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ममता का कुर्सी मोह, इस्तीफा नहीं देने पर अड़ी, क्या उत्पन्न होगा संवैधानिक संकट, संविधान में ही समाधान, जाने सबकुछ

डेस्क। ममता बनर्जी चुनाव हार गई है, लेकिन कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनके इस्तीफा न देने को लेकर उठ रहे सवाल सिर्फ राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहे है, बल्कि यह एक गहरे संवैधानिक विमर्श का विषय बन. . .

डेस्क। ममता बनर्जी चुनाव हार गई है, लेकिन कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनके इस्तीफा न देने को लेकर उठ रहे सवाल सिर्फ राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहे है, बल्कि यह एक गहरे संवैधानिक विमर्श का विषय बन चुके हैं। भारतीय संघीय ढांचे में मुख्यमंत्री का पद न केवल राजनीतिक बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारियों से भी जुड़ा होता है। विधानसभा कार्यकाल पूरा होने के बाद और चुनावों में हार के बावजूद भी इस्तीफे की मांग को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, इसे ठुकराती हैं, तो क्या वास्तव में कोई संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है? इस सवाल का जवाब सीधे-सीधे “हाँ” या “नहीं” में नहीं है, बल्कि यह परिस्थितियों, कानूनी प्रावधानों और संस्थाओं की भूमिका पर निर्भर करता है।
इस लीगल विश्लेषणात्मक लेख में हम समझेंगे कि संविधान इस स्थिति को कैसे देखता है, राज्यपाल और न्यायपालिका की क्या भूमिका हो सकती है, और आगे की राह क्या हो सकती है।

मुख्यमंत्री का पद और संवैधानिक ढांचा

जैसा कि हम जानते हैं भारतीय संविधान के अनुसार राज्यों की कार्यपालिका का प्रमुख मुख्यमंत्री होता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। लेकिन यहां जानना जरूरी है कि यह नियुक्ति पूर्णतः राज्यपाल की मर्जी पर आधारित नहीं होती, बल्कि विधानसभा में बहुमत के आधार पर तय होती है।अनुच्छेद 164 साफ करता है कि विधानसभा चुनावों के जरिए चुने सदस्य बहुमत से जिसे अपना नेता तय करते हैं, वही राज्यपाल के जरिए पद और गोपनीयता की शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री बनता है। मतलब साफ है, मुख्यमंत्री तब तक पद पर बने रहते हैं जब तक उन्हें विधानसभा के चुने हुए सदस्यों का विश्वास प्राप्त है। इसका मतलब यह है कि इस्तीफा देना अनिवार्य नहीं होता, जब तक कि वे बहुमत खो न दें या या स्वयं इस्तीफा न दें । इसलिए केवल राजनीतिक या नैतिक आधार पर इस्तीफा मांगना और उसका न दिया जाना संवैधानिक संकट की श्रेणी में स्वतः नहीं आएगा। यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जिस विधानसभा के चुने हुए सदस्य बहुमत से अपना नेता चुनते हैं, उसकी अवधि पांच साल की ही होती है। और पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल की अवधि सात मई तक ही है।

क्या इस्तीफा न देना संवैधानिक संकट है?

संवैधानिक संकट तब माना जाता है जब संविधान के प्रावधानों का पालन न हो पा रहा हो या संस्थाओं के बीच टकराव इतना बढ़ जाए कि शासन बाधित हो जाए। ममता बनर्जी के मामले में संवैधानिक संकट की स्थिति तब होगी जब, सात मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है। फिर …विधानसभा चुनावों के बाद चुने हुए नए सदस्य बहुमत से नए नेता का चुनाव करेंगे और मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की बात उठेगी । तब क्या संविधान के दिशानिर्देशों की अनदेखी हो सकती है या प्रशासनिक मशीनरी ठप हो जाने की स्थिति बनेगी। ये कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

राज्यपाल की भूमिका: कितना हस्तक्षेप संभव?

राज्यपाल का पद इस पूरे मामले में अहम हो जाता है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के पास कुछ विशेष शक्तियां होती हैं, लेकिन वे सीमित और संवैधानिक दायरे में ही प्रयोग की जा सकती हैं। यदि विधानसभा का कार्यकाल फिलहाल शेष रहता, तो वैसी स्थिति में भी राज्यपाल भारतीय संविधान में दिए गए अपने प्रशासनिक अधिकारों के तहत कुछ कदम उठा सकते थे, मुख्यमंत्री से बहुमत साबित करने को कहना या फिर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाना। लेकिन यहां मामला उलटा है, विधानसभा का कार्यकाल सात मई को समाप्त होने जा रहा है। नए विधानसभा के चुने हुए सदस्य अपना नेता चुनेंगे और राज्यपाल को अपने फैसले से सूचित करेंगे। ममता के इस्तीफा न देने से उनके इस अधिकार पर कोई रोक नहीं। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक जानकार और वकील प्रशांत एस. केंजेले, मानते हैं कि नए मुख्यमंत्री के शपथ -ग्रहण के साथ, ममता बनर्जी का कार्यकाल स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। तब तक, वह केवल कार्यवाहक मुख्यमंत्री ही रहेंगी।

न्यायपालिका की भूमिका: अंतिम निर्णायक

क्या यह मामला न्याययालय में पहुंचेगा। यदि राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाएं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पातीं, तो मामला अदालत में जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई बार इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप किया है।
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ , 1994: इस ऐतिहासिक निर्णय, जिसने अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के तहत राज्य सरकारों की मनमानी बर्खास्तगी पर रोक लगाई। इसने संघीय ढांचे को मजबूत किया, राज्यपाल की शक्तियों को सीमित किया और बहुमत परीक्षण को अनिवार्य बनाया। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा में होना चाहिए, न कि राज्यपाल के अनुमान पर। यह फैसला केंद्र-राज्य संबंधों और न्यायिक पुनरावलोकन के लिए मील का पत्थर माना जाता है।
शिवराज सिंह चौहान बनाम मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष, 2020 : यह मामला कांग्रेसी मुख्यमंत्री मलनाथ सरकार के गिरने से पहले और उसके दौरान भाजपा द्वारा फ्लोर टेस्ट की मांग से जुड़ा है। भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद कोर्ट ने तुरंत बहुमत परीक्षण कराने का आदेश दिया, जिसके बाद कमलनाथ सरकार गिर गई।
लेकिन इन विवादों में, जो उस वक्त जमीनी हालात थे और अब के जो हालात हैं…. उनमें अंतर है। यहां विधानसभा सात मई को अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही है। विधानसभा के कार्यकाल खत्म हो जाने के बाद फिर कैसा फ्लोर टेस्ट और फिर कैसा बहुमत परीक्षण। फिर भी यदि जरूरत हुई और यह मामला न्यायलय में गया तो न्यायपालिका संविधान के दिशा निर्देशों के तहत फैसला सुना सकती है।

आगे की राह और संभावनाएं

यदि इस्तीफा नहीं दिया जाता और विवाद बना रहता है, तो आगे की राह में सबसे लोकतांत्रिक तरीका यही है कि ममता बनर्जी परंपराओं का अनुसरण करते त्यागपत्र दें और नई सरकार को शपछ लेने दें। इसका राजनैतिक समाधान ये हो सकता है कि तमाम राजनैतिक दल जो परंपराए जानते हैं और यह जानते हैं कि राजनीति में हार -जीत का चक्र चलता रहता है, वो आगे आएं औऱ इसका समाधान निकालें। न्यायिक समाधान ये हो सकता हैै कि न्यायालय संविधान की परंपराओं का पालन करते हुए…राह दिखाए। एक विकल्प और है…वह यह कि राज्य में संवैधानिक संकट उत्पत्न होने की राज्यपाल की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। यदि स्थिति पूरी तरह बिगड़ जाती है, तो राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। लेकिन यह अंतिम विकल्प होता है। और सरकार के इस मामले में रिकार्ड को देखते हुए, इस बारे में कहना जल्दबाजी होगी। सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विकास कुमार का मानना है कि संविधान के जरिए ही हल ढूंढा जा सकता है।

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