करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा-
अगर एक व्यक्ति अपनी झोपड़ी के अंदर एक दीपक भी जलाता है तो यह उसे अपना धर्म साबित करने के लिए पर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी जता चुका है अपनी आपत्ति

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट यह तक कह चुका है कि अगर लोग संवैधानिक अदालत में धर्म से जुड़े मामलों या प्रत्येक धार्मिक रिवाजों पर सवाल करना शुरू कर दंगे तो सैकड़ों याचिकाएं आ जाएंगी और इसकी वजह से हर धर्म टूट जाएगा।

सबरीमाला मंदिर केस की सुनवाई कर रहे जज

केरल के सबरीमाला मंदिर केस में सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय इस संवैधानिक बेंच में उनके समेत-
सीजेआई सूर्यकांत
जस्टिस बीवी नागरत्ना
जस्टिस एमएम सुंद्रेश
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह
जस्टिस अरविंद कुमार
जस्टिस एजी मसीह
जस्टिस प्रसन्ना बी वराले
जस्टिस आर महादेवन
जस्टिस जॉयमाल्या बागची

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