जलपाईगुड़ी | करीब एक दशक के आंदोलन, अनगिनत चिट्ठियों और लंबे इंतजार के बाद आखिरकार डुआर्स के विशाल इलाके को अपना सपना पूरा होता दिख रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने अपने एक्स हैंडल पर घोषणा की है कि दूसरे सेवक पुल और उसकी अप्रोच रोड के लिए कुल 1175 करोड़ रुपये की वित्तीय मंजूरी दी गई है। खबर फैलते ही पश्चिमी डुआर्स के गांवों और कस्बों में उत्साह की लहर दौड़ गई।
तीस्ता पर बनेगा 6.91 किलोमीटर लंबा छह लेन का पुल
दार्जिलिंग जिले के सेवक में तीस्ता नदी पर 6.91 किलोमीटर लंबा छह लेन का विशाल पुल बनेगा। इसके साथ उत्तर बंगाल की रफ्तार का सपना जुड़ा है। पुल बनने पर डुआर्स से सिलीगुड़ी की दूरी करीब 11 किलोमीटर घट जाएगी और उत्तर बंगाल की अनौपचारिक राजधानी एक घंटे से भी कम समय में पहुंचा जा सकेगा।
लंबे आंदोलन की कहानी: सांसद को भी मिला धन्यवाद
लंबे समय से ‘डुआर्स फोरम फॉर सोशल रिफॉर्म’ कोरोनेशन ब्रिज के संरक्षण और दूसरे सेवक पुल की मांग को लेकर आंदोलन कर रहा है। संगठन के प्रमुख पदाधिकारी चंदन रॉय ने बताया कि नई सरकार आने के बाद उन्होंने काम में तेजी महसूस की है। हालांकि उन्होंने सतर्क लहजे में कहा कि जब तक पुल के पिलर नहीं बन जाते, तब तक वे पूरी तरह भरोसा नहीं करेंगे। साथ ही उन्होंने दार्जिलिंग के सांसद राजू बिस्ता को धन्यवाद दिया, जिन्होंने इस पुल के लिए करीब 65 चिट्ठियां लिखीं।
यह पुल इतना जरूरी क्यों? सुरक्षा का सवाल
माना जा रहा है कि चिकन नेक की सुरक्षा में यह पुल अहम भूमिका निभाएगा। इस रास्ते पर बीते कई दशकों में बहुत से आम लोगों की जान गई है, यहां तक कि सेना के काफिले भी कई बार हादसों का शिकार हुए हैं। पर्यटन कारोबारी राजेन प्रधान के अनुसार, उत्तर बंगाल के इस हिस्से से देश की सबसे ज्यादा सीमाएं लगती हैं, इसलिए सीमा सुरक्षा के लिहाज से भी इस पुल का महत्व बहुत बड़ा है।
कोरोनेशन ब्रिज की उम्र बढ़ेगी, हेरिटेज की मांग भी
नया पुल बनने से अंग्रेजों के जमाने में बने कोरोनेशन ब्रिज की उम्र भी बढ़ेगी। 2015 में नेपाल में आए भीषण भूकंप के बाद आईआईटी खड़गपुर के विशेषज्ञ दल ने इसकी जांच कर बताया था कि यह पुल अब ज्यादा समय तक भार नहीं उठा सकेगा। तभी से पूरे उत्तर बंगाल में नए पुल की मांग जोर पकड़ने लगी। साथ ही कुछ लोग इस पुराने आर्च ब्रिज को हेरिटेज घोषित कर संरक्षित करने की मांग भी लंबे समय से कर रहे हैं।
एंबुलेंस चालकों के चेहरों पर राहत
सबसे ज्यादा राहत एंबुलेंस चालकों में दिख रही है। एंबुलेंस संगठन के प्रतिनिधि शंकर शील ने कहा कि सेवक के रास्ते 10 किलोमीटर की दूरी को सिर्फ किलोमीटर में नहीं मापा जा सकता, क्योंकि पहाड़ी सड़क पर बहुत समय लगता है और अक्सर भूस्खलन से रास्ता बंद हो जाता है। इसी वजह से कई गंभीर मरीज एंबुलेंस में ही दम तोड़ देते हैं। उन्हें उम्मीद है कि नया पुल बनने से समय बचेगा और कई जानें बचेंगी।
चाय बागानों और जंगल किनारे बसे गांवों की जीवनरेखा
जान बचाने और पर्यटन को रफ्तार देने के अलावा डुआर्स के लोग मानते हैं कि दूसरा सेवक पुल इलाके के विशाल चाय बागानों और जंगल से सटे गांवों की जीवनरेखा बनेगा। डुआर्स, तराई समेत पूरे उत्तर बंगाल को इसका लाभ मिलने की उम्मीद है।