कोलकाता। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में गुरुवार को बंपर वोटिंग हुई। बंगाल की 294 सीटों में से 152 सीटों पर पहले फेज में 92.72% मतदान हुआ। चुनाव आयोग के आंकड़े रात 9 बजे तक हैं। इनमें बदलाव हो सकता है। बंगाल में आजादी के बाद अब तक सबसे ज्यादा वोटिंग हुई है। इससे पहले बंगाल में 2011 में 84.72% मतदान दर्ज किया गया था। ममता ने वोटिंग के बाद कहा- बंगाल की जनता ने SIR के खिलाफ बंपर वोटिंग की है। गृह मंत्री शाह ने कहा कि TMC का सूरज ढल चुका है।
अबतक के इतिहास में सबसे अधिक वोटिंग प्रतिशत दर्ज की गई। अब लोगों के मन में सवाल है कि यह किसकी तरफ जाएगा। इतने अधिक मतदान होने से राजनीतिक विश्लेषकों और सभी राजनीतिक दलों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर यह भारी मतदान किस ओर संकेत करता है। खास बात यह है कि 2011 में भी जब रिकॉर्ड 85.55% वोटिंग हुई थी तब बड़ा बदलाव देखने को मिला था। उस समय 34 साल पुरानी लेफ्ट फ्रंट सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस बंगाल की सत्ता में आई थी।
ज्यादा वोटिंग, कई जगह हुई झडपें
यह वोटिंग दर 2011 के विधानसभा चुनावों में दर्ज 85.55% और 2024 के लोकसभा चुनावों में 79.8% से कहीं ज्यादा है। यह दर्शाता है कि मतदाताओं में इस बार चुनाव को लेकर जबरदस्त उत्साह है। कुल 3.60 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 1.75 करोड़ महिला वोटर शामिल थीं, जो लोकतंत्र में बढ़ती महिला भागीदारी को भी दर्शाता है। हालांकि, इस भारी मतदान के बीच कुछ जगहों से हिंसा की खबरें भी सामने आई हैं। बीरभूम के दुबराजपुर में केंद्रीय बलों पर पत्थरबाजी की गई, जिसमें कई जवान घायल हो गए। दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज में एक बीजेपी उम्मीदवार पर हमला हुआ, जबकि मुर्शिदाबाद में एक क्षेत्रीय पार्टी के नेता के काफिले को निशाना बनाया गया। इन घटनाओं ने चुनावी माहौल को तनावपूर्ण बना दिया।
कहां पड़े सबसे ज्यादा वोट
मतदान के आंकड़ों पर नजर डालें तो दक्षिण दिनाजपुर में सबसे ज्यादा वोटिंग हुई। इसके बाद कूचबिहार, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुड़ी, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम का स्थान रहा। इन जिलों में लंबी कतारों में खड़े मतदाता लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते नजर आए। राजनीतिक रूप से भी कई सीटों पर दिलचस्प मुकाबले देखने को मिले। नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी और तृणमूल उम्मीदवार के बीच कड़ा मुकाबला है। वहीं बहरामपुर सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी लंबे समय बाद विधानसभा चुनाव मैदान में हैं।
इतनी बड़ी वोटिंग का क्या मतलब है
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जब भी ज्यादा मतदान होता है वो बदलाव की इच्छा को दर्शाता है, लेकिन यह सत्ता के समर्थन का संकेत भी हो सकता है। 2011 में उच्च मतदान ने सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया था, लेकिन हर चुनाव का संदर्भ अलग होता है। इस बार की भारी भागीदारी यह साफ करती है कि बंगाल का मतदाता बेहद जागरूक है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहा है। अब सभी की नजरें चुनाव परिणामों पर टिकी हैं।
एसआईआर की वजह से हुई बढ़ोतरी?
अमूमन यही माना जाता है कि ज्यादा मतदान अक्सर सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कम्बेंसी) का संकेत देता है। जब जनता मौजूदा सरकार से असंतुष्ट होती है, तो बदलाव के लिए बड़ी संख्या में मतदान करती है। करीब 9 फीसदी ज्यादा मतदान का मतलब सरकार की विदाई माना जा रहा है, लेकिन इसमें किंतु-परंतु भी जुड़े हुए हैं। कहा जा रहा है कि एसआईआर में नामों की कटौती की वजह से वोट प्रतिशत बढ़ गया। प्रदेश में वोटर लिस्ट से नाम कटने, पुनरीक्षण और नए पंजीकरण को लेकर बहस हुई।
राजनीतिक दलों ने दावा किया कि बड़ी संख्या में वोटर सूची में बदलाव हुए हैं। एसआईआर में करीब 91 लाख वोटरों के नाम कट गए, यानी वोटरों में लगभग 12 फीसदी की कटौती हो गई। ये ऐसे वोटर माने जाते थे जो मृतक थे, पलायन कर गए थे या दूसरी जगह शिफ्ट हो गए थे। हालांकि इन्हें मौका दिया गया था कि ट्रिब्यूनलों में अपने दावे पेश कर सकें, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बने ट्रिब्यूनलों ने पश्चिम बंगाल में सिर्फ 139 लोगों के वोट देने के अधिकार बहाल किए हैं। ये लोग उन 27 लाख से ज्यादा नामों में से मात्र 0.005% हैं, जिन्हें पहले चरण में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत न्यायिक जांच के दौरान वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था।
क्या रहा है ज्यादा मतदान का इतिहास?
क्या ज्यादा मतदान वर्तमान सरकार के लिए खतरे की घंटी है? 2011 में ममता बनर्जी लेफ्ट को हराकर सत्ता में आई थीं। उस समय सबसे ज्यादा 84.33 फीसदी मतदान हुआ था, लेकिन 2016 और 2021 में मतदान गिरकर क्रमशः 82.16 फीसदी और 81.56 फीसदी हो गया था। तब भी ममता बनर्जी ही सत्ता में आई थीं. 1977 से लेकर 2011 तक बंगाल में लेफ्ट का शासन रहा। 1977 में मतदान गिरकर करीब 56 फीसदी हो गया था, जबकि 1972 में कांग्रेस आई थी तो करीब 61 फीसदी मतदान हुआ था। इमरजेंसी और जेपी आंदोलन के बाद भी बंगाल में मतदान नहीं बढ़ा जबकि देश के अन्य हिस्सों में मतदान बढ़ गये थे , लेकिन कम मतदान पर ही पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार पहली बार आई थी। गौर करने की बात ये भी है कि 1977 से 1982 में करीब 20 फीसदी ज्यादा मतदान हुए लेकिन सरकार लेफ्ट रही है, इस बार तो ममता राज में सर्फ 9 फीसदी मतदान ज्यादा हुए, सिर्फ ज्यादा मतदान ही पैमाना नहीं होता है।
मतदान और जीत का क्या है रिश्ता?
राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं है और जो होता है, वो दिखता नहीं है। इसी तरह चुनाव में ज्यादा या कम मतदान होना भी एक अनसुलझी पहेली है। 2014 के लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व मतदान हुआ था, ऐसा चुनावी इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। मतदान में 8 फीसदी प्वाइंट की बढ़ोतरी हुई और यह आंकड़ा 58 फीसदी से बढ़कर 66 फीसदी पहुंच गया था। 2014 के चुनाव को देखें तो यह फॉर्मूला फिट बैठता है कि ज्यादा वोटिंग की वजह से मनमोहन सिंह की सरकार चली गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा था। चुनाव सिर्फ अंकगणित ही नहीं, बल्कि केमिस्ट्री भी है। केमिस्ट्री समझे बिना नंबर के जंजाल में फंसने का खतरा रहता है।