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चिंताजनक तस्वीर: छह माह में मेडिकल कॉलेजों के 12 डॉक्टरों की आत्महत्या, काम का दबाव या समस्या कुछ और?

देश के मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में काम करने वाले युवा डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. . .

मार्च से 24 सितंबर के बीच 11 मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में पीजी रेजिडेंट, जूनियर डॉक्टर और मेडिकल छात्रों की मौतें; सर्वे में 61.8% रेजिडेंट डॉक्टरों ने 36 घंटे से ज्यादा लगातार काम करने की शिकायत की

नई दिल्ली: देश के मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में काम करने वाले युवा डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मार्च से 24 सितंबर के बीच 11 मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में 12 पीजी रेजिडेंट, जूनियर डॉक्टर और मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या की।इन मामलों में काम का अत्यधिक दबाव, लगातार लंबी ड्यूटी, पढ़ाई का तनाव और रैगिंग जैसी वजहों के आरोप या आशंकाएं सामने आई हैं। हालांकि, हर मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं और किसी व्यक्ति की आत्महत्या के पीछे एक ही कारण तय करना उचित नहीं है।

11 मेडिकल संस्थानों में सामने आए 12 मामले

रिपोर्ट के अनुसार, छह महीने से भी कम अवधि में देश के 11 मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में 12 आत्महत्याएं हुईं। इनमें चंडीगढ़ के जीएमसीएच-32 और सूरत के सरकारी मेडिकल कॉलेज में दो-दो मामले शामिल हैं।इन घटनाओं ने मेडिकल संस्थानों में रेजिडेंट डॉक्टरों और छात्रों के कामकाजी माहौल, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और शिकायत निवारण व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है।

30 से 40 घंटे तक लगातार ड्यूटी का दबाव

मेडिकल शिक्षा और अस्पतालों में रेजिडेंट डॉक्टरों की लंबी ड्यूटी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। सामने आए मामलों में भी कथित तौर पर 30 से 40 घंटे तक लगातार काम करने, पर्याप्त आराम नहीं मिलने और पढ़ाई के दबाव जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है। लगातार लंबी ड्यूटी और नींद की कमी का असर डॉक्टरों की शारीरिक और मानसिक सेहत के साथ-साथ उनके काम पर भी पड़ सकता है।

सर्वे में सामने आई रेजिडेंट डॉक्टरों की परेशान करने वाली तस्वीर

फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (FAIMA) की ओर से किए गए एक अध्ययन में 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 1,260 रेजिडेंट डॉक्टरों को शामिल किया गया था।

अध्ययन में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक:

  • 87.8% रेजिडेंट डॉक्टरों ने ड्यूटी के कारण पर्याप्त नींद नहीं मिलने की बात कही।
  • 61.8% डॉक्टरों ने लगातार 36 घंटे से अधिक काम करने की शिकायत की।
  • 16.7% डॉक्टरों ने आत्महत्या के विचार आने की बात कही।
  • 67.2% डॉक्टरों में मध्यम स्तर का तनाव पाया गया।
  • 13% डॉक्टरों में उच्च स्तर का तनाव दर्ज किया गया।

ये आंकड़े रेजिडेंट डॉक्टरों के काम के घंटों, आराम और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता सामने रखते हैं।

रैगिंग भी बनी चिंता की वजह

कुछ मामलों में रैगिंग को भी आत्महत्या से जुड़ी परिस्थितियों में एक संभावित कारक के तौर पर बताया गया है। मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग पर रोक के बावजूद इससे जुड़े आरोप सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, संस्थानों में ऐसी शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई, गोपनीय शिकायत तंत्र और छात्रों के लिए प्रभावी सहायता व्यवस्था जरूरी है।

‘दूसरों का इलाज करने वाले डॉक्टर खुद बदहाल’

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के जूनियर डॉक्टर्स नेटवर्क के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. ध्रुव ने डॉक्टरों की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दूसरों का इलाज करने वाले डॉक्टर खुद कठिन परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। उनके मुताबिक, डॉक्टरों की समस्याओं को केवल व्यक्तिगत स्तर पर देखने के बजाय मेडिकल संस्थानों में काम करने की परिस्थितियों, ड्यूटी के घंटों और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की व्यवस्था पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

क्या केवल काम का दबाव जिम्मेदार है?

इन घटनाओं के बाद काम के अत्यधिक दबाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन हर आत्महत्या के पीछे एक से अधिक व्यक्तिगत, सामाजिक और पेशेवर परिस्थितियां हो सकती हैं। इसलिए किसी एक कारण को सभी मामलों पर लागू करना उचित नहीं होगा। मेडिकल संस्थानों के लिए चुनौती यह है कि रेजिडेंट डॉक्टरों और छात्रों को पर्याप्त आराम, सुरक्षित कार्यस्थल, रैगिंग से सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और समय पर शिकायत निवारण जैसी सुविधाएं मिलें।

मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सुरक्षित कार्यस्थल पर जोर जरूरी

लगातार लंबी ड्यूटी और नींद की कमी से जुड़े आंकड़ों ने मेडिकल शिक्षा व्यवस्था में काम के घंटों और डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर नए सिरे से ध्यान देने की जरूरत सामने रखी है। मेडिकल कॉलेजों में काम के घंटे, रेस्ट पीरियड, रैगिंग की रोकथाम, मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग और आपातकालीन सहायता तंत्र को प्रभावी बनाना इस समस्या से निपटने के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।युवा डॉक्टर और मेडिकल छात्र स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं। ऐसे में उनके लिए सुरक्षित और स्वस्थ कार्य वातावरण सुनिश्चित करना केवल उनके हित का मुद्दा नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता से भी जुड़ा सवाल है।

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