नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हालिया छात्र प्रदर्शनों और संसद मार्च के दौरान दर्ज मामलों में प्रदर्शनकारियों को बड़ी अंतरिम राहत देते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किए हैं। अदालत ने निर्देश दिया है कि जिन छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जिन्हें प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया था, उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। साथ ही प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर में फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का भी आदेश दिया गया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सात राज्यों को नोटिस जारी कर पूरे मामले पर जवाब मांगा है।
संसद मार्च से जुड़े मामलों पर हुई सुनवाई
मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने छात्र आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई से संबंधित कई याचिकाओं पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र (नागपुर) और बिहार समेत कई राज्यों में भी प्रदर्शनकारियों के साथ इसी तरह की घटनाएं सामने आई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी याचिकाओं में कई समान आरोप दिखाई दे रहे हैं, जिनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले छात्रों की होगी तत्काल रिहाई
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन छात्रों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, उन्हें हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने ऐसे सभी छात्रों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। यह आदेश उन छात्रों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जो हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किए गए थे।
FIR पर फिलहाल नहीं होगी कठोर कार्रवाई
अदालत ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर भी महत्वपूर्ण अंतरिम राहत देते हुए कहा कि फिलहाल इन मामलों में कोई दंडात्मक या कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी। इससे प्रदर्शन में शामिल लोगों को राहत मिली है, जबकि मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी।
कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई गंभीर आरोपों पर चिंता जताई। इनमें शामिल हैं—
- पैलेट गन के इस्तेमाल से एक 19 वर्षीय युवक की आंखों की रोशनी जाने का दावा।
- इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल के आरोप।
- एक युवती के गंभीर रूप से घायल होकर आईसीयू में भर्ती होने की जानकारी।
- वकीलों और एक मीडियाकर्मी पर कथित हमले।
- सिविल ड्रेस में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा कथित हिंसा के आरोप।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इन सभी मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन संविधान के दायरे में’
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन था, जिसमें कुछ मांगें उठाई गई थीं और यह संविधान के दायरे में था। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कई बार ऐसे आंदोलनों में कुछ असामाजिक या बाहरी तत्व भी शामिल हो जाते हैं, जो अपने एजेंडे के तहत माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं।
याचिकाकर्ताओं ने पुलिस कार्रवाई पर लगाए कई आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि यह देशभर में हो रहे छात्र आंदोलनों का मामला है। उन्होंने दावा किया कि एक वीडियो में एक सहायक उप-निरीक्षक (ASI) खुद एक कार के शीशे तोड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना था कि यदि जिम्मेदारी तय नहीं होगी तो पुलिस को कार्रवाई से बच निकलने का संदेश जाएगा।
बिहार मामले में नाबालिगों की हिरासत पर सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने बिहार से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां की स्थिति दिल्ली से भी अधिक गंभीर रही।
उन्होंने अदालत को बताया कि—
- बिहार सरकार ने कुछ एफआईआर वापस लेने का दावा किया है।
- इसके बावजूद 140 से अधिक लोग अब भी हिरासत में हैं।
- इनमें अधिकांश 16 से 18 वर्ष के नाबालिग बताए गए।
- एक 13 वर्षीय बच्चे को भी हिरासत में रखने का आरोप लगाया गया।
- कई नाबालिगों को 40 घंटे से अधिक समय बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
खाना बांटने आए युवक को उठाने का आरोप
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि जुनैद मलिक नामक युवक, जो कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों के लिए खाना लेकर आया था, उसे हिरासत में लेकर आंखों पर पट्टी बांधकर मसूरी हाईवे पर छोड़ दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उसके परिवार से भी पूछताछ की गई।
पत्थरों से भरे ट्रक और CCTV फुटेज का मुद्दा उठा
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि जंतर-मंतर के पास सुबह करीब चार बजे पत्थरों से भरा एक ट्रक पहुंचा, जिसने दिल्ली पुलिस की कई सुरक्षा परतों को पार किया। वहीं अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने सवाल उठाया कि यदि पुलिस को यह जानकारी नहीं है कि ट्रक वहां कैसे पहुंचा, तो यह गंभीर जांच का विषय है। दीवान ने अदालत से सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग भी की। उन्होंने कहा कि फेस रिकग्निशन तकनीक से जुटाए गए डेटा का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों की प्रोफाइलिंग के लिए नहीं होना चाहिए।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले में केंद्र सरकार और सात राज्यों से जवाब तलब किया है। फिलहाल अदालत के अंतरिम आदेश के तहत—
- बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारियों की रिहाई होगी।
- एफआईआर में कोई कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
- पुलिस कार्रवाई और लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच की दिशा में सुनवाई आगे बढ़ेगी।
मामले की अगली सुनवाई में अदालत केंद्र और संबंधित राज्यों के जवाब पर विचार करेगी।