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सिनेमा के पोस्टर्स और एंटी-स्मोकिंग विज्ञापनों का विरोधाभास : फिल्ममेकर संजय गुप्ता के सवाल पर छिड़ी नई बहस

बॉलीवुड फिल्मों में अभिनेताओं के हाथ में सिगरेट, चेहरे पर गंभीर तेवर और बैकग्राउंड में गूंजता दमदार म्यूजिक—यह अंदाज दशकों से फिल्मों की मर्दानगी और स्टाइल का पर्याय रहा है. . .

नई दिल्ली: बॉलीवुड फिल्मों में अभिनेताओं के हाथ में सिगरेट, चेहरे पर गंभीर तेवर और बैकग्राउंड में गूंजता दमदार म्यूजिक—यह अंदाज दशकों से फिल्मों की मर्दानगी और स्टाइल का पर्याय रहा है। लेकिन, अब इस पुरानी फिल्मी शैली पर जाने-माने फिल्ममेकर संजय गुप्ता ने बड़ा सवाल खड़ा किया है। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर बहस का एक नया मुद्दा बन गया है।

पोस्टर्स में सिगरेट और थिएटर में एंटी-स्मोकिंग एड

रविवार, 27 सितंबर को फिल्ममेकर संजय गुप्ता ने अपने ऑफिशियल ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर तीन चर्चित फिल्मों के पोस्टर्स का एक कोलाज शेयर किया। इन तस्वीरों में अभिनेता रणबीर कपूर (‘एनिमल’), रणवीर सिंह (‘धुरंधर’) और विक्की कौशल (‘लव एंड वॉर’) के किरदारों को सिगरेट पीते हुए स्टाइलिश अंदाज में दिखाया गया है। इन पोस्टर्स को साझा करते हुए संजय गुप्ता ने मेकर्स की क्रिएटिविटी और दोहरे मापदंड पर तंज कसा। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर फिल्मों के पोस्टर्स में ही हीरो को स्मोकिंग करते हुए इस तरह प्रमोट किया जाएगा, तो सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले और इंटरवल के दौरान दिखाए जाने वाले ‘एंटी-स्मोकिंग विज्ञापनों’ (Anti-Smoking Ads) का क्या औचित्य रह जाता है? उन्होंने लिखा, “फिल्मों से पहले और उनके दौरान हमें जो एंटी-स्मोकिंग रील्स देखनी पड़ती हैं, उनका क्या मतलब है, जब फिल्मों के पोस्टर्स ही ऐसे हैं?”

सोशल मीडिया पर यूजर्स ने दिलाई पुरानी फिल्मों की याद

संजय गुप्ता का यह पोस्ट सामने आते ही सोशल मीडिया यूजर्स दो गुटों में बंट गए। कुछ लोगों ने उनकी बात का समर्थन किया, तो वहीं कुछ यूजर्स ने उनकी ही पुरानी फिल्मों का हवाला देकर उन्हें घेर लिया। एक यूजर ने उनकी साल 2002 में आई सुपरहिट फिल्म ‘कांटे’ का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस फिल्म के एक गाने में मुख्य कलाकारों को सिगरेट पीते हुए दिखाया गया था, उसके निर्देशक आज ऐसे पोस्टर्स पर सवाल कैसे उठा सकते हैं? यूजर ने इसे बड़ी विडंबना बताया।

संजय गुप्ता ने दिया करारा जवाब

यूजर के इस तंज पर संजय गुप्ता भी चुप नहीं रहे। उन्होंने तुरंत पलटवार करते हुए स्पष्ट किया कि उस दौर और आज के समय में नियमों और जागरूकता में जमीन-आसमान का अंतर है। उन्होंने जवाब देते हुए लिखा, “उस समय नो-स्मोकिंग एड नहीं होते थे, जीनियस।” इस पूरी बहस के दौरान कई यूजर्स ने यह भी मुद्दा उठाया कि फिल्मों में आज भी सिगरेट या तंबाकू को किसी पुरुष किरदार के ‘रौब’ और ‘मर्दानगी’ से जोड़कर दिखाना एक आसान फॉर्मूला बन गया है, जो कहीं न कहीं क्रिएटिविटी की कमी को भी दर्शाता है।

सिनेमा समाज का आईना: कहां खिंचे सीमा रेखा?

यह विवाद सिर्फ तीन फिल्मों के पोस्टर्स तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े सवाल को जन्म देता है कि फिल्मों में किसी वस्तु को दिखाने और उसे ‘ग्लैमरस’ बनाने के बीच की बारीक रेखा कहां खत्म होती है। चूंकि सिनेमा समाज पर गहरा असर डालता है, ऐसे में संजय गुप्ता द्वारा उठाए गए इस सवाल ने मनोरंजन जगत में एक गंभीर आत्ममंथन शुरू कर दिया है।

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